रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 640, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय युद्धकाण्ड ५६३ जैसे अध्वर्यु या आचार्य का यज्ञनिर्वाहकत्वेन वरण किया जाता है, जैसे 'वृतोऽस्मि' कहकर आचार्य आदि वरण स्वीकार कर लेते हैं तो निश्चिन्तता हो जाती है इसी तरह भगवान् भी यदि 'वृतोऽस्मि' कहकर वरण अङ्गीकार कर लेते हैं तो प्राणी सदा सर्वदा के लिए निश्चिन्त हो जाता है। इसी दृष्टि से वेद तथा महाभारत के समान ही वाल्मीकिरामायण का भी यही सिद्धान्त "सकृदेव प्रपन्नाय" इत्यादि वाक्य से घोषित किया गया है। परन्तु बुल्के आदि तो ईश्वरत्वबोधक एवं अवतारप्रतिपादक ऐसे सभी वचनों को मोहवश प्रक्षेप ही कहने का आग्रह करते हैं । अस्तु, वेदान्त के महावाक्यों द्वारा जनित 'सोऽहम्' इस प्रकार की पाकदशापन्न शरणागति या प्रपत्तिवाला व्यक्ति तत्काल आत्यन्तिक अभयप्रदान का पात्र होता है। औपाधिक भेद का अवलम्बन कर अन्य साधन तथा अभ्यास दशा- वाली शरणागति से युक्त प्राणी भी तात्कालिक अभयदान का पात्र होकर सगुण ब्रह्मलोक-प्राप्ति के क्रम से आत्यन्तिक अभयदान का भी पात्र हो जाता है। श्रीराम अपरिग्रहतावादी वानरेन्द्र सुग्रीव को ही परिग्रहता स्वीकार कराकर भेजते हैं हरिश्रेष्ठ, उसे लाओ मैंने अभय-प्रदान कर दिया । सुग्रीव, विभीषण हो या रावण हो शरण आये हुए को मैं सर्वथा अभय प्रदान करता हूँ— कोटि विप्रबध लागे जाही । आये शरण तजउँ नहिं ताही ॥ ( रा० मा० ५।४३।१ ) [