रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहैं । राम और सीता दोनों को दशरथ की सन्तति एवं भाई-बहन कहकर, अपनी संस्कृति के अनुसार, उनका वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किया गया है । राम और लक्ष्मण दोनों का, अपनी संस्कृति के अनुसार, सीता से विवाह प्रतिपादित है । बुद्धघोष की सुत्तनिपात टीका में शाक्य-वंश की उत्पत्ति के सिलसिले में लिखा है— वाराणसी की पटरानी की नौ सन्तानें थीं चार पुत्र और पाँच पुत्रियाँ । उनके मर जाने के बाद अम्बट्ठ राजा ने नया विवाह किया और अपनी युवती पत्नी को अपनी पटरानी बनाया । नयी पटरानी के पुत्र उत्पन्न होने पर राजा ने उसको एक वर प्रदान किया । उस वर के बल पर उसने अपने पुत्र के लिए राज्यसिंहासन का अधिकार माँगा । राजा ने स्पष्ट अस्वीकार कर दिया । किन्तु महिषी के षड्यन्त्रों से भयभीत होकर उन्होंने अपने पुत्रों को यह कह कर बनवास दिया कि मेरी मृत्यु के पश्चात् आओ और राज्य पर अधिकार करो । बहुत से लोग उसके साथ चल दिये और सभी ने बन में एक नगर बसाया । नगर को कपिलवस्तु नाम दिया गया । राजसन्तान के साथ विवाह करने योग्य वन में कोई नहीं था, अतः चारों राजकुमार अपनी बहनों से विवाह करने के लिए बाध्य हुए ।” यह है बौद्ध संस्कृति । उसी का प्रतिफल बौद्धों की रामकथा में प्रतिफलित हुआ है । और भी कई बातें भारतीय संस्कृति एवं इतिहास-पुराण के विरुद्ध हैं जैसे “दशरथ-पुत्र सहस्र-बाहु ने परशुराम के पिता की धेनु चुरायी, जिसके कारण परशु- राम सहस्रबाहु को मार डालते हैं । सहस्रबाहु के राम और लक्ष्मण दो पुत्र होते हैं । राम परशुराम का वध कर देते हैं । रामायण का मूल स्रोत बौद्ध जातकों में सुरक्षित है, रामायण कुशीलवों द्वारा जनता की अभिरुचि देखते हुए समय-समय पर बढ़ाया गया है, रामायण में रामावतारबोधक पद्य प्रक्षिप्त हैं, रामायण काव्य अयोध्या काण्ड से लेकर युद्ध काण्ड तक ही आदि कवि की रचना है, मागध और वन्दियों द्वारा बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड पीछे जोड़ दिये गये हैं । मूलकाव्यखण्ड के जातीय नायक आगे जोड़े गये अंशों में जातीय नायक के रूप में परिवर्तित हो गये । वह समस्त जनसमाज के लिए नैतिक आदर्श के प्रतीक बन गये । कुछ प्रक्षिप्त अंशों को छोड़कर मूल पाँच काण्डों में मनुष्यनायक के रूप में स्थित राम बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड में देवता के रूप में परिणत होकर विष्णु के साथ एकाकार हो गये ।” उनकी (श्रीबुल्के आदि की ) कल्पनालोक की असल रामायण ( जिसके अस्तित्स का कोई प्रमाण नहीं है एवं जो गगनप्रसूनायमान है ) में “राम की भगवत्ता या विष्णु का अवतार होने का कोई उल्लेख नहीं था । रामायण दो उपाख्यानों का ताल-मेल है । उनमें से दूसरा है सीता-हरण के कारण राम और रावण का युद्ध । यह मूलतः एक प्राकृतिक आख्यान है । इसमें अनेक काल्पनिक घटनाओं का समावेश है” इत्यादि, इत्यादि । ये ही सब दुष्कल्पनाएँ श्रीबुल्के के काल्पनिक प्रासाद की आधार शिलाएँ हैं । इन्हीं दुष्कल्पनाओं को सिद्ध करने के लिए वे कहते हैं— “राम वेदप्रतिपाद्य नहीं हैं, सीता नाम जो वेद में आया है वह लाङ्गलपद्धति का है किसी मानवी का नहीं है ।” वास्तविक्ता—
सुदूर पुराकाल त्रेतायुग में वाल्मीकिरामायण के प्रादुर्भाव का सूत्रपात
महर्षि वाल्मीकिजी ने कष्टप्रद समाधि से परम पुण्यराशि का अर्जन किया । उस पुण्यराशि से भगवान् अत्यन्त प्रसन्न हुए । उन्होंने देवर्षि नारद को वाल्मीकिजी के निकट जाने की आज्ञा दी । भगवान् की आज्ञा से अपनी संनिधि में पधारे हुए देवर्षि का सविधि अर्चन कर वाल्मीकि महर्षि ने उनसे पूछा—देवर्षे, सम्प्रति इस मर्त्यलोक में कौन गुणवान्, वीर्यवान्, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवक्ता, दृढ़व्रती, अनिन्द्य सर्वस्पृहणीय चरित्रों से सम्पन्न, प्रजारञ्जनसमर्थ, सकल जीवों के हितैषी, महान् विद्वान्, कामदेव से भी अधिक सुन्दर, स्वाधीनमना, क्रोधादिविहीन, जिनकी देहकान्ति को देखने के लिए सकल प्राणी उत्कण्ठित हों, रणाङ्गण में क्रुद्ध होने पर जिनके सम्मुख देवता भी न ठहर सकें ऐसा कौन पुरुष है ? उसे जानने का मुझे बड़ा कौतूहल हो रहा है । हे देवर्षे, आप ऐसे पुरुषरत्न को जानने में नितरां सक्षम हैं ।