रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअधिकार कर लिया गया होगा । स्पष्ट ही है कि वस्तुस्थिति एवं अटकल में बहुत भेद होता है । बुल्के स्वयं मानते हैं कि प्रक्षिप्त सर्गों का ठीक-ठीक निर्णय करना कठिन है । हनुमान् की हिमालय-यात्रा ५६४ वें अनु० में वे कहते हैं, "हनुमान् की हिमालय-यात्रा का दो बार सर्ग ७४ और सर्ग १०१ में वर्णन हैं । वे कहते हैं इसके प्रक्षिप्त होने का सबसे महत्त्वपूर्ण तर्क हनुमान् के समुद्र-लङ्घन का वर्णन है (वा० रा० ५।१) । हिमालय की यात्रा इस लङ्घन से कहीं अधिक असाधारण है। फिर भी इस कार्य की कठिनाई का वर्णन नहीं किया गया । यदि समुद्र-लङ्घन तथा हिमालय यात्रा का वर्णन दोनों एक के ही द्वारा रचित होते तो हिमालय-यात्रा को अधिक महत्त्व दिया जाता । महाभारत में हनुमान् की हिमालय-यात्रा का उल्लेख नहीं है ।" परन्तु यह भी उनकी भ्रान्ति ही है, कारण स्पष्ट है । १०० योजन समुद्र का लङ्घन ही कठिन काम था, क्योंकि उसमें बीच में कहीं ठहरने या रुकने का अवकाश नहीं था। हिमालय-यात्रा में वह कठिनाई नहीं थी । पर्वतों और वृक्षों को उखाड़ कर लाना तो उन असाधारण बन्दरों के लिए कठिन था ही नहीं । इसके अतिरिक्त एक बड़ी कठिनाई के वर्णन के बाद पुनः पुनः वैसा ही वर्णन महत्त्वपूर्ण नहीं माना जाता । महाभारत का रामोपाख्यान तो संक्षेप कथानक ही है । अतः उसमें हिमालय-यात्रा का वर्णन न होना लाघवार्थ ही है । बुल्के कहते हैं कि "त्रिष्टुप् छन्दों का बाहुल्य भी प्रामाणिकता के सम्बन्ध में सन्देह उत्पन्न करता है । सर्ग १०१ को हटाने पर १०० का १०२ से सुगमता से मेल बैठ जाता है । १०० के कुछ श्लोक १०२ में दुहराये गये हैं । इससे भी १०० का प्रक्षिप्त होना सिद्ध होता है," पर यह भी तर्क लचर ही है, क्योंकि महाकाव्यों में विविध छन्दों का होना दूषण न होकर भूषण ही है । मेल तो सर्गान्त के श्लोकों से ही हो जाता है फिर तो बीच के सभी श्लोक प्रक्षिप्त ही ठहरेंगे । इस दृष्टि से देखा जायगा तो सारी बाइबिल प्रक्षिप्त ही सिद्ध होगी । चमत्कारवाली सारी घटनाएँ बाइबिल की प्रक्षिप्त ही सिद्ध होंगी । अग्नि-परीक्षा ५६५ अनु०, अग्नि-परीक्षा के सम्बन्ध में पिछले प्रकरण में विचार हो ही चुका है । इसी तरह ५६६ वें अनु० में पुष्पक-यात्रा सर्ग १२३ को बुल्के प्रक्षेप कहते हैं । "यदि रावण के पास पुष्पक होता तो सीता-हरण में उसका उपयोग वर्णित होता, किन्तु अरण्यकाण्ड में उसका उल्लेख नहीं है । सुन्दरकाण्ड का पुष्पक-वर्णन सर्ग भी प्रक्षिप्त है । युद्धकाण्ड की अन्तरङ्ग परीक्षा से भी प्रतीत होता है कि आदिरामायण में वापसी यात्रा में पुष्पक का कोई उल्लेख नहीं था । सर्ग १२३ के अन्त में पुष्पक द्वारा अयोध्या के पास पहुँचने का उल्लेख किया गया है, किन्तु सर्ग १२४ में वनवास की समाप्ति पर राम के भरद्वाज आश्रम में पहुँचने का वर्णन है । लङ्का में राम ने विभीषण से दुर्गम मार्ग का उल्लेख किया था— “अयोध्यां गच्छतो ह्येष पन्थाः परमदुर्गमः ।” (वा० रा० ६।१२१।७) भरद्वाज आश्रम में राम ने मुनि से यह वरदान माँग लिया था कि मार्ग में सभी वृक्ष अकाल में भी फल- दार हों “अकालफलिनो वृक्षाः ।” इसके अतिरिक्त हनुमान् से समाचार प्राप्त करने के पश्चात् जब अयोध्यावासी राम के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे तब वानर-सेना द्वारा गोमती नदी पार करने का तथा उनके द्वारा उड़ायी गयी धूल का उल्लेख किया गया है— "मन्ये वानर-सेना सा नदीं तरति गोमतीम् । रजोवर्षं समुद्भूतं पश्य सालवनं प्रति ॥" (वा० रा० ६।१२७।२८)