भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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प्राणियों के लिए अभय-प्रदान करना मेरा नित्य सत्सहज धर्म है। ‘ददामि’ इस वर्तमान काल की क्रिया के प्रयोग से नित्य प्रगृहीत नित्य निज प्रतिष्ठित धर्म है। तात्कालिक चोर, शत्रु, व्याघ्रादि से जनित भय की निवृत्तिरूप और आत्यन्तिक संसारभय की निवृत्तिरूप दोनों ही प्रकार का अभयप्रदान करता हूँ। प्रपत्ति या शरणागति ही अभय प्रदान में हेतु है, अतः प्रपत्ति या शरणागति विहीन को अभय न मिलने पर भी ईश्वर में वैषम्य तथा नैर्घृण्य दोष नहीं होता । साधन, अभ्यास और परिपाक भेद से वह प्रपत्ति या शरणागति तीन प्रकार की होती है। साधनकाल में ‘तस्यैवाहम्’ मैं भगवान् का ही हूँ ऐसी एक स्थिर निष्ठा होती है, अभ्यासदशा में ‘ममैवासौ” भगवान् मेरा ही है ऐसी निष्ठा होती है और पाकद्शा में “सोऽहम्’ मैं प्रभु से अभिन्न ही हूँ, ‘तत्त्वमसि’ आदि महावाक्यजन्य ऐसी निष्ठा होती है। प्रथम का उदाहरण है— “सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम् । सामुद्रो हि तरङ्गः क्वचन समुद्रो न तारङ्गः ॥” ( षट्पदी ) अद्वैतवाद के अनुसार यद्यपि मुझमें और आपमें भेद नहीं है फिर भी मैं आपका हूँ आप मेरे नहीं, जैसे समुद्र का और तरङ्ग का अभेद होने पर भी समुद्र का ही तरङ्ग कहलाता है, तरङ्ग का समुद्र नहीं कहलाता है। दूसरी निष्ठा का उदाहरण है— “हस्तमुत्क्षिप्य यातोऽसि बलात्कृष्ण किमद्भुतम् । हृदयाद् यदि चेद् यासि पौरुषं गणयामि ते ॥” कृष्ण ! हाथ छुड़ाकर जा रहे हो यह कोई अद्भुत बात नहीं है। सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् अल्पज्ञ अल्पशक्तिमान् से हाथ छुड़ा सकता है। यदि आप मेरे हृदय से निकल जायें तो मैं भी आपकी सर्वशक्तिमत्ता देखूँगा । तीसरी निष्ठा का उदाहरण है— “सकलमिदमहं च वासुदेवः ।”, “वासुदेवः सर्वमिति ।” ( गी० ७।१९ ) यह सब कुछ वासुदेव है और मैं भी तदभिन्न ही हूँ । वस्तुतः शरणागति या प्रपत्ति सम्पूर्ण सच्छास्त्रों का सिद्धान्त है— “यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥” ( श्वे० उ० ६।१८ ) जो परमेश्वर ब्रह्मा का निर्माण कर उनको वेद प्रदान करते हैं उन्हीं आत्मबुद्धिप्रकाश भगवान् को हम शरण ( “शरणं गृहरक्षित्रोः” अमर० ३।३।५३ ) आश्रयरूप रक्षकरूप से प्रपन्न होते हैं । “तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ।” ( गी० १५।४ ) जिससे पुरानी विश्व-प्रवृत्ति प्रसृत है उस आद्य पुरुष परमात्मा को मैं आश्रयरूप से प्रपन्न होता हूँ । “मामेकं शरणं व्रज” ( गी० १८।६६ ) मुझे ‘अस्मत्’ पद के लक्ष्यार्थ एक सर्वभेदवर्जित परमात्मा को शरण ( आश्रय ) निश्चय करो अथवा मुझ परमेश्वर को रक्षक समझो— “माम् ‘अहम्’ पदलक्ष्यार्थम् एकमद्वितीयं परमात्मानं शरणं आश्रयं रक्षकं वा व्रज अवगच्छ निश्चिनु ।”