भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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५६४ रामायणमीमांसा अष्टादश ही सुग्रीव की (सर्ग ४६) तथा बाद में राम और लक्ष्मण की आँखों को जल से धोया था (सर्ग ५०) । महाभारत के अनुसार यह जल कुबेर ने भेजा था । विभीषण सामान्यतया युद्ध में भाग लेते ही थे । सर्ग ४३, ८९ और ९० के अनुसार उन्होंने इन्द्रजित् की सेना का सामना किया था। सर्ग १०० के अनुसार लक्ष्मण के विरुद्ध लड़ते हुए रावण के घोड़ों का वध किया था । रावण ने विभीषण पर घातक शक्ति का प्रयोग किया पर उसे लक्ष्मण ने अपनी छाती पर रोककर उन्हें बचा लिया, यह पीछे कहा जा चुका है । बुल्के कहते हैं कि "रावण-वध के बाद विभीषण ने पहले रावण की अन्त्येष्टि करना अस्वीकार कर दिया था, किन्तु जब राम ने समझाया "मरणान्तानि वैराणि" (वा० रा० ६।१११) तब उन्होंने रावण का दाहकर्म संस्कार किया । अतः रावण-वध पर विभीषण विलापसम्बन्धी सर्ग अस्वाभाविक प्रतीत होता है । दा० पा० १०९ और गौ० पा० ९३ वास्तव में यह सर्ग प्रक्षिप्त है । प० पा० में यह नहीं मिलता ।" परन्तु यह संगत नहीं है, क्योंकि १०९ सर्ग प्रामाणिक है । टीकाकारों ने इसपर टीकाएँ की हैं । किसी पाठ में न मिलना उसके प्रक्षेप होने में हेतु नहीं है । बन्धु के साथ वैर या मतभेद होने पर भी मृत्यु के बाद उसके गुणों का स्मरण तथा विलाप आदि स्वाभाविक ही है । सुग्रीव का भी वाली के साथ विरोध था फिर भी वाली के मरने पर सुग्रीव को भी शोक हुआ ही था— “तत शोकाभिसंतप्तं सुग्रीवं क्लिन्नवाससम् ।” (वा० रा० ४।२६।१ ) पश्चात् शोकवेग कम होने पर परदाराभिमर्शनरूप दोष के कारण विभीषण ने रावण का संस्कार करना अनुचित माना । परन्तु राम के समझाने पर वे संस्कार करने के लिए प्रवृत्त हुए । राम ने कहा भले ही यह राक्षसेश्वर अधर्म-अनृतयुक्त रहा है तथापि तेजस्वी, बलवान् एवं शूर था । इन्द्र प्रभृति देवताओं से भी वह कभी पराजित नहीं हुआ । मरणान्त ही वैर होते हैं । मेरा कार्य सम्पन्न हो गया । अब इसका संस्कार करना उचित है । जैसे यह तुम्हारा सम्बन्धी है वैसा ही मेरा भी है, क्योंकि मित्र का सम्बन्धी भी सम्बन्धी ही होता है— “क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव ।” (वा० रा० ६।१११।१०१) राम की आज्ञा से लक्ष्मण विभीषण का अभिषेक करते हैं । राम के साथ ही विभीषण अयोध्या में राम के अभिषेकोत्सव में सम्मिलित होते हैं । विभीषण-चरित उत्तरकाण्ड के अनुसार विभीषण की धर्मनिष्ठा प्रसिद्ध ही है । वे धार्मिक, स्वाध्यायनिरत, नियताहार तथा जितेन्द्रिय (वा० रा० ७।९।३१) थे । घोर तपस्या के बाद वर पाकर भी धर्मबुद्धि ही वर के रूप में उन्होंने मांगी थी— “परमापद्गतस्यापि धर्मे मम मतिर्भवेत् ।” (वा० रा० ७।१०।३०) परम धाम पधारते समय राम ने विभीषण के लिए कहा था जब तक प्रजा रहेगी तब तक तुम लङ्का में रहोगे । सूर्य, चन्द्र और मेदिनी जब तक रहेगी एवं जब तक मेरी कथा रहेगी तब तक तुम्हारा लङ्का में राज्य रहेगा (वा० रा० ७।१०८।२४,२५) । रामचरितमानस के अनुसार प्रतापभानु के मन्त्री धर्मरुचि ही विभीषण हुए थे । रामलिङ्गामृत के असनुरा विभीषण प्रह्लाद के अवतार थे (१।३०) । महाभागवतपुराण के अनुसार विभीषण धर्म के अवतार थे ( ३७।१४) । एक कथा के अनुसार विभीषण विष्णु के अंश थे । रामकियेन (अध्याय ४) के अनुसार विस्सुझन नामक देवता राम की सहायता के लिए विमेक के रूप में अवतीर्ण हुए थे । उनके पास एक मायावी दर्पण था जिससे वे भविष्य