रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें० श्रीहरिः ० प्रस्तावना प्रस्तुत ग्रन्थ के रचयिता सर्वजीवहितैषी वीतराग तत्त्वदर्शी महात्मा हैं। उनका किसी के प्रति मनोमालिन्य अथवा परिपन्थिता वैसे ही संभव नहीं है जैसे सकलहृदयाह्लादक शीतरश्मि से तिग्मरश्मि के उत्ताप का उद्गम । फिर भी जहां उन्हें अशुद्धि दिखाई देती है, जहाँ अल्पज्ञों द्वारा वेद और शास्त्रों के अर्थ का अनर्थ कर उनपर प्रहार किया हुआ दीख पड़ता है एवं जहाँ संस्कृतवाङ्मय में दुरभिसन्धिवश अथवा अज्ञानवश भारतीयसंस्कृति के विरोधी वातावरण का सर्जन किया रहता है, वहाँ उन्हें लोक-कल्याण के लिए यह अर्थ अशुद्ध है, शास्त्र का तात्पर्य यह है, यह आस्था भारतीय संस्कृति तथा शास्त्रमर्यादा के विपरीत है; यह कहना उचित ही नहीं परमावश्यक भी है। इस प्रकार का प्रतिपादन करनेवालों के मधुर वाग्जाल में फँस कर जनता अपनी सनातन मर्यादा का त्याग न करे। भारतीय संस्कृति से भिन्न संस्कृतिवाले वेद-शास्त्रों के तात्पर्य के अनभिज्ञ मनीषियों का कथन अनुकरणीय नहीं है। वह किसी दुरभिसन्धि वश—जनता को विधर्मी बनाने के लिए—वागुरा है, मार्ग में तृण आदि से आच्छादित महान् गर्त है। इस मार्ग का पथिक होनेपर गर्तपात का भय है। यह बात कोई शास्त्रतत्त्वाभिज्ञ महान् मनीषी ही बता सकता है। यदि वह भोलीभाली शास्त्रतात्पर्यानभिज्ञ जनता का हितैषी है तो अवश्य ही यह बताना चाहिए। न बताना उनका अपने कर्तव्य से विचलित होना कहा जायगा। महाकवि श्रीहर्ष ने अपने नैषधीयचरित महाकाव्य में कहा है— "अध्वाग्रजाप्रन्निभृतापदन्धुर्वन्धुर्यदि स्यात् प्रतिबन्धुमर्हः ।” अर्थात् बन्धु के पुरोवर्ती मार्ग में आपित्तरूपी कूप या महान् गर्त तृण आदि से आच्छादित विद्यमान हो तो हितैषी पुरुष को बता देना उचित है कि इस मार्ग से मत जाओ, यदि जाओगे तो विपत्तिरूपी गहरे गड्ढे में गिर जाओगे । सत्सङ्ग के सिलसिले में किसी भक्त सज्जन ने कामिक बुल्के पादरी की रामकथा अनन्तश्रीविभूषित परमहंस- परिव्राजकाचार्य हरिहरानन्द सरस्वती करपात्रीजी महाराज को भेट की एवं उसके अवलोकन का सविनय अनुरोध किया । पुस्तक की अधिकांश सामग्री श्रीस्वामीजी को बहुत खटकी । फलतः रामायणमीमांसा के रूप में स्वामीजी के महान् सदय अवदान का प्रादुर्भाव हुआ । बुल्के की रामकथा चिरकाल से प्रकाशित है। वह उनका शोधग्रन्थ है । उसमें उन्होंने विभिन्न संस्कृति के विविध देशों की नाना रामकथाओं का उल्लेख कर श्रीरामचन्द्रजी के कतिपय चरितों का विशदरूप से जानने के प्रामाणिक साधन आर्ष महाकाव्य बाल्मीकिरामायण को अपने पाश्चात्य दृष्टिकोण से छिन्न-भिन्न कर उसके महत्त्व को न्यून करने की दुरभिसन्धिपूर्ण चेष्टा की है । भारतीय दर्शन में कुछ मत निरीश्वरवादी हैं। वे वेदविरोधी एवं वेदप्रतिपादित यज्ञयाग आदि के भी विरोधी हैं। उन्होंने रामायण की लोकप्रियता देखकर सोचा, लोकप्रिय रामायण की ओर आकृष्ट हमारे सम्प्रदाय की जनता रामायण-पाठ से ईश्वरभक्त, वेदानुगामी तथा यज्ञयागों के प्रति अभिरुचि रखनेवाली न बन जाय, इस भय से उन्होंने रामायण को अपने सांचे में ढाला है। अन्यान्य देशों में प्रचलित रामकथाओं में से किन्हीं में प्रायः मूल कथा वाल्मीकिरामायण के अनुसार ही है। बीच-बीच में वहाँ अपने देश की संस्कृति का पुट दे दिया गया है । नाम प्रायः सब बदल दिये गये हैं। रामायण का स्थल भी अपना देश ही माना गया है। उनमें हमारी संस्कृति का विरोध अधिक दृष्टिगोचर नहीं होता है, किन्तु अनेकों रामकथाओं में मूलकथा में भी विभेद है और विकृतियाँ प्रभूतमात्रा में