रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 638, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय युद्धकाण्ड ५६१ क्योंकि यह नृशंस रावण का भ्राता है। ऐसा कहकर सुग्रीव मौन हो गये। सुग्रीव के वाक्य को सुनकर विचार कर राम ने सुग्रीव के प्रति शुभतर बात कही। कपिराज, दुष्ट हो या अदुष्ट तो भी यह रजनीचर क्या कर सकता है ? मेरा यह सूक्ष्म भी अहित नहीं कर सकता है। पृथिवी भर में जितने पिशाच, दानव, यक्ष तथा राक्षस हैं उन सभी का इच्छा करूँ तो एक अँगुली के अग्रभाग से संहार कर सकता हूँ— "पिशाचान् दानवान् यक्षान् पृथिव्यां चैव राक्षसान् । अङ्गुल्यग्रेण तान् हन्यामिच्छन् हरिगणेश्वर ।।" (वा० रा० ६।१८।२३ ) राम के ईश्वरत्वसाधक ऐसे वचनों से घबड़ा कर ही बुल्के ऐसे महत्त्वपूर्ण सर्गों एवं वचनों को क्षेपक कहने का साहस करते हैं । कहा जाता है कि फिर तो सुग्रीव, हनुमान् तथा वानर-सेना का संग्रह करना व्यर्थ ही होगा ? इसी का उत्तर देते हुए कहते हैं यदि इच्छा करूँ तो किन्तु इस समय तो रावण को ब्रह्मा के रूप में मैंने ही वर प्रदान कर रखा है कि देवभावोपेत निज अशेष विलासों से भी उसका वध नहीं होगा । अतः उसके कल्याणार्थ स्वशक्ति से ही अपने दिव्य भाव को छिपाकर मानवमर्यादा में ही स्थित रहकर आप ऐसे सहायों का संग्रह किया गया है। वस्तुतः तो मुझे स्वातिरिक्त किसी भी अन्य की अपेक्षा नहीं है । वस्तुतः रन्ध्र मिलने पर प्रहार कर सकता है, इस भीति को दूर कर भी शरणागत की रक्षा करना परम धर्म है, यह कपोत के दृष्टान्त से भगवान् राम ने स्पष्ट किया। उन्होंने कहा—सुना जाता है कि एक कपोत ने शरण में आये हुए शत्रु व्याध का यथान्याय अर्चन किया और अपना मांस भोजन करने के लिए उससे प्रार्थना की । उसी व्याध ने उसकी भार्या का अपहरण किया था, तो भी कपोत ने उसका आतिथ्य किया । जब इस प्रकार तिर्यक् प्राणी ने भी शरण में आये हुए भार्या-हर्ता की भी उपेक्षा नहीं की तो फिर मेरे सदृश सकल धर्मों के रहस्यज्ञ क्षत्रिय अपकार न करनेवाले शरणागत की उपेक्षा कैसे कर सकता है ? उसकी काया तथा वाणी के व्यवहारों से शरणागति स्पष्ट ही लक्षित होती है । सत्यवादी महर्षि कण्डु ने प्राचीनकाल में शरणागत- रक्षणसम्बन्धिनी धर्मिष्ठा गाथा गायी है। उसे सुनो— हाथ जोड़े हुए दीनता से शरण माँगते हुए शत्रु को भी आनृशंस्य (अघातुकतासिद्धि ) के लिए या आश्रितरक्षणरूप परमधर्मसिद्धि के लिए नहीं मारना चाहिये । इतना ही नहीं आर्त हो अथवा दृप्त ( घमण्डी ) हो जो भी शत्रुओं के भय से शरणागत हुआ हो, भले वह शत्रु ही क्यों न हो, कृतात्मा प्राणी को चाहिये कि वह अपने प्राणों का परित्याग कर के भी उसकी रक्षा करे । जो उससे या उसके शत्रु द्वारा सम्भावित भय से या कार्यान्तर में व्यस्तता से होनेवाली विस्मृति से या उसके शत्रु द्वारा मिलनेवाले लाभ के लोभ से अपनी शक्ति द्वारा सहायता या धनदानादि द्वारा यथान्याय रक्षा नहीं करता वह अरक्षित के पाप तथा लोकगर्हित निन्दा को प्राप्त होता है। इतना ही नहीं शरण में आया हुआ व्यक्ति अगर रक्षक के देखते देखते विनष्ट होता है तो वह अरक्षित रक्षक का सब पुण्य लेकर चला जाता है । इस तरह प्रपन्न के अरक्षण से महान् दोष होता है । वह अस्वर्ग्य, अयशस्य और बल-वीर्य का विनाश करनेवाला है । अतः मैं कण्डु के धर्मिष्ठ, यशस्य तथा फलोदय काल में स्वर्ग्य वचन का पालन करूंगा । इसके अतिरिक्त मुझ परम कारुणिक ईश्वर का तो सर्वभूत अभय प्रदानरूप एक व्रत ( संकल्प ) ही है— "सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते । अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम ।।" (वा० रा० ६।१८।३३ ) जो 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यजन्य अखण्डाकार वृत्ति से मुझे प्रपन्न होता है अथवा जो औपाधिक भेद का आश्रयण कर आप मेरे आश्रय या रक्षक हैं, मैं आपका आश्रित या रक्षणीय हूँ इस रूप से आश्रयप्रदान या रक्षण की याच्ञा करता है उसे मैं सर्वभूतों से अभय प्रदान करता हूँ । सब प्राणियों के लिए अथ च सर्वभूतों से भयभीत सभी ७१