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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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५५० रामायणमीमांसा अष्टादश

इन उद्धरणों से अनुमान किया जा सकता है कि आदिरामायण में राम स्थल-मार्ग से ही अयोध्या लौटे थे । अतः पुष्पकविषयक सामग्री को विशेषकर सर्ग १२३ को प्रक्षिप्त माना जाना चाहिये।" बुल्के की उक्तियाँ कुशकाशावलम्बन के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं। पहले नास्तिक लोग यह विश्वास ही नहीं करते थे कि उड़ने- वाला यथेष्ट मनुष्यों को लेकर चलनेवाला भी विमान हो सकता है ? परन्तु आज विमानों के बाहुल्यकाल में समझदार लोग अब वैसी शङ्का नहीं करते हैं, पर फिर भी पाश्चात्यों का यह अन्धविश्वास आज भी बना हुआ है कि दुनिया में सभ्यता या विज्ञान का विकास ईसा के पहले हो ही नहीं सकता। इसी कारण वाल्मीकिरामायण तथा सभी रामायणों में प्रसिद्ध पुष्पक यान को बुल्के झुठलाने का प्रयत्न करते हैं। इसी लिए वे सुन्दरकाण्ड के पुष्पक-वर्णन को भी झुठलाते हैं। यह कोई तर्क ही नहीं है कि यदि पुष्पक होता तो सीता-हरण में उसी का प्रयोग होता। आज भी वायुयान रहने पर कई बार राष्ट्रपति और प्रधानमन्त्री मोटर पर भी यात्रा करते हैं। एतावता कौन कह सकता है कि राष्ट्रपति को वायुयान सुलभ नहीं है। इतना ही क्यों पुष्पक यान द्वारा ही रावण ने युद्ध क्यों नहीं किया ? यह भी शङ्का हो सकती है। बुल्के को क्या अभीष्ट है ? क्या वे यह कहना चाहते हैं कि पुष्पक यान था ही नहीं ? या था तो परन्तु उसका प्रयोग ही नहीं हुआ ? दोनों बातों में उक्त हेतु सङ्गत नहीं है, क्योंकि अमुक समय पर उसके प्रयोग का उल्लेख न होना उसके अभाव का साधक नहीं होता। जब कि उसके विपरीत सुन्दरकाण्ड में पुष्पक का वर्णन है। पुष्पक द्वारा राम की यात्रा का भी वर्णन है। केवल एक स्थल के अनुल्लेख से दो स्थलों के उल्लेख को अनुल्लेख कैसे मान लिया जाय ? यदि अरण्यकाण्ड में उल्लेख होता भी तो भी सुन्दरकाण्ड के उल्लेख के समान ही उसको प्रक्षिप्त कहने में आपको क्या बाधा हो सकती थी ? दूसरा तर्क और भी निस्सार है। यदि आप सर्ग १२१ के ७ वें श्लोक को प्रमाण मानते हैं तो उसके पूर्वापर के श्लोकों को भी प्रमाण मानना ही पड़ेगा । अयोध्या का दुर्गम मार्ग है, यह कहने का प्रसङ्ग ही क्यों आया और फिर उसका समाधान क्या हुआ ? इन बातों पर विचार करने से स्पष्ट हो जाता है कि विभीषण ने प्रार्थना की कि ये अलङ्कारकुशल पद्माक्षी स्त्रियाँ आपको विधिवत् उद्वर्तन, अभ्यङ्ग, स्नान, अङ्गराग, वस्त्राभरण, चन्दन तथा दिव्य माल्य धारण करायेंगी। इसपर राम ने विभीषण से कहा कि सुग्रीव प्रभृति मुख्य वानरों को स्नानादि करने को निमन्त्रित करो। वह धर्मात्मा सुखोचित सुकुमार सत्यसंश्रय महाबाहु भरत मेरे लिए तपस्याभिरत होकर संतप्त हैं। उन कैकेयीपुत्र धर्मचारी भरत के विना मुझे स्नान, वस्त्राभरण आदि कुछ भी इष्ट नहीं है। अतः हम शीघ्र ही जाना चाहते हैं। अयोध्या जाने का रास्ता बड़ा ही दुर्गम है। राम का ऐसा वचन सुनकर ही विभीषण ने कहा कि मैं आपको एक ही दिन में अथवा झटिति अयोध्या पहुँचाऊँगा । सूर्यसंनिभ पुष्पक नामक विमान, जो कि कुबेर का था, जिसे बलवान् रावण ने जीत लिया था। वह कामगामी दिव्य विमान आपके लिए प्रस्तुत है। इससे आप शीघ्र ही अयोध्या पहुँच जायँगे। इससे स्पष्ट है कि अयोध्या का मार्ग दुर्गम है। भरत का विश्लेष अधिक काल तक अब सह्य नहीं है। इस स्थिति में पुष्पक का प्रयोग उपयुक्त ही है। बुल्के के अनुसार यदि पद-यात्रा होती तो लङ्का से अयोध्या पहुँचने में कम से कम तो एक मास का समय अपेक्षित होता। बहुसंख्यक वानर दल को लेकर इतनी दूर की यात्रा का उल्लेख भी कहीं नहीं है, अतः सर्ग १२१ के ७ वें श्लोक से ही पुष्पक यान द्वारा राम की अयोध्या-यात्रा प्रमाणित होती है। वहीं विभीषण ने यह भी कहा, यदि मैं आपका अनुग्राह्य हूँ, यदि आप मेरे गुणों और सेवाओं को स्मरण करते हैं, यदि मुझमें आपका सौहार्द है तो आप यहाँ सर्वकामों से अचित होकर कुछ समय निवास करें। ससैन्य तथा ससुहृद्गण मेरी सत्क्रिया को स्वीकार करें। मैं बड़े प्रणय, संमान तथा सौहार्द से आपसे प्रार्थना करता हूँ। मैं आपका प्रेष्य ( सेवक ) हूँ, आज्ञा नहीं प्रार्थना करता हूँ। मेरी सेवा ग्रहण के अनन्तर ही आप अयोध्या का प्रस्थान करें। राम ने सुन रहे सभी वानरों और राक्षसों के बीच में कहा कि वीर, मैं तुम्हारे परम सौहार्द, उत्कृष्ट प्रयत्नों तथा उत्कृष्ट साचिव्य ( मन्त्रणा ) से पूजित हो चुका हूँ। मैं तुम्हारी बात न मानूंगा यह नहीं, किन्तु राक्षसेश्वर, अपने उस भरत को