रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय युद्धकाण्ड ५५५
का निरूपण करता है । प्रहस्त का वचन सुनकर रावण अपनी सीताविषयिणी कामना का निरूपण करते हुए अपना दैन्य व्यक्त करता हुआ कहता है सीता को प्राप्त करने के लिए राम और लक्ष्मण समुद्र-तट पर आ गये हैं । जिस तरह सीता न देनी पड़े और वे दोनों मारे जायें इस प्रकार की मन्त्रणा करें— “अदेया च यथा सीता वध्यौ दशरथात्मजौ । भवद्भिमंन्त्र्यतां मन्त्रः सुनीतं चाभिधीयताम् ॥” (वा० रा० ६।१२।२५ ) कामव्याकुल रावण का परिदेवन, काम, शोक और प्रलाप सुनकर क्रुद्ध होकर कुम्भकर्ण ने कहा “यदि पहले ही विचार कर यह कार्य किया गया होता तो आपके चित्त की यह दशा न होती । हम लोगों के साथ पहले से ही विचार करना आवश्यक था । जो राजा न्याय से राजकार्य करता है, उसे पश्चात्ताप नहीं करना पड़ता । जैसे अभिचारप्राय अपवित्र यज्ञों में हुत हवि उलट कर प्रयोक्ता के लिए ही अशुभकारक होते हैं “प्रत्यगेनमभिचारस्तुनोते” उसी तरह मन्त्रियों द्वारा सामादि उपायों का विचार बिना किये मोह से स्वयं जो विपरीत अनुचित कार्यों को करता है वे कर्म ही कर्ता के लिए अनिष्टकारक होते हैं । जो प्रथम कार्य को पीछे करना चाहता है और पश्चात् कर्तव्य को पहले ही कर डालता है वह नय-अनय कुछ भी नहीं जानता । जैसे प्रथम सामप्रयोग के स्थान पर दण्ड का प्रयोग करता है और पश्चात् प्रयोक्तव्य दण्ड का प्रथम ही प्रयोग करता है । शत्रु लोग अधिक बल देखकर भी विषय-चापल्य के कारण उसी तरह रन्ध्र ढूँढ ही लेते हैं जैसे हंस लोग दुर्लङ्घ्य भी क्रौञ्च पर्वत को लांघने के लिए उसमें कीर्तिकेय- शक्ति द्वारा किये हुए छिद्रों को ढूँढ़ लेते हैं । ऐसा अप्रचिन्तित महान् अनुचित कर्म करने पर राम ने आपका वध नहीं किया आप जीवित हैं, यह सौभाग्य की बात है । विषमिश्र आमिष भक्षण के तुल्य प्रबल दारहरणरूप कार्य आपने अप्रतिम अनुचित कार्य किया है । फिर भी मैं तुम्हारे शत्रुओं का हनन करके तुम्हारा कार्य सब ठीक करूँगा ।” १३वें सर्ग में कुम्भकर्ण की बात से क्रुद्ध रावण को देखकर महापार्श्व ने रावण से अनुरोध किया कि वह बल-प्रयोग से अपनी कामनापूर्ण करें, पर रावण ने पुञ्जिकस्थली के कारण पितामह के शाप की चर्चा करके बल-प्रयोग में लाचारी प्रकट की । १४वें सर्ग में विभीषण ने पुनः रावण से राम के प्रबल पराक्रम और उनके घोर बाणों की चर्चा करते हुए कुम्भकर्ण, इन्द्रजित्, महापार्श्व, महोदर, कुम्भ, निकुम्भ, अतिकाय आदि को अकिञ्चित्कर बतलाया और यह कहा कि यह सब मित्ररूप अमित्र ही हैं जो असमीक्ष्यकारी राजा का अनुसरण कर रहे हैं । निष्काम सुहृदों का कर्तव्य है कि सहस्रमूर्धावाले अनन्त देहवाले महावल भीम नागपाश से वेष्टित राजा की केशग्रहणान्त अनुचित कार्य करके भी वैसे ही रक्षा करें जैसे भीमबलवाले भूतों से गृहीत पुरुष की उसके अभिभावक निगृहीत करके रक्षा करते हैं । विभीषण ने कहा सुचरितरूपी जल से पूर्ण राघवरूप सागर से प्रच्छाद्यमान तथा निमज्ज्यमान और पाताल-मुख में गिरते हुए राजा को मेरा यह कथन पुर और राष्ट्र सहित, राक्षस जाति सहित तथा सुहृदों सहित राजा के लिए अत्यन्त पथ्य है कि राम को मैथिली प्रदान की जाय, परकीय बल एवं स्वबल को देखकर बलस्थिति और उसके उपचय को देखकर मन्त्री को यथावत् करना चाहिए । प्रकृत में वानरों की सहायता से परकीय बल का उपचय हुआ है । हमारा बल खर, दूषण आदि के नाश से क्षीण हुआ है । १५वें सर्ग में बृहस्पतितुल्य बुद्धिवाले विभीषण की बात को सुनकर नैर्ऋतराजमुख्य इन्द्रजित् ने कहा—तात कनिष्ठ, आप बहुत भययुक्त अनर्थक बात कह रहे हैं । जो इस महान् पौलस्त्य-कुल में नहीं उत्पन्न हुआ वह भी ऐसा नहीं बोल सकता । सत्त्व, वीर्य, पराक्रम, धैर्य, शौर्य और तेज से रहित एक ही पुरुष तात कनिष्ठ विभीषण ही इस कुल में हुए हैं— “सत्त्वेन वीर्येण पराक्रमेण धैर्येण शौर्येण च तेजसा च । एकः कुलेऽस्मिन् पुरुषो विमुक्तो विभीषणस्तातकनिष्ठ एषः ॥” ( वा० रा० ६।१५।३ ) वे मानुषपुत्र राम और लक्ष्मण क्या हैं ? एक प्राकृत राक्षस भी उन्हें मार सकता है । भीरो ! क्या