भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 631, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 631

५५४ रामायणमीमांसा अष्टादश गौड़ीय पाठ ५६८ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि विभीषण-चरित रावणसभा-सम्बन्धी सर्गों में से दो ही सर्ग प्रामाणिक प्रतीत होते हैं। सर्ग ९ की मुख्य कथावस्तु है विभीषण द्वारा लङ्का के विनाश की आशङ्का तथा सीता को लौटाने का रावण से अनुरोध । १६ वें सर्ग में रावण सम्बन्धियों की सामान्य निन्दा करते हुए कहता है जाति के लोग ही स्वार्थ- प्रयुक्त घोर भयावह होते हैं । विभीषण को कुलपांसन भी कहा गया है । इस घोर भर्त्सना से घबराकर विभीषण चार राक्षसों के साथ लङ्का छोड़ देता है (सर्ग १६) । किन्तु बुल्के का यह कहना भी अशुद्ध है । इन सर्गों को प्रक्षिप्त मानना भी प्रमाद ही है। क्योंकि ९ वें सर्ग में विभीषण ने रावण के पार्श्ववर्तियों के बड़े-बड़े अनर्गल प्रलापों को सुनकर बड़ी नम्रता से सबको बैठाकर समझाया और कहा कि तात ! जो अर्थ प्राप्त हो सकता है उसी के लिए विक्रम किया जाना उचित है। प्रमत्तों में, शस्त्रादि आक्रान्त जनों में एवं दैव से प्रहत लोगों में विधिप्रयुक्त विक्रम सफल नहीं होते हैं। जो विजिगीषु अप्रमत्त है और बलयुक्त है, जितरोष एवं दुराधर्ष है उसकी धर्षणा नहीं हो सकती। नदनदीपति-समुद्र का उल्लङ्घन कर लङ्का आनेवाले हनुमान् की गति को कौन जान सकता है और कौन उस सम्बन्ध में तर्क भी कर सकता है ? शत्रु के अपरि- मेय बलों एवं वीर्यों की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिये । राम ने राक्षसराज रावण का क्या अपराध किया था जो जनस्थान से उनकी भार्या को अपहरण करके ले आये हैं। यदि खर ने मर्यादा का अतिक्रमण किया तो उसे दण्ड दिया गया। प्राणी को अपने प्राणों की रक्षा का अधिकार तो है ही । इन सबका निमित्त वैदेही का अपहरण है । उसका शीघ्र ही परित्याग करना चाहिये । धर्मानुवर्ती वीर्यवान् राम से निरर्थक कलह में कोई लाभ नहीं । जब तक राम साश्व, सगज, बहुरत्नसमाकुला पुरी को अपने बाणों से विदीर्ण न करें उसके पहले ही मैथिली को प्रदान कर देना चाहिये । १० वें सर्ग में साहित्यिक ढङ्ग से वर्णन किया गया है कि विभीषण पुनः रावण के समृद्धि-सम्पन्न भवन में पहुँचे । वहाँ वेदविद् विद्वानों द्वारा विजयानुगुण पुण्य घोष सुना, लोक-परलोकविद् आचारकोविद विभीषण ने शिष्टा- चार के साथ तेजों से दीप्यमान राक्षसों से पूजित ज्येष्ठ भ्राता रावण का वन्दन किया और मन्त्रियों की सन्निधि में सान्त्वना के साथ रावण का प्रसादन करते हुए अत्यन्त युक्तियुक्त एवं हित की वैसी ही बात कही जो देश, काल एवं अर्थ के अनुगुण थी । उन्होंने बतलाया कि जब से वैदेही लङ्का में आयी हैं उसी समय से अशुभ निमित्त परिलक्षित हो रहे हैं। अरणि-मन्थनादि द्वारा उत्पन्न होते हुए तथा प्रणयन काल में धूम-कलुषित चिनगारीयुक्त अग्नि का उदय होता है। विधिवत् मन्त्रसंघ से होम करने पर भी अग्निदेव अभिवृद्धि को प्राप्त नहीं होते हैं। आपकी अग्निशाला तथा वेदाध्ययन स्थान में सर्प दिखायी देते हैं । हवनीय हवि में पिपीलिकाएँ मिलती हैं। गायों का दूध सूख गया है, कुञ्जर मदहीन हो रहे हैं, अश्व दीन शब्दों में हिनहिनाते हैं और खूब खाने पर भी भूखे ही बने रहते हैं । खर, उष्ट्र और अश्वतर ऊर्ध्वरोमा (जिनके रोयें खड़े हैं) होकर आँसू गिराते हैं, नाना प्रकार की चिकित्सा होने पर भी स्वस्थ नहीं होते हैं। कौए संघ के संघ एकत्रित होकर विमानों के अग्रभाग में स्थित होकर क्रूर बोली बोलते हैं। सायं प्रातः गृध्र पुरी के ऊपर मँडराते रहते हैं। शृगालियाँ अमंगल नाद करती हैं। पुरी के द्वारों पर संघबद्ध भेड़िये और मृग एकत्रित होते हैं। विद्युत्पात तथा घनगर्जन के निर्घोष सुनायी पड़ते हैं । इन सबका प्रायश्चित्त यही है कि सीता राघव को दे दी जायें। मोह से या लोभ से आप मेरे वचनों में दोषबुद्धि न करें। मैंने जो कहा है, वह सबको प्रत्यक्ष है, बाहर भीतर राक्षस राक्षसी सभी अनुभव करते हैं। आपके भय से मन्त्री लोग कुछ नहीं कहते हैं तथापि जो देखा और सुना है, उसके अनुसार आपके हितार्थ सब कुछ कहना कर्तव्य है । ११ वें सर्ग में भी बड़े उत्तम ढङ्ग से महान् ऐश्वर्यपूर्ण सपरिकर राजा रावण का तथा विभीषण का समागमन और यथायोग्य उपवेशन वर्णित है । १२ वें सर्ग में प्रहस्त सेनापति अपने आभ्यन्तर एवं बाह्य रक्षा-प्रबन्ध

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा) · पृष्ठ 631, कुल 1049 में से · BharatKosha