भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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( ८ ) अथ राज्ञो बभूवेव वृद्धस्य चिरजीविनः । प्रीतिरेषा कथं रामो राजा स्यान्मयि जीवति ॥ एवंगुणगणविशिष्ट दाशरथि श्रीराम भगवान् परब्रह्म परमात्मा के अवतार थे इस सन्दर्भ में प्रस्तुत ग्रन्थ में वेद, रामायण, अष्टादश पुराण, महाभारत, चाणक्य के अर्थशास्त्र, शुक्रनीति आदि अनेक प्राचीन ग्रन्थों के वचन प्रचुर मात्रा में उद्धृत किये गये हैं । हम यहाँ पर पहले महाराज विक्रमादित्य की सभा के नवरत्नों में अन्यतम क्रान्तदर्शी महाकवि सरस्वती के वरदपुत्र कालिदास के कतिपय अनुष्टुप् छन्दों को उद्धृत करते हैं— स्रष्टुर्वरातिसर्गात्तु मया तस्य दुरात्मनः । अत्यारूढं रिपोः सोढं चन्दनेनेव भोगिनः ॥ धातारं तपसा प्रीतं ययाचे स हि राक्षसः । दैवात्सर्गादवध्यत्वं मर्त्येष्वस्थापराङ्मुखः ॥ सोऽहं दाशरथिर्भूत्वा रणभूमेर्बलिक्षमम् । करिष्यामि शरैस्तीक्ष्णैस्तच्छिरःकमलोच्चयम् ॥ मोक्षध्वं स्वर्गवन्दीनां वेणीबन्धान्दूषितान् । शापयन्त्रितपौलस्त्यबलात्कारकचग्रहैः ॥ भगवान् विष्णु कहते हैं—ब्रह्माजी के वरप्रदान के कारण मैंने उस दुरात्मा रिपु का दिन पर दिन ऊपर चढ़ना वैसे ही सहा है जैसे सर्प का अपने ऊपर चढ़ना चन्दन का वृक्ष सह लेता है । उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए ब्रह्मा से उस राक्षस ने दैवी सृष्टि से अपना अवध्यत्व वर मांगा, मानवी सृष्टि से अवध्यत्व का वर नहीं माँगा, क्योंकि मनुष्यों में उसकी तनिक भी आस्था नहीं थी । इसलिए मैं दशरथ-पुत्र होकर तीक्ष्ण बाणों से उसके सिररूपी कमलराशि को रणभूमि को चढ़ा दूँगा । रावण ने स्वर्ग की जिन देवियों को बन्दी बना रक्खा है, नलकुबर के शाप से नियन्त्रित पौलस्त्य ( रावण ) के द्वारा केशग्रहण से अदूषित वेणियों ( जूड़ों ) को अब आप लोग खोलेंगे । कालिदास का काल ईसवी सन् से समधिक १०० वर्ष से पूर्व का काल निश्चित है । वे विक्रम संवत् के संस्थापक महाराज विक्रमादित्य की सभा के नवरत्नों में अन्यतम थे । विक्रम संवत् ईसवी सन् से ५७ वर्ष पूर्व स्थापित हुआ था, उस समय उनकी अवस्था ५० वर्ष की भी मानी जाय तो वे सन् संवत् के आरम्भ में १०७ वर्ष के होंगे । ब्रह्मा कहते हैं—हे विभो हे विष्णो, आप अपने को चार प्रकार का कर धर्मात्मा, महान् दानी, अयोध्या- धिपति राजा दशरथ, जो महर्षियों के तुल्य तेजस्वी हैं, की ह्री, श्री और कीर्ति के तुल्य तीन पत्नियों में पुत्रता को प्राप्त होइये— राज्ञो दशरथस्य त्वमयोध्याधिपतेर्विभो ॥ १९ ॥ धर्मज्ञस्य वदान्यस्य महर्षिसमतेजसः । अस्य भार्यासु तिसृषु ह्रीश्रीकीर्त्युपमासु च ॥ २० ॥ विष्णो पुत्रत्वमागच्छ कृत्वात्मानं चतुर्विधम् । तत्र त्वं मानुषो भूत्वा प्रवृद्धं लोककण्टकम् ॥ २१ ॥ अवध्यं दैवतैर्विष्णो समरे जहि रावणम् ॥ २२ ॥ ( वा० रा० १।१५ ) परशुरामजी कहते हैं—हे परन्तप, इस वैष्णव धनुष के ग्रहण, आकर्षण आदि से, जिसकी कोई दूसरा प्रत्यक्षा नहीं चढ़ा सकता, मैं आपको अनाद्यन्त, किसी के द्वारा न जीते जा सकनेवाले सुरेश्वर मधुसूदन जानता हूँ ।