भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 633, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 633

५५६ रामायणमीमांसा अष्टादश डरवाते हो त्रिलोकनाथ देवराज इन्द्र को भी जीतकर मैंने धरातल में निविष्ट कर दिया था। भयभीत होकर देवगण विभिन्न दिशाओं की ओर भग गये थे। निःस्वन उन्माद करते हुए ऐरावत को भी मैंने भूमि में गिरा दिया था। उसके दाँतों को बलात् खींच कर मैंने समग्र देवताओं को डराया था। मैं देवताओं का दर्पहन्ता एवं दैत्योत्तमोँ का शोकहर्ता हूँ। क्या मैं प्राकृत दो मनुष्य राजपुत्रों का निग्रह नहीं कर सकता ? इस तरह इन्द्रकल्प सुदुरासद-महोर्जा इन्द्रजित् का बचन सुनकर शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ विभीषण महार्थ वचन बोले, हे तातपुत्र ! अभी भी तुम अपरिपक्वबुद्धि बालक हो, मन्त्र में कृत्याकृत्य-विचार में तुम्हारी सामर्थ्य नहीं है । इन्द्रजित्, पुत्रप्रवाद से तुम भी रावण के मित्रशत्रु ही हो, क्योंकि तुम राघव के द्वारा मोहवश रावण को विनाश की अनुमति दे रहे हो। तुम दुर्मति एवं वध्य हो। इतना ही नहीं वह भी वध्य है जो तुम्हारे जैसे बालक एवं दृढ़साहसिक को मन्त्रणा करनेवालों के बीच में लाया है। इन्द्रजित्, तुम कृत्याकृत्यविवेकहीन, मतिप्रागल्भ्यहीन, अविनीत, अनयमर्ति, दुरात्मा एक साहसी हो, बालकपन के कारण प्रलाप कर रहे हो। ब्रह्मादण्ड के समान प्रकाशवाले कालतुल्य ज्योतिष्मान् तथा यमदण्डतुल्य राम के बाणों को युद्ध में कौन सहन कर सकेगा ? अतः धन, रत्न, सुन्दर भूषणों, वसनों, दिव्यमणयों के साथ राम को सीता समर्पण करने से ही हम लोग सुख से रह सकेंगे। १६ वें सर्ग में युक्तियुक्त हित वाक्य बोलनेवाले विभीषण को कालचोदित रावण ने परुष वचन कहे और सामान्यतया ज्ञातियों से सबको भय होता है, यह भी कहा—कुलपांसन, यदि अन्य कोई ऐसा कहता तो वह जीवित नहीं रह सकता था। तुम सोदर होने से वधानर्ह हो। तुम्हारे लिये धिक्कार ही दण्ड है। ऐसा परुष वचन सुनकर न्यायवादी विभीषण ने क्रुद्ध होकर चार साथी राक्षसों के साथ अन्तरिक्ष में जाकर राक्षसाधिप रावण से कहा- राजन्, आप भ्रान्त हो, जो इच्छा हो सो कहो । आप मेरे ज्येष्ठ, मान्य तथा पितृसमान हैं। आप धर्मपथ पर स्थित नहीं हैं। राजन्, कालवश हुए अकृतात्मा प्राणी हितैषी के हित वाक्य को नहीं सुनते। राजन्, प्रियवादी पुरुष सदा सुलभ होते हैं, परन्तु अप्रिय किन्तु पथ्य के वक्ता और श्रोता दुर्लभ ही होते हैं— “सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः । अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता सुदुर्लभः ॥” ( वा० रा० ६।१६।२१ ) आप अपनी एवं राक्षसों सहित अपने पुर और राष्ट्र की रक्षा करो। आपका स्वस्ति हो, मैं जा रहा हूँ। आप सुखी हों । बुल्के कहते हैं कि “घबराकर विभीषण लङ्का छोड़ देता है, परन्तु इन श्लोकों में घबराने जैसी कोई बात ही नहीं है। इतने महत्त्वपूर्ण प्रसङ्गों को साधारण बाजारू तर्कों के बलपर बुल्के प्रक्षिप्त कहना चाहते हैं। वस्तुतः ज्ञान-विज्ञान तथा नीतिसार सर्वस्वसंयुक्त स्वाभाविक स्थिति का चित्रण करनेवाले इन सर्गों का अपलाप करना वस्तु- स्थिति का ही अपलाप है। इसी तरह विभीषण की महत्त्वपूर्ण शरणागति के प्रसङ्ग को भी बुल्के महत्त्वहीन बनाने के लिए सचेष्ट हैं। १७ वें सर्ग के अनुसार विभीषण मुहूर्त्तमात्र में उत्पन्नप्रतिपन्न रावण का त्यागकर जहाँ लक्ष्मण के साथ राम विराजमान थे वहाँ पहुँच गया। वानराधिपों ने मेरुशिखर के तुल्य दीप्त विद्युत के तुल्य गगनस्थ विभीषण को देखा । विभीषण के अनुचर भीमविक्रम ओर कवच, आयुध आदि से युक्त तथा भूषणोत्तमों से भूषित थे। विभीषण मेघपर्वत तुल्य वज्रायुध के समान दीप्यमान वरायुध धारण करनेवाला दिव्याभरणभूषित था। बुद्धिमान् वानरेन्द्र सुग्रीव ने वानरों से विचार कर हनुमत्प्रमुख वानरों से कहा-देखो, सर्वायुधसम्पन्न चार राक्षसों के साथ यह राक्षस हम लोगों के अभिघात के लिए आया है। सुग्रीव का वचन सुनकर शैल और शाल वृक्ष लेकर वानर भट उनके वध के लिए प्रस्तुत हो गये । वे आपस में विमर्श कर ही रहे थे कि आकाश में ही स्थिर रहकर महाप्राज्ञ विभीषण ने सुग्रीव