रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअधिक बृहस्पति भी क्या कह सकते हैं। राघवेन्द्र, मैं तर्ककुशलता दिखलाने के लिए नहीं, आपके अन्य मन्त्रियों की स्पर्धा से नहीं, अधिक बुद्धिमत्ता के अभिमान से नहीं तथा अपनी इच्छा से भी नहीं, किन्तु कार्य-गौरव की दृष्टि से यथार्थ बात यह कहता हूँ कि आपके सचिवों मे अर्थानर्थ निमित्त जो बातें कही हैं, उनमें मैं अंशतः वैगुण्य देखता हूँ। विभीषण शङ्कनीय है, परीक्षणीय है यह तो ठीक है, किन्तु कुछ निश्चय न होने के कारण यह उत्तर नहीं है। परीक्षणरूपा क्रिया का यह समय नहीं है। नियोग के बिना सामर्थ्य का ज्ञान नहीं हो सकता । अर्थात् उसे बुलाकर सब वृत्तान्त सुने बिना त्याग या परिग्रह के औचित्य का निर्णय नहीं किया जा सकता । साथ ही सहसा नियोग भी उचित नहीं है अर्थात् सहसा राजसंनिधि में लाकर वृत्तान्त प्रतिपादन का अनुज्ञादानरूप नियोग भी मुझे दोष प्रतीत होता है । तस्मात् किसी समर्थ अधिकृत द्वारा उससे सम्पूर्ण वृत्तान्त जानकर ही आपके पास विभीषण का लाया जाना उचित है। कहा जा सकता है कि फिर तो शरभ का ही मत आपका भी है, पर यह ठीक नहीं; क्योंकि चार के प्रेषण का यहाँ कोई कारण नहीं दिखता है। चार-प्रेषण से सिद्ध होनेवाले प्रयोजन की यहाँ अनुपपत्ति ही है। यदि परीक्षणीय व्यक्ति सन्निहित न हो और उसका वृत्तान्त प्रकट न हो तभी चार-प्रेषण उचित होता है। जो प्रत्यक्ष उपस्थित है एवं अपना वृत्तान्त निवेदन करने के लिए प्रस्तुत ही है, उसके प्रति चार-प्रेषण व्यर्थ है । कहा जा सकता है कि कपटयुक्त व्यक्ति प्रत्यक्षरूप से सामने स्थित होकर भी अपनी स्थिति एवं वृत्तान्त को अन्यथा व्यक्त कर सकता है, यह ठीक है, किन्तु चार द्वारा परोक्षरूप से ही वस्तुस्थिति का ज्ञान हो सकता है और उसके लिए परोक्षता और अधिक काल अपेक्षित होता है। तत्काल तो कपटयुक्त व्यक्ति भी सावधानी से कपट के साथ अपने को चार के प्रति भी अन्यथा व्यक्त कर ही सकता है । जो यह कहा गया है कि अदेशकाल में विभीषण आया है । इसके सम्बन्ध में भी मेरा यह कहना है कि रावण जैसे पापी पुरुष की अपेक्षा उत्तम पुरुष को प्राप्त कर के बुद्धि से गुण और दोष का विवेचन कर जो विभीषण ने रावण को त्यागकर राम की शरण ग्रहण करने का निर्णय किया है यह तो उसकी बुद्धिमत्ता ही है। वस्तुतः विभीषण के शरण में आने का यही योग्य देश एवं योग्य काल है। रावण का परदार-हरणरूप दौर्रात्म्य देखकर एवं जिसने रावण को बगल में दबाकर चारों समुद्रों का परिक्रमण किया था उस वाली को एक बाण से मारनेवाले आपका लोकोत्तर विक्रम देखकर इस समय उसका आगमन उसकी बुद्धिमत्ता के अनुरूप ही है। जो यह कहा गया है कि अज्ञात कुल, शील और प्रयोजनवाले गुप्तचरों के द्वारा उसका हृदय जानना चाहिये । यह भो उचित नहीं प्रतीत होता, क्योंकि यह क्रिया बहुकाल सापेक्ष होती है। अज्ञात पुरुष के पास जाकर आप कौन हैं ? कहाँ से आये हैं ? ऐसा प्रश्न करने पर प्रष्टा के स्वरूपज्ञान के बिना बुद्धिमान् पुरुष सहसा शङ्का कर सकता है कि मैं इसे जानता नहीं, यह किसके द्वारा प्रेषित है और क्यों पूछता है ? केवल इस प्रकार शङ्काकुल ही नहीं होगा, किन्तु उत्तर भी नहीं देगा। यदि प्रष्टा का शनैः शनैः ज्ञान होगा, तब तो स्वागत हो करेगा । यदि मित्रभाव ज्ञात होगा तो प्रश्न से मित्रभाव में दूषण भी आ सकता है। यह सोचा जा सकता है कि क्यों अन्य पुरुष के द्वारा इस प्रकार का विचार किया जा रहा है ? उससे स्नेह कुण्ठित हो सकता है और मित्रता में व्यवधान आ सकता है। यदि वस्तुतः शत्रु होगा तो चारों के द्वारा सहसा प्रश्नमात्र से उसका अभिप्राय विदित नहीं हो सकता । अज्ञातकुलशील द्वारा पूछे गये प्रश्न का उत्तर देना आवश्यक ही नहीं समझा जाता है। उलटे शत्रु प्रेषित होने से दण्ड देना ही सम्भव है। कहा जा सकता है कि इस तरह तो संसार में चार- प्रेषण ही निरर्थक समझा जायगा, पर यह भो ठीक नहीं। बहुत काल तक साथ में स्थिति संभव होने से उसके स्वाभाविक वचनों और व्यवहारों से हर्ष, अमर्ष आदि से शत्रुत्व तथा मित्रत्व जानने के लिए चार-प्रेषण सार्थक हो ही सकता है। अतः आप स्वयं ही उसके व्यवहार के मध्य में ही उसके विलक्षण स्वरों, कण्ठध्वनियों से निपुणतया उसकी साधुता या असाधुता का निर्णय कर सकते हैं। भय से, वाष्पकण्ठ से तथा पूर्वापर असंगत कथन ने असाधु समझा जा सकता है अन्यथा साधु समझा जा सकता है—