रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४ ) स्वच्छन्दा भारती देवी जिह्वाग्रे ते भविष्यति । कृत्वा रामायणं काव्यं ततो मोक्षं गमिष्यसि ॥ जिस महामहनीय आदि काव्य ने भारतीय वाङ्मय को ही नहीं सारे संसार के वाङ्मय को प्रभावित किया है। भारत के विविध रामायणों एवं अधिकांश काव्य, नाटक, चम्पू, आख्यान, आख्यायिका आदि का उपजीव्य रामायण ही है। जिस रामायण की लोकप्रियता चमत्कारकारिणी है। उसके विषय में अपर्युक्त विचार कदापि श्लाघ्य नहीं। श्याम देश की रामकथा 'रामकेर्ति' के अनुवाद रामकीर्ति में रामायण का गुणगान इस प्रकार किया गया है— “जिन काव्य-रचनाओं ने विश्वसाहित्य पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है, उनमें रामायण महाकाव्य का स्थान सर्वोपरि है। धर्म और कथा के क्षेत्र में भी अपनी अमर लेखनी से एक विशिष्ट सम्प्रदाय का निर्माण किसी ने किया तो वह मानवता के आदि कवि, संस्कृत काव्य के जनक वाल्मीकि ही हैं। दूर-दूर देश के कवियों ने उनकी अनुकृति के असीम भण्डार से रत्न चुन-चुन कर अपने साहित्य को समृद्ध किया है। कलाकारों ने उनसे चिरस्थायी कला की प्रेरणा लेकर अपनी कलाकृति को अमर बनाया है। खेतों में काम करनेवाले किसान अथवा नाव चलानेवाले नाविक भी उससे अप्रभावित न रह सके। उनके गीतों को गुनगुनाते हुए वे अपनी थकावट भूल जाते हैं। उनकी लेखनी ने जिस सम्पूर्णता से प्रभाव डाला है वैसा और किसी की लेखनी ने नहीं डाला। थाई देश के छठे रामराज को ही यह श्रेय है कि उन्होंने रामकेर्ति के मूलरूप रामायण का पता लगा कर उसके रचयिता वाल्मीकि के बारे में जानकारी दी। कोई लोकप्रिय गीत लोगों को अपने माधुर्य से मोह लेता है तब लोग उसके सम्मोहन में फँस जाते हैं तो धीरे-धीरे इस बात को भूल जाते हैं कि इसका रचयिता कौन है ? वाल्मीकि के सम्बन्ध में भी ऐसा ही हुआ ।” महर्षि वाल्मीकिजी ने अपौरुषेय वेदों, उपनिषदों तथा देवर्षि नारदजी के उपदेशों से श्रीराम की कथावस्तु जानकर एवं समाधिजनित ऋतम्भरा प्रज्ञा से सम्पूर्ण चरित्रों का प्रत्यक्ष साक्षात्कार कर रामायण की रचना की। रामायण शतकोटि प्रविस्तर है, उसका सार २४ सहस्र श्लोकों का वर्तमान रामायण महाकाव्य है। उसके अन्यान्य अंशों के चरित्रों का किन्हीं अन्य महर्षियों को साक्षात्कार हो सकता है। वर्तमान रामायण की अधिकांश कथा- वस्तु तो श्रीराम की ४० वर्ष की आयु के अन्तर्गत की ही है। रामायण के अनुसार ११ हज़ार वर्षों तक श्रीराम धरातल में राज्य करते रहे, अतएव यदि उनके सम्पूर्ण जीवन का वृत्तान्त लिखा जाय तो शतकोटि श्लोक भी कम ही होंगे। रामायण की अति प्राचीनता जो रामायण के अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग परीक्षणों से सिद्ध है एवं श्रीराम- चन्द्र के अवतारबोधक वाल्मीकिरामायण के पद्य पाश्चात्य विद्वानों को बहुत अधिक खटकते हैं, इसलिए वे रामायण को अर्वाचीन सिद्ध करने एवं रामावतारबोधक पद्यों को प्रक्षिप्त, बाद के रचे हुए, सिद्ध करने के लिए निराधार एड़ी और चोटी का पसीना एक करते हैं। आधारभूत प्रमाण तो उनके पास कोई है नहीं, युक्तियाँ भी उनकी अत्यन्त लचर हैं। उनकी सब युक्तियों का प्रस्तुत ग्रन्थ में विस्तारपूर्वक निराकरण किया गया है। श्रीबुल्के कपटपूर्ण वचनों में यह भी कहते जाते हैं कि “भारतीय साहित्य में रामकथा की व्यापकता की अपेक्षा विदेशों में उसकी लोकप्रियता आश्चर्यजनक है। उनमें बौद्ध अनामकं जातकम्, दशरथकथानम् और उनके चीनी भाषानुवाद, तिब्बती, खोतानी रामायण भी है। हिन्दोनेशिया में सेरीराम, सेरतकाण्ड, रामकेर्ति, रामकियेन आदि प्रमुख हैं। रामकथा की इस व्यापकता एवं लोकप्रियता का श्रेय वाल्मीकिरामायण को ही है। विश्वसाहित्य के इतिहास में शायद ही किसी ऐसे कवि का प्रादुर्भाव हुआ हो जिसने भारत के आदि कवि के समान इतने व्यापकरूप से परवर्ती साहित्य को प्रभावित किया हो। रामायण की अद्वितीय लोकप्रियता निरन्तर अक्षुण्ण ही नहीं वरन्