भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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कल्पना, परिवर्तन और परिवर्धन मानते हैं और कहते हैं "उसे भारतीय प्रतिभा शताब्दियों से परिष्कृत करती चली आ रही है। किन्तु वस्तुतः भारतीय प्रतिभा तो सदा तत्त्वपक्षपातिनी रही है। श्रीबुल्के कहते हैं "कैकेयी की कुटिलता वाल्मीकिरामायण में स्पष्टतया वर्णित है। आगे चलकर उसे निर्दोष ठहराने के लिए अनेकों उपायों का सहारा लिया गया है।" पर बेचारे बुल्के को यह पता नहीं है कि कैकेयी रामराज्य की बात सुनकर इतनी प्रसन्न हुई थी कि उसने मंथरा को अपने गले से हार निकाल कर दिया वास्तव में कुटिलता देवताओं की प्रेरणा से मंथरा के सिर चढ़ी। वस्तुतः इन बातों का समुचित समाधान रामचरितमानस तथा अध्यात्मरामायण में स्पष्टतया वर्णित है। मुख्य बात तो यह है कि रावणत्रस्त देवताओं की प्रार्थना पर ही परब्रह्म परमात्मा अवतीर्ण हुए थे। यदि कैकेयी वनवास का आग्रह न करती तो सीता-राम का वनवास न होता एवं सीताहरण न होता तो रावणवध आदि कार्य कैसे होते और रामायण का आविर्भाव कैसे होता ? आदिकवि वाल्मीकिजी के विषय में महाकवि कालिदास का कैसा गौरवमय दृष्टिकोण है ? उसपर भी दृष्टिपात करना अनुचित न होगा। वह कहते हैं, मैं मन्दमति हूँ, पर चाहता हूँ कवि की सी कीर्ति । अवश्य मैं लम्बे पुरुष से प्राप्य फल के लिए ऊपर को बाहें उठाये बौने के तुल्य उपहास्य होऊँगा । अथवा आदि कवि वाल्मीकि ने रघुवंश में प्रवेश करने के लिए दरवाजा बना दिया है, इसलिए जैसे वज्र से छिदी हुई मणि में प्रवेश करने में तागे को कोई कठिनाई नहीं होती वैसी ही मेरी भी स्थिति है। भारतीय संस्कृति में आकण्ठ निमग्न क्रान्तदर्शी महाकवि कालिदास ने महर्षि वसिष्ठजी की महामहनीयता, आदि कवि की परमश्लाघनीयता और रघुवंशी राजाओं का महान् औदार्य, विशुद्धि, विपुल पराक्रम, विद्वत्ता, तपश्चर्या आदि का जो मनोमोहक दिग्दर्शन कराया है उसे सात समुद्र पार के असंस्कृतमति पाश्चात्य कैसे हृदयंगम कर सकते हैं ? रामावतार वाल्मीकिरामायण में कहा है बलगर्वित उद्धत रावण वध की कामनावाले देवताओं की प्रार्थना पर महा- तेजस्वी भगवान् विष्णु ही मनुष्यलोक में रामरूप से अवतीर्ण हुए। उन अमिततेजा राम से कौशल्या वैसे ही शोभित हुई जैसे वज्रपाणि इन्द्र से अदिति देवी शोभित हुई थी । श्रीराम दिव्य लावण्य एवं सौन्दर्यपूर्ण दिव्य रूप से सम्पन्न, वीर्यवान् एवं असूयारहित थे। वे गुणों में दशरथ के तुल्य तथा भूमि भर में अनुपम पुत्र थे । वे नित्य शान्तात्मा, मृदुभाषी एवं स्मितपूर्वभाषी थे। दूसरों के परुष वचन बोलने पर भी वे परुष उत्तर नहीं देते थे। वे किसी के द्वारा किये गये एक उपकार से ही सन्तुष्ट हो जाते थे और आत्मवान् होने के कारण उसके सैकड़ों अपराधों का भी स्मरण नहीं करते थे। वे शीलवृद्ध, ज्ञानवृद्ध एवं वयोवृद्ध सज्जनों से अस्त्र-शस्त्रादिश्रम के भी मध्य में सदा ही वेद-वेदान्त- नीतिसम्बन्धी चर्चा करते ही रहते थे। अन्य अवसरों पर सज्जन पुरुषों से शास्त्ररहस्य की चर्चा ही करते थे । राम परम बुद्धिमान् थे । वे समागत लोगों से पहले कुशलक्षेम आदि पूछते थे। वे शब्दतः मधुराभिभाषी एवं अर्थतः प्रियं- वद थे। महान् वीर्यवान् होने पर भी अपने अमित वीर्य का उन्हें गर्व नहीं था । वे अनृत कथा कभी नहीं करते थे । वे विद्वान् थे तथा वृद्धों का सम्मान-सत्कार करते थे । प्रजाजन सदा राम का अनुरञ्जन करते थे और राम भी सदा ही प्रजा का अनुरञ्जन करते थे। प्रजा का अनुरञ्जन करने से ही राजा होता है "प्रजानुरञ्जनाद्राजा" इस उक्ति को वे चरितार्थ करते थे। राम दीन-दुःखियों पर दयार्द्र रहते थे । वे जितक्रोध एवं विशेषतः ब्राह्मणों के प्रतिपूजक थे। वे दीनहीनों पर अनुकम्पा करनेवाले धर्मज्ञ थे । दुष्टनिग्रह तथा इन्द्रियनिग्रह में वे सदा तत्पर एवं पवित्रात्मा थे । अपने कुल के अनुसार दया, दाक्षिण्य, शरणागत-रक्षण आदि धर्मों के प्रति उनकी बुद्धि का सदा झुकाव रहता था,