भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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इसी तरह वानर लोग मधुर फल एवं सुगन्धित मधु पान करते हुए भूमिमार्ग पर चल रहे थे। वे ही लोग गोमती पार करते हुए धूलि उड़ा रहे थे । उसी सर्ग १२७ का जहां वानरों के गोमती पार करने की चर्चा है वहीं यह भी वर्णन है कि हनुमान् ने बतलाया यह तरुणादित्य संकाश विमान आ रहा है । इसमें वैदेही के साथ राम और लक्ष्मण विराजमान हैं। उनके साथ सुग्रीव एवं राक्षसराज विभीषण बैठे हैं। इस तरह प्रधान प्रधान लोग विमान में थे । अन्य बहुत से लोग आकाश-मार्ग तथा स्थल-मार्ग से चल रहे थे । “विमानं पुष्पकं दिव्यं मनसा ब्रह्मनिर्मितम् ।” ३०।। “एतस्मिन् भ्रातरो वीरो वैदेह्या सह राघवौ । सुंग्रीवश्च महातेजा राक्षसश्च विभीषणः ।। "३२।। (वा० रा० ६।१२९) यदि इसे प्रक्षेप कहें तो गोमती तरणवाले श्लोक को ही क्यों न प्रक्षेप कहा जाय ? अतः १२५ वें सर्ग के अनुसार समझना चाहिये कि आकाश-मार्ग से आते हुए राम ने अयोध्या देखकर विचार किया कि आज पञ्चमी को ही १४ वाँ वर्ष पूर्ण हो रहा है। भरद्वाज के आश्रम में विलम्ब हो सकता है। भरत की प्रतिज्ञा थी कि यदि १४ वर्ष पूर्ण होने पर आपका दर्शन न होगा तो मैं अग्नि में प्रवेश करूँगा । इसलिए राम ने हनुमान् पर दृष्टि डाली और कहा तुम अयोध्या शीघ्र जाओ और जानो कि सब लोग सकुशल हैं ? शृङ्गवेरपुर जाकर मेरे आत्मतुल्य सखा निषाद- राज से कुशल कहो । वे सब अयोध्या की स्थिति बतलायेंगे । भरत को सब समाचार बताओ और भरत आदि का अभिप्राय जानो । यदि वे राज्य चाहते हों तो वही सम्पूर्ण वसुधा का शासन करें । इस तरह भरत का अभिप्राय जान जब तक आश्रम से दूर अयोध्या के समीप न पहुँचें तभी तक लौटकर सब समाचार बताओ । हनुमान् आकाशमार्ग से शीघ्र ही गुहराज से मिल कर भरत से मिले । भरत को सविस्तर राम का सारा समाचार सुनाया और भरत की दृढ़ प्रीति की स्थिति का प्रत्यक्ष दर्शन किया । पद्मपुराण के अनुसार पञ्चमी को ही हनुमान् ने अयोध्या जाकर देखा कि भरत अग्नि-प्रवेश की तैयारी कर रहे हैं— "अग्निप्रवेशे सोद्योगः काले भ्रातुरनागमात् । न्यवेदयत्तदा तस्मै श्रीरामागमनोत्सवम् ॥” ( वा० रा० ६।१२५।१ टीकोद्धृत पद्मपुराणवचन ) भ्राता राम के न आने के कारण भरत अग्नि-प्रवेश की तैयारी कर रहे थे । हनुमान् ने जाकर उन्हें श्रीराम के आगमन का शुभ समाचार सुनाया था । अपने सखा वानरेन्द्र सुग्रीव, जाम्बवान्, अङ्गदादि तथा विभीषण आदि की प्रियकामना से ही समुचित स्वागत आदि के लिए राम ने हनुमान् को अयोध्या भेजा था— “प्रियकामः प्रियं रामस्ततस्त्वरितविक्रमः ।” ( वा० रा० ६।१२६।१ ) सभी वानरों के सम्मान एवं स्वागत के लिए ही राम ने भरद्वाज से दिव्य गन्ध और रस से युक्त अमृतो- पम फलों से युक्त एवं मधुस्रावी वृक्षों के होने का वरदान माँगा था। भरद्वाज के वर-प्रदान से सभी वृक्ष कल्पवृक्ष के समान दिव्य पुष्प और फलों से लद गये थे । शुष्क वृक्ष भी पत्र, पुष्प, फल तथा दिव्य मधु प्रस्रवणशील हो गये । अयोध्या के मार्ग में सब तरफ तीन तीन योजन तक यही स्थिति रही— “अभवन् पादपास्तत्र स्वर्गपादपसन्निभाः । निष्फलाः फलिनश्चासन् विपुष्पाः पुष्पशालिनः ॥ शुष्काः समग्रपत्रास्ते नगाश्चैव मधुस्रवाः । सर्वतो योजनास्तिस्रो १ गच्छतामभवंस्तदा ॥" (वा० रा० ६।१२६।२१,२२) १. योजना त्रीणि इति वा पाठः ।