रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें"अशक्यं सहसा राजन् भावो बोद्धं परस्य वै १। अन्तरेण स्वरैर्भिन्नैर्नैपुण्यं पश्यतां भृशम् ॥" ( वा० रा० ६।१७।६१ ) सामान्यतया अपने में निपुणता देखनेवाला व्यक्ति भी आपाततः प्रसन्नार्थ वाक्यों से भी गूढ अभिप्रायवाले भाषणों से परकीय अभिप्राय को सहसा नहीं समझ सकता । यदि यह कहा जाय कि पहले तुम्हीं परीक्षण करो तो मैंने तो परीक्षा कर ली है। मुझे तो उसके भाषण में कोई दुष्टता, वचन एवं चेष्टाओं से उसके अन्तःकरण की दुष्टता नहीं प्रतीत होती । प्रसन्नवदनता स्पष्ट परिलक्षित होती है । अतः मुझे उसके प्रति तथा उसकी बुद्धि के प्रति कोई संशय नहीं है । रामशरणगमन ही मेरा इष्टसाधन है, इस तरह वह निःशङ्क एवं स्वस्थ अर्थात् साधुस्वभाववाला ही शरणागत हुआ है । गूढविप्रियबुद्धिवाला नहीं है। उसकी वाणी में कोई भी दोष नहीं है। यद्यपि शठ भी वैसा भाषण कर सकता है तथापि आन्तर भाव को छिपाने का शक्तिभर प्रयत्न करने पर भी वह सर्वथा छिपाया नहीं जा सकता, किन्तु अन्तर्यामी देवता बलात् भीतर की असाधुता या साधुता को, तादृश वचनादि की प्रेरणा कर, प्रकट कर देता है। कार्यविदों में श्रेष्ठ, उसका इस समय का आगमन देश-काल के अनुसार है । प्रयोग से, अनुष्ठान से सम्पादित ईदृश कार्य को शीघ्र ही सफल करें । आपका रावणवधविषयक उद्योग तथा मिथ्याबलगर्वित पापवृत्त रावण को देखकर रावण से भी अधिक बलवाले वाली का वध एवं सुग्रीव का अभिषेक सुनकर उसने बुद्धि से निश्चय किया है कि वाली के समान ही राम रावण को मार कर सुग्रीव के समान ही मुझे लङ्का का राज्य देंगे । शरणागतवत्सल राम अवश्य मेरी रक्षा करेंगे । इस तरह बुद्धिपूर्वक वह शरण में आया है । उसका संग्रह करना उचित है । इस तरह मैंने यथाशक्ति विभीषण का आर्जव वर्णन किया है । बुद्धिमानों में श्रेष्ठ आप से अधिक कहना उचित नहीं, शेष कृत्य के निर्णय में आप ही प्रमाण हैं । हनुमान् का वचन सुनकर १८ वें सर्ग में राम ने अपना अभिप्राय भी सुनने के लिए सबसे अनुरोध करके कहा—मित्रभाव से सम्यक् प्राप्त शरणागत विभीषण का त्याग उचित नहीं है । यदि उसमें सुग्रीव आदि के कथना- नुसार रन्ध्र में प्रहरण-कामना आदि दोष भी हों तो भी शरणागत दुष्ट का रक्षण भी सत्पुरुषों की दृष्टि से गर्हित नहीं है । हनुमान् ने निर्दोषत्व प्रतिपादनपूर्वक इसकी ग्राह्यता कही है । अन्य लोगों ने दोषनिरूपणपूर्वक अग्राह्यता का प्रतिपादन किया है । पर भगवान् ने तो प्रौढिवाद से रन्ध्र-प्रहारित्वरूप दोष स्वीकार कर के भी ग्राह्यता का ही प्रतिपादन किया है । 'राघवं शरणं गतः' इस प्रसन्न वचन से मित्रभावना का अनुमान होता है । स्निग्धभाव से पति को सम्यक् प्राप्त होनेवाली पत्नी के समान मित्रभाव से प्राप्त विभीषण को रन्ध्रप्रहारित्व के भय से मैं किसी भी देश, काल और अवस्था में त्याग नहीं सकता । वस्तुतः तो विभीषण में कोई दोष है ही नहीं। शरणागत होने के कारण शत्रुपक्षीय होने के भय से उसका त्याग नहीं किया जा सकता । आप लोगों ने जो दोष कहे हैं वे और उनसे अतिरिक्त भी दोष उसमें हों तो भी उसका मैं त्याग नहीं करूँगा । यद्यपि दुष्टजनपरिग्रह शिष्टविर्गाहत है तथापि "वध्यं प्रपन्नं न प्रतियच्छन्ति" वध्य होने पर भी प्रपन्न ( शरणागत ) का परित्याग नहीं करना चाहिये । शास्त्रवचन के अनुसार सदोष शरणागत का ग्रहण भी पूजित ही है । इसपर पुनः सुग्रीव ने कहा कि भले यह दुष्ट हो अथवा अदुष्ट भी हो तो भी क्या है, जो ऐसी विपत्ति में पड़े हुए अपने बड़े भ्राता का परित्याग कर सकता है वह ऐसा कौन है जिसका त्याग नहीं कर सकता । अतः विश्वासघाती एवं कृतघ्न होने से विभीषण सर्वथा त्याज्य ही है । वानराधिपति का वचन सुनकर सबकी ओर निहार कर, लक्ष्मण की ओर भी देखकर थोड़ा हँसते हुए सत्यपराक्रम काकुत्स्थ राम ने कहा—सुग्रीव ने जैसी बात कही है शास्त्रों का सम्यक् अध्ययन बिना किये और वृद्धों
१. 'अन्तःस्वभावैर्गौतैस्तैर्नैपुण्यं पश्यता भृशम् ।' इति पाठान्तरम् ।