रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय युद्धकाण्ड ५५७
एवं उनके साथियों को देखकर धीर गम्भीर महान् स्वर से कहा, रावण नामक दुर्वृत्त राक्षसराज का मैं छोटा भाई विभीषण हूँ । रावण ने जनस्थान से जटायु को मारकर सीता का हरण किया है। विवश, दीन तथा अवरुद्ध सीता राक्षसियों द्वारा सुरक्षित हैं। मैंने युक्तियुक्त वाक्यों से उसे राम को सीता प्रदान करने के लिए समझाया पर काल- प्रेरित होकर उसने स्वीकार नहीं किया । मैं रावण से परुषित तथा दासवत् अपमानित होकर पुत्रों और पत्नी को छोड़कर राम की शरण में आया हूँ । सर्वलोकशरण्य महात्मा राम को निवेदन कर दो कि विभीषण उपस्थित है— “सोऽहं परुषितस्तेन दासवच्चावमानितः । त्यक्त्वा पुत्रांश्च दारांश्च राघवं शरणं गतः ।। निवेदयत मां क्षिप्रं राघवाय महात्मने । सर्वलोकशरण्याय विभीषणमुपस्थितम् ॥” ( वा० रा० ६।१७।१६,१७ ) ऐसा वचन सुनकर सुग्रीव ने लक्ष्मण के सामने राम से संरम्भ के साथ कहा, अतर्कित यह शत्रु शत्रुसैन्य में आ गया है। छिद्र पाकर उलूक ने जैसे वायसों का संहार किया था वैसे ही यह अवसर पाकर घातक हो सकता है । परन्तप ! मन्त्र, कार्याकार्य-विचार, सेनासंनिवेश तथा सेनानयन में परबल-वृत्तान्तादि के ज्ञानार्थ चार पुरुष प्रवर्तन में अत्यन्त सावधान होना उचित है। कामरूपी राक्षस अन्तर्धान रहकर कपटोपाय से विप्रियकरण में चतुर होते हैं । इनपर विश्वास करना कभी भी युक्त नहीं । यह रावण का प्रणिधि ( चार ) हो सकता है अथवा रावण भी हो सकता है। हम लोगों में प्रविष्ट होकर हम लोगों में भेदनीति का प्रयोग कर सकता है अथवा स्वयं ही विश्वास प्राप्त कर प्रहार कर सकता है। नीति के अनुसार आरण्यक मित्र से प्रेषित बल एवं आप्त बन्धुओं से प्रेषित बल तथा तात्कालिक वेतनदान से प्राप्त बल का संग्रह करना उचित है। परन्तु शत्रुबल का सदा परिहार ही करना चाहिये । प्रकृत्या राक्षस कुटिल होते हैं । तत्रापि अमित्र रावण का भाई यह रिपु ही है। इसमें कैसे विश्वास किया जा सकता है ? क्षमाशिलों में श्रेष्ठ, मेरी दृष्टि में तो इसका निग्रह करना ही श्रेष्ठ है। यह नृशंस रावण का भ्राता हैं, तीव्र दण्ड से इसे दण्डित करना ही उचित है । राम ने हनुमान् प्रभृति वानरों से कहा, कपिराज ने विभीषण के प्रति जो सहेतु बातें कहीं हैं, उन्हें आप सबने सुना है। बुद्धिमान् और समर्थ को चाहिये कि संकट की घड़ी में शाश्वती भूति चाहने- वाले मित्र को उचित परामर्श दे । इस तरह राम के पूछने पर रामप्रियचिकीर्षु सभी मित्रों ने अपना अपना मत व्यक्त किया । राघव, तीनों लोकों में कोई बात आप से अज्ञात नहीं है, तो भी सुहृद्भाव से हम सबको सम्मान देने की दृष्टि से ही आपका यह प्रश्न है । आप सत्यव्रत तथा शूर हैं, धार्मिक एवं दृढ़विक्रम हैं एवं परीक्ष्यकारी, स्मृतिमान् और सुहृदों में विश्वास करनेवाले हैं । अतः आपके सभी सचिव मतिमान् तथा समर्थ हैं । अपना अपना मत प्रकट करें । इसपर अङ्गद ने कहा, शत्रु के पक्ष से आया हुआ व्यक्ति अवश्य शङ्कास्पद है । सहसा विश्वास न कर उसकी परीक्षा करनी चाहिये । आत्मा को आवृत्त करके शठबुद्धि व्यवहार करते हैं । रन्ध्र पाने पर वे अवश्य ही प्रहार करते हैं । अतः अर्थानर्थ का निश्चय करके गुण होने के संग्रह करना उचित है। शरभ ने कहा शीघ्र ही चार का प्रयोग करना उचित है। सूक्ष्मबुद्धि चार के द्वारा परीक्षण करके यथान्याय ग्रहण करना उचित है। विचक्षण जाम्बवान् ने शास्त्रबुद्धि से दोषवजित तथा गुणयुक्त वाक्य कहा, राम से वैर बाँधनेवाले पाप- युक्त रावण के समीप से अदेशकाल में आनेवाला विभीषण सर्वथा शङ्कास्पद है। अर्थात् स्वामिदेश को छोड़कर शत्रुदेश में आना और स्वामी के संकटकाल में उससे विपरीत होकर उसपर प्रहार करना अनुचित है। इस तरह अदेशकाल में आने से विभीषण शङ्कनीय है। जो अपने पुराने मालिक के प्रति निष्ठावान् नहीं है वह अन्यत्र भी लाभदायक नहीं हो सकता । नयानयकोविद मैन्द ने कहा—यह रावण का अनुज है । नरपतीश्वर, धीरे से मधुरता से इससे बात की जाय । इसके भाव का ज्ञान प्राप्त करके कार्य किया जाय । यदि दुष्ट न हो तो ग्रहण किया जाय । सचिवश्रेष्ठ हनुमान् ने स्निग्ध मधुर गम्भीर अर्थ युक्त थोड़े शब्दों में कहा वक्ताओं में श्रेष्ठ, समर्थ एवं मतिवान् आपसे