भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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( १९ ) अतएव वे क्षात्रधर्म प्रजापालनादि का बहुत आदर करते थे एवं उससे महान् स्वर्गफल की प्राप्ति समझते थे । श्रेय के विपरीत कर्म में उनकी कदापि अभिरुचि नहीं होती थी एवं धर्मविरुद्ध कथा की ओर भी उनकी रुचि नहीं थी । वाद, जल्प आदि कथाओं में वे बृहस्पति के तुल्य स्वसिद्धान्तनिर्वाहक युक्तियों के वक्ता थे । उनका शरीर सत्कर्मानुष्ठानसमर्थ, तरुण, विपुलांसत्व आदि लक्षणों से सम्पन्न था । वे तत्-तत् कर्मयोग्य देश और काल के ज्ञाता थे एवं निग्रह और अनुग्रह के लिए पुरुषों की अधर्मिष्ठता एवं धर्मनिष्ठता जानते थे । ऐसा प्रतीत होता था कि मानो ब्रह्मा द्वारा वे संसार में एकमात्र सर्वगुणसम्पन्न साधु पुरुष निर्मित हुए हैं । राम गुणों के कारण श्रेष्ठ गुणों से युक्त प्रजाजनों के बहिश्चर प्राणों के तुल्य परम प्रिय थे । वे यथावत् साङ्गोपाङ्ग वेदों के ज्ञाता थे एवं तत्-तत् क्रियाओं के लिए अपेक्षित व्रतों का अनुष्ठान कर व्रतस्नात हुए थे । मन्त्रविहीन शस्त्रों एवं मन्त्रयुक्त शस्त्रास्त्रों में भगवान् श्रीराम अपने पिता से भी श्रेष्ठ थे । वे अखिल कल्याणों के उत्स थे एवं परकार्यसाधक श्रेष्ठ पुरुषों में अग्रगण्य थे । क्षोभहेतु के उपस्थित होने पर भी उनका अन्तःकरण कभी क्षुब्ध नहीं होता था, वे कृच्छ्रकाल में भी सत्य ही बोलते थे, वे धर्मार्थदर्शी वृद्ध ब्राह्मणों द्वारा शिक्षित एवं सौम्य थे । वे धर्म, अर्थ और काम के याथात्म्य के जाननेवाले, स्मृतिमान् तथा प्रतिभासम्पन्न थे । वे लौकिक कार्यों को करने में सामर्थ्यसम्पन्न थे । वे विनीत, गूढ़ अभिप्रायवाले तथा फल- निष्पत्तिपर्यन्त मन्त्रणा को गुप्त रखनेवाले थे । वे मित्रत्वेन सर्वसाधारण को अज्ञात मित्रों से सुरक्षित थे एवं उन्हीं के द्वारा परराष्ट्र-भेद आदि जानने में पूर्ण साहाय्य प्राप्त करते थे । उनके क्रोध और हर्ष दोनों अमोघ थे, जिसपर प्रसन्न होते थे, उसे निहाल कर देते थे । सत्पात्र में वित्तदान एवं न्यायपूर्वक अर्थसंग्रह के वे कालज्ञ थे । वे गुरु आदि में दृढ़भक्तिसम्पन्न तथा स्थिरप्रज्ञ थे । वे असद्ग्राही दुर्वचन कभी नहीं बोलते थे । वे आलस्यरहित, सावधान एवं स्वदोष तथा परदोष के ज्ञाता थे । वे शास्त्रज्ञ, कृतज्ञ तथा पुरुषों के तारतम्य को जाननेवाले थे । न्यायानुकूल निग्रह, प्रग्रह और अनुग्रह करने में दक्ष थे । वे सत्पुरुषों के संग्रह तथा सपरिवार सत्पुरुषों के पालन एवं दुष्टों के निग्रह का देश और काल जानते थे । वे आयकर्म के उपायों को जानते थे, जैसे मधुकर पुष्पों से रस का संग्रह करता है वैसे ही प्रजा से यथोचित धन ग्रहण करने में चतुर थे एवं शास्त्रदृष्ट व्ययकर्म के भी अच्छे जानकार थे । आय के अर्धभाग, चतुर्भाग या त्रिभाग के व्यय की व्यवस्था जानते थे । वे शास्त्रसमूहों तथा प्राकृतादि भाषा मिश्रित नाटकादि में निपुण थे । निरालस्य होकर धर्म और अर्थ का संग्रह कर धर्म और अर्थ के अविरोधी काम का भी आदर करते थे । क्रीड़ा प्रयोजनवाले गीत, वाद्य, चित्रकर्म आदि के विज्ञाता थे तथा अर्थ के “धर्माय यशसेऽर्थाय कामाय स्वजनाय च” इस पञ्चधा विभाग के ज्ञाता एवं अनुष्ठाता थे । अश्व, हस्ती आदि के आरोहण, नियन्त्रण एवं गत्यादिशिक्षण में वे सावधान थे । वे धनुर्वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ एवं अतिरथों में समादृत थे । वे परसेना के अभिमुख अभियान करनेवाले एवं शत्रुओं पर प्रहार करनेवाले थे । सेनाओं के नयन तथा व्यूहादिनिर्माण आदि में वे विशारद थे । संग्रामाङ्गण में क्रुद्ध हुए वे देवताओं तथा दानवों के द्वारा भी अप्रधृष्य थे । असूया, क्रोध, घमण्ड तथा मत्सर से वे सर्वथा रहित थे । कोई भी प्राणी उनकी अवज्ञा नहीं कर सकता था । प्राकृत पुरुषों के तुल्य वे कालपराधीन न होकर स्वायत्त- सकल परिकर थे । इस प्रकार सर्वश्रेष्ठ गुणों से युक्त राजकुमार राम प्रजाजनों के परम सम्मत तथा परमप्रीतिपात्र थे । वे अपने क्षमाप्रधान गुणों के कारण पृथिवी के तुल्य, बुद्धि में बृहस्पति के तुल्य एवं वीर्य में इन्द्र के तुल्य थे । पिता की प्रसन्नता को निःसीम बढ़ानेवाले तथा सभी प्रजाजनों के अभीष्ट उत्तम गुणों से राम इस प्रकार प्रदीप्त हुए जैसे अंशुजालों से सूर्य दीप्त होते हैं । एवं गुणसम्पन्न अप्रधृष्यपराक्रमसमन्वित राम लोकनाथ भगवान् विष्णु के तुल्य थे । उन श्रीरामचन्द्रजी को पृथिवी ने अपना पति बनाना चाहा । महाराज दशरथ को अपनी वृद्धावस्था देखते हुए यह अभिलाषा हुई कि मेरे जीतेजी राम कैसे राजा हों—

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