रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३ ) महर्षि वाल्मीकिजी के प्रश्न पर देवर्षिजी ने सम्पूर्ण रामगुण एवं अत्यन्त संक्षिप्त रामचरित प्रसन्नतापूर्वक उनको बतला दिये । महर्षि द्वारा पूजित और सत्कृत होकर वे आकाशमार्ग से देवलोक को चले गये । देवर्षि के चले जाने के पश्चात् महर्षि वाल्मीकिजी मुहूर्त भर अपने आश्रम में ठहर कर स्नानादि माध्याह्निक कृत्य करने के निमित्त अपने शिष्य भरद्वाज के साथ तमसा नदी के तटपर गये । वहाँ उन्होंने प्रसन्न मुद्रा में दम्पती के रूप में विचरते हुए क्रौञ्चयुगल को देखा । उसमें से एक नरक्रौञ्च को पापात्मा व्याध ने मार डाला । रुधिर से लथपथ भूमिपर लुण्ठित उसे मृत देखकर क्रौञ्ची ने करुण क्रन्दन किया । क्रौञ्ची का करुण क्रन्दन सुनकर मुनि के करुणापूर्ण हृदय में महान् शोकानुभूति हुई । वही शोक करुण रसमय श्लोक बनकर महर्षि वाल्मीकिजी के मुखारविन्द से लोककल्याणार्थ संस्कृतसाहित्य के प्रथम श्लोक के रूप में प्रादुर्भूत हुआ— मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः । यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम् ॥ श्लोक बोलते हुए अन्तर्यामी की प्रेरणा से उनके हृदय में चिन्ता हुई कि पक्षी के शोक से पीड़ित हुए मैंने यह क्या कह डाला । यह काम बड़ा अयशस्कर हुआ । ऐसा चिन्तन करते हुए उन्होंने सत्यसङ्कल्प होने के कारण श्लोकवाक्य को शिष्य से कहा । शिष्य ने उसे ग्रहण कर लिया । श्लोक का आपात अर्थ तो व्याध के लिए शापरूप है—हे व्याध, तुम पुरुषायुष्य तक शान्ति या प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं कर सकोगे, क्योंकि तुमने क्रौञ्चयुगल में से एक को मार दिया है । परन्तु इसका वास्तविक अर्थ है—हे मानिषाद हे लक्ष्मीपते राम, आपने रावण और मन्दोदरी रूप क्रौञ्चयुगल में से एक लोककण्टक रावण को मार डाला, इसलिए आप शाश्वत काल तक प्रतिष्ठा को प्राप्त हों । इसके तुरन्त बाद ब्रह्माजी महर्षिश्रेष्ठ से मिलने के लिए आ पहुँचे । महर्षि ने उनका पाद्य, अर्घ्य, आसन, अभिवन्दन आदि से सत्कार-समर्चन किया । महर्षि क्रौञ्ची के करुण क्रन्दनजन्य दुःख को भूले नहीं थे । ब्रह्माजी ने मुस्कुराते हुए उनसे कहा—महर्षे, यह श्लोक ही आपने बनाया है, मेरी इच्छा से ही महाशक्ति सरस्वती आपके वदनारविन्द से आविर्भूत हुई हैं । हे ऋषिश्रेष्ठ, आप भगवान् राम का, जो धर्मात्मा एवं सबके अन्तर्यामी हैं, सम्पूर्ण चरित वह चाहे गुप्त हो, चाहे प्रकट हो, वर्णन कीजिए । केवल राम का ही नहीं लक्ष्मण का, सब राक्षसों का एवं विदेहनन्दिनी वैदेही का भी चरित चाहे प्रकट हो चाहे गुप्त हो वह सब वर्णन कीजिये । इस काव्य में आप की वाणी कदापि अनृत नहीं होगी । राम की मनोरम पुण्य कथा को श्लोकबद्ध कीजिए । जब तक पर्वत और नदियाँ भूतल में रहेंगी तब तक आप की रची रामकथा का प्रचार होगा । रामकथा का जब तक प्रचार होगा तब तक मेरे द्वारा निर्मित पुण्य लोकों में आप का निवास होगा । वेदवेद्य परम पुरुष भगवान् का दशरथ के पुत्र रामरूप में अवतार होने पर साक्षात् वेद का ही वाल्मीकि महर्षि से रामायण के रूप में अवतार हुआ । तपःपूत, अब्भक्ष, वायुभक्ष, वल्कलवसन महर्षि की समाधिजन्य ऋतम्भरा प्रज्ञा द्वारा प्रसूत, वेदावतारभूत कृति के सम्बन्ध में जो काट-छाँट करने का बुल्के आदि द्वारा दुःसाहस किया गया है, जैसे यहाँ से ( अमुक स्थान से ) आदि कवि की कृति का प्रारम्भ होता है एवं यहाँ ( अमुक स्थान में ) उनकी कृति का अवसान हो जाता है । अमुककाण्ड की पुष्पिका से उनकी कृति की समाप्ति सूचित होती है, ये श्लोक कुशीलवों द्वारा जोड़े गये हैं, ग्रन्थ का यह अंश आदि कवि की प्रतिभा के अनुरूप नहीं है, यह अंश पुनरुक्त है, यह शैली और ये विविध सुदीर्घ छन्द आदि कवि के नहीं जँचते, इत्यादि ओछे विचार अभिव्यक्त किये गये हैं । लाखों वर्षों से जनता जिसकी आराधना अध्ययनाध्यापन, टीका, टिप्पणी, व्याख्या एवं पाठ द्वारा कर रही है, जिसके विषय में सृष्टिकर्ता का आशीर्वादवचन “न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति” प्राप्त है एवं स्कन्दपुराण के अनुसार सप्तर्षियों का आशीर्वाद भी प्राप्त है—