रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजान लेते थे। तुलसीदास के रामचरितमानस (१।७७) के अनुसार विभीषण ने तपस्या से भगवान् के चरणों में अमल अनुराग माँगा था । बुल्के इन सब बातों को भावुकतावश कल्पनामात्र मानते हैं। परन्तु यह कहा जा चुका है कि रामचरित- मानस की कथा एक प्रामाणिक परम्परा पर आधारित है। अन्य अनेक विषयों में विभीषण की कथाओं में भेद है। उनमें आर्ष कथाओं का समाधान कल्पभेद से होता है। तद्विरुद्ध तद्भिन्न अंशों में कल्पभेद न होकर कल्पना का ही भेद समझना चाहिये । बुल्के कहते हैं कि "लङ्का-दहन प्रक्षिप्त होने के कारण विभीषण के पूर्वपरिचय का उल्लेख नहीं मिलता।" परन्तु यह कथन अशुद्ध है, क्योंकि पूर्वकथनानुसार लङ्का-दहन प्रामाणिक है। हनुमान् ने जो विभीषण की ग्राह्यता का प्रतिपादन किया था यह कौन कह सकता है कि उसमें पूर्वपरिचय भी मूल नहीं था। सामूहिक मन्त्रणा में व्यक्तिगत सम्बन्ध गौण होते हैं। इसी लिए विशेष अनुल्लेख सङ्गत है। पउमचरियं की कथा का उद्देश्य तो जैनदीक्षा प्रचार- मात्र है। सरस्वतीकण्ठाभरण के अनुसार विभीषण ने राम के प्रसाद से मय द्वारा निर्मित लङ्का एवं मन्दोदरी को भी प्राप्त किया था। अन्य भी बहुत सी विकृत कथाएँ हैं, उन्हें अप्रमाण ही समझना चाहिये। विभीषण के अनुरोध से सेतुभङ्ग किये जाने और राम द्वारा ब्राह्मणों के कारागार से विभीषण की मुक्ति पुराणों में प्रतिपादित है । सेतुबन्ध ५७३वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि अनेक कथाओं में सेतुबन्ध का उल्लेख नहीं है। पउमचरियं के अनुसार समुद्र नामक राजा नल द्वारा पराजित किया जाता है । हेमचन्द्रकृत जैनरामायण के अनुसार राम-लक्ष्मण सेना सहित आकाश-मार्ग से लङ्का के पास पहुँचते हैं, नल और नील द्वारा समुद्र एवं सेतु नाम के राजाओं को पराजित किया जाता है। उत्तरपुराण (सर्ग ६८।५२२) के अनुसार राम और लक्ष्मण विमान के द्वारा जाकर सेना सहित लङ्का के समीप उतरते हैं। अभिषेकनाटक के अनुसार जब राम बाण चलाने को तत्पर होते हैं तब वरुण प्रकट होकर समुद्र के जल को दो विभागों में विभक्त कर देते हैं, जिससे राम की सेना समुद्रतल से पार होती है। पद्मपुराण (पातालखण्ड अध्याय ११२) के अनुसार राम ने सहायता के लिए शिव की प्रार्थना की थी। शिव ने प्रसन्न होकर अजगव धनुष दिया । राम ने उस धनुष को समुद्र में फेंक दिया और उसी पर समस्त सेना ने समुद्र पार किया। बिहोररामकथा में हनुमान् अपनी पूँछ बढ़ाते हैं। उसी पर राम, लक्ष्मण आदि पार होते हैं। वस्तुतः आर्ष विज्ञान पर आदृत वाल्मीकिरामायण की कथा ही परम प्रमाण है। अन्य कथाओं को उसके अनुगुण ही जोड़ना उचित है । ५७४वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि "प्रचलितरामायण में अधिकांश सेतुबन्धविषयक सामग्री प्रक्षिप्त है । तत्सम्बन्धी वर्णन में अलौकिक तत्त्वों का बाहुल्य है और तीनों पाठों का वैभिन्य इस अनुमान का आधार है।" परन्तु इस तरह तो बुल्के की मारी ही बाइबिल प्रक्षिप्त हो जायगी, क्योंकि उसमें भी सम्प्रदायभेद, पाठभेद तथा अलौकिक तत्त्वों का बाहुल्य है ही। उनके अनुसार "नल के नेतृत्व में वृक्षों तथा पत्थरों से वानरों द्वारा सेतु का निर्माण तथा बाद में वानर-सेना का समुद्रतरण इस प्रसङ्ग का मूलरूप रहा होगा (वा० रा० ६।२१।४१-७७)।" परन्तु वे यह भी मानते हैं कि अपेक्षाकृत प्राचीनकाल से ही सेतुबन्धवर्णन में अलौकिक तत्त्वों का समावेश किया गया है। तीनों पाठों में राम का तीन दिन प्रायोपवेशन करने तथा क्रुद्ध होकर समुद्र को अपने बाणों से क्षुब्ध करने का वर्णन किया गया है। सर्ग २१ में सागर का प्रकट होकर विश्वकर्मा के पुत्र नल द्वारा सेतु-निर्माण का सुझाव देना भी तीनों पाठों में समान है।