भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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शताब्दियों तक बढ़ती रही, क्योंकि मानवहृदय को आकर्षित करने की अद्वितीय शक्ति जो रामकथा में विद्यमान है, वह अन्यत्र दुर्लभ है ।” परन्तु ऐसा क्यों ? इसका उत्तर उनके पास नहीं है । भारतीय दृष्टि के अनुसार उत्तर स्पष्ट है कि राम और कृष्ण की कथाएँ केवल वाग्विलास या कण्ठशोषणमात्र नहीं हैं, वह अनुपम शान्ति, भक्ति तथा मुक्ति देनेवाली हैं, इसी कारण उनकी लोकप्रियता है। भागवत में स्पष्ट उल्लेख है । श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्, मैंने बड़े-बड़े यशस्वी महापुरुषों की कथाएँ विज्ञान और वैराग्य की विवक्षा से ही कही हैं, उनमें परमार्थ नहीं है । किन्तु कृष्ण में अमल भक्ति चाहनेवाले साधकों को चाहिये कि जो उत्तमश्लोक भगवान् के अमङ्गलघ्न गुणानुवाद नित्य ही सन्त महात्माओं के मध्य संगीयमान हैं, गाये जाते हैं, उन्हें ही सुनें । भारतीय वाङ्मय में वर्णित रामकथा का आदर्श ठीक यही है कि वह रामचरित श्रवण और पठन से स्वच्छ मनोवृत्ति प्रदान करता है । जैमिनीयाश्वमेध में कहा है— सर्वे धर्माः समुद्दिष्टा वर्णाश्रमविभागशः । बृहद्धर्मपुराण ( १६।९ ) तथा वाग्देवी के अवतार मम्मट की कृति काव्यप्रकाश का भी यही कहना है— रामादिवद् वर्तितव्यं न रावणादिवत् ( का. प्र. १।२ ) अर्थात् राम आदि के तुल्य व्यवहार करना चाहिए रावण आदि के तुल्य नहीं । पद्मपुराण पातालखं० अ० २६ के अनुसार रामचरित में पातिव्रत्य, भ्रातृस्नेह, गुरुभक्ति आदि का आदर्श प्रस्तुत है— यस्मिन् धर्मविधिः साक्षात् पातिव्रत्यं च यत्स्थितम् । भ्रातृस्नेहो महान् यत्र गुरुभक्तिस्तथैव च ।। १२८ ।। स्वामिसेवकयोर्यत्र नीतिमूर्तिमती किल । अधर्मकरशास्तिर्वै यत्र साक्षाद् रघूद्वहात् ।। १२९ ।। यदि रामकथा में बुल्के द्वारा अकुटिल भाव से राम के इसी आदर्श का प्रतिपादन किया जाता तो वह स्पृहणीय वस्तु होता । किन्तु दोषैकदृक्त्व का ही नहीं दोषैकोद्भावनप्रवणत्व का समाश्रयण कर भिन्नदृष्टिकोण रखने- वालों के लिए पुस्तक अस्पृहणीय हो गयी है । राम साक्षात् मूर्तिमान् धर्म थे । श्रीभागवत आदि में मनुष्यों को धर्म की शिक्षा देकर लोकानुग्रह करना ही राम के अवतार का मुख्य प्रयोजन कहा गया है— “मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं रक्षोवधायैव न केवलं विभोः ।” अनवाप्तमवाप्तव्यं न ते किञ्चन विद्यते । लोकानुग्रह एवैको हेतुस्ते जन्मकर्मणोः ॥—कालीदास यदि ह्याहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः । उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ॥—गीता लोक-शिक्षा एवं लोकानुग्रह के लिए ही भगवान् राम के अवतार एवं कर्म हैं । सीता का पातिव्रत्य, राम की गुरुभक्ति एवं आज्ञापालन, लक्ष्मण का भ्रातृप्रेम, दशरथ की सत्यसन्धता, कौशल्या का वात्सल्य, भरत की भ्रातृभक्ति आदर्श लोकशिक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण हैं, अतः रामकथा में कथावस्तु भक्ति और मुक्ति देने के साथ-साथ आदर्श जीवन का एक महान् मार्ग दर्शन भी है। श्रीबुल्के रामकथा को विकास,