भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 628

अध्याय युद्धकाण्ड ५५१ देखने के लिए मेरा मन अत्यन्त आतुर है, जो मुझे लौटाने के लिए चित्रकूट आया था और पादलग्न सिर से लौटाने के लिए प्रार्थना कर रहा था, फिर भी जिसकी बात को मैंने नहीं स्वीकार किया। कौशल्या, सुमित्रा तथा यशस्विनी कैकेयी, सुहृद् गुहराज तथा जानपदों को देखने के लिए मेरा मन त्वरित है, अतः मुझे जाने की ही अनुमति दो । सौम्य, मन्यु नहीं करना । मैं तुमसे अनुमति देने की प्रार्थना करता हूँ । राक्षसेश्वर, अब कृतकार्य होने पर विलम्ब उचित नहीं । शीघ्र ही विमान लाओ— “स तु ताम्यति धर्मात्मा मम हेतोः सुखोचितः । सुकुमारो महाबाहुर्भरतः सत्यसंश्रयः ॥ तं विना कैकेयीपुत्रं भरतं धर्मचारिणम् । न मे स्नानं बहुमतं वस्त्राण्याभरणानि च ॥ एतत्पश्य यथा क्षिप्रं प्रतिगच्छामि तां पुरीम् । अयोध्यां गच्छतो ह्येष पन्थाः परमदुर्गमः ॥ एवमुक्तस्तु काकुत्स्थं प्रत्युवाच विभीषणः । अह्ना त्वां प्रापयिष्यामि तां पुरीं पार्थिवात्मज ॥ पुष्पकं नाम भद्रं ते विमानं सूर्यसन्निभम् । त्वदर्थं पालितं चेदं तिष्ठत्यतुलविक्रम ॥ येन यास्यसि यानेन त्वमयोध्यां गतज्वरः ॥” (वा० रा० ६।१२१।५–११) इस प्रसङ्ग से स्पष्ट ही पुष्पक-यात्रा की सङ्गति प्रतीत होती है । सर्ग १२३ को प्रक्षिप्त मान लेने से यही कहना पड़ेगा कि एकदम १४ वर्ष पूर्ण होने पर पञ्चमी के दिन भरद्वाज के आश्रम में आ गये । पर यह वर्णन अस्वाभाविक ही होगा, स्वाभाविक यही है कि पुष्पक यान के द्वारा लौटते हुए राम सीता को त्रिकूटशिखरस्थित लङ्का, युद्धस्थली, रावण, कुम्भकर्ण, मेघनाद आदि के वधस्थलों को बतलाते हुए सेतुबन्ध महादेव आदि की चर्चा करते हुए किष्किन्धा आये । वहाँ से सुग्रीवादि के अन्तःपुर को लेकर ऋष्यमूक, पम्पा, कबन्ध-वधस्थल, जटायुमुक्ति- स्थान, गोदावरी, अगस्त्य और शरभङ्ग के आश्रम और चित्रकूट दिखलाते हुए ऊपर से दिखायी देनेवाली अयोध्या को दिखलाकर भरद्वाज के आश्रम में उतरे । कोई दुस्तर्क ही करने बैठे तो कह सकता है राम अगस्त्य के आश्रम में तथा चित्रकूट आदि में क्यों नहीं रुके । भरद्वाज के आश्रम में ही क्यों रुके, सीधे अयोध्या क्यों नहीं चले आये ? अस्तु, सर्ग १२४ में राम ने स्वयं वरदान नहीं माँगा, किन्तु महर्षि ने ही सम्पूर्ण वृत्तान्त का वर्णन कर कहा कि जैसे ब्रह्मादि देवताओं ने वरप्रदान किया था वैसे ही मैं भी आपको वरप्रदान करता हूँ। तब राम ने वानरों के सुख के लिए वरदान माँगा कि सभी वृक्ष उत्तमोत्तम अमृततुल्य रस और गन्धयुक्त फलवाले तथा उत्तमोत्तम मधुस्रावी हो जायँ । पर इससे यह नहीं सिद्ध होता है कि राम पदाति वानरों के साथ चल रहे थे । इसी तरह वानर- सेना गोमती पार कर रही थी, उससे उड़ी हुई धूलि से इतना ही सिद्ध होता है कि वानर-सेना नदी पार कर रही थी और वही वहाँ पदाति चल रही थी । सेतुबन्ध होने पर भी बहुत से बन्दर उड़कर तथा कूदकर पार जा रहे थे । हनुमान् तथा अङ्गद पर आरूढ होकर राम और लक्ष्मण वानरी-सेना के आगे चल रहे थे । बहुत से वानर बीच में, बहुत से अगल बगल चल रहे थे, कई लोग सलिल मार्ग से चल रहे थे एवं बहुत से सुपर्ण के तुल्य आकाशमार्ग से ही चल रहे थे— “सलिलं प्रपतन्त्यन्ये मार्गमन्ये प्रपेदिरे । केचिद् वेहायसगताः सुपर्णा इव पुप्लुवुः ॥” (वा० रा० ६।१२४।८१ )