रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 643, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंबुल्के यत्र-तत्र पाठभेद के कारण प्रक्षेप कह देते हैं। परन्तु यहाँ तीनों पाठों में समान वर्णन होने पर भी अलौकिकता के कारण प्रक्षेप कह देते हैं । इस तरह ईसाइयत को छोड़कर और कोई कारण नहीं कि उक्त टीकाकारों से सम्मत परम्पराप्राप्त सर्गों को प्रक्षेप कह दिया जाय । वाल्मीकिरामायण के अनुसार राम साक्षात् परब्रह्म के अवतार ही थे । तब उनके बाण से भयभीत होकर समुद्र के अधिष्ठाता देव का प्रकट होना और सेतुबन्ध का सुझाव देना सर्वथा ही सङ्गत है । इसमें असङ्गति का स्वप्न बुल्के ही सोच सकते हैं । ऐसे लोग पहले तो कूटनीति से जहाँ तहाँ से ऐसी सामग्री उपस्थित करते हैं, जिससे पहले यह विश्वास किया जा सके कि सेतुबन्ध के बिना काम चल सकता था, पर अगर सेतुबन्ध मानना ही पड़े तो सामान्य रूप से बन्दरों ने वृक्षों और पत्थरों को डालकर सेतु बाँधा होगा । राम या उनके बाण की विशिष्ट शक्ति तथा नल और नील की विशेषता को झुठलाना बुल्के के उक्त प्रपञ्च का उद्देश्य है । अतः सेतुबन्ध-सम्बन्धी अलौकिक घटनाएँ सर्वथा प्रामाणिक ही हैं । द्रुमकुल्य-विनाश राम के ब्रह्मास्त्र का संधान करते ही सागर प्रकट होता है । राम ने कहा मेरा बाण अमोघ है । इसे कहाँ चलाऊँ । सागर ने द्रुमकुल्य देश पर चलाने का सुझाव दिया, जहाँ बहुत से दस्यु निवास करते थे । राम ने बाण चलाया । बाद में वह देश मरुकान्तार के नाम से विख्यात हुआ ( वा० रा० ६।२२।२५-४०) । गौड़ीय पाठ के अनुसार दशरथ और सागर की मैत्री तथा पश्चिमोत्तरीय पाठ के अनुसार समुद्रतरण के पश्चात् समुद्र का प्रकट होकर राम और लक्ष्मण को कवच एवं आयुध प्रदान करना भी प्रामाणिक ही है । सम्प्रदाय- भेद से पाठभेद प्रामाणिक ही होते हैं । पद्मपुराण भी आर्ष एवं प्राचीन ग्रन्थ है, अतः उसके २६९ वें अध्याय के अनुसार राम ने अपने बाणों से समुद्र को सोख लिया तथा सागर के विनय करने पर वारुणास्त्र द्वारा उसमें पुनः जल भर दिया । कल्पभेद से उक्त कथा की सङ्गति हो जाती है । विभिन्न कल्पों में राम के अवतार होते हैं । उनमें अधिकांश चरितों में समता होने पर भी किन्हीं अंशों में विलक्षणता भी होती है । राम सर्वशक्तिमान् परमेश्वरावतार थे, अतः उनका बाणों से समुद्र सोख लेना और वारुणास्त्र से पुनः समुद्र को भर देना असम्भव नहीं है । महाभारत की रामोपाख्यानकथा तो वाल्मीकिरामायण से मिलती ही है । राम को स्वप्न में समुद्र दर्शन देकर कहता है कि नल द्वारा फेंके पदार्थ समुद्र में नहीं डूबेंगे । अतः नल के द्वारा पाषाण आदि के न डूबने से सेतु-निर्माण योजना सफल होती है । स्कन्दपुराण सेतुमाहात्म्य ( अध्याय २ ) की भी सङ्गति हो जाती है । अद्भुतरामायण के अनुसार क्रुद्ध लक्ष्मण के शरीरताप से समुद्र सूखता है और राम के सीता-विरहजन्य आँसुओं से समुद्र पुनः भर जाता है ( सर्ग १६ ) । इस कथन का आशय स्पष्टतः यही है कि लक्ष्मण के प्रखर प्रताप से सागर भी शुष्क हो सकता है और राम के कारुण्य से समुद्र भी भर सकता है । अनामकं जातकं के अनुसार लघु वानर के रूप में इन्द्र ने सेतु-निर्माण का परामर्श दिया और हनुमान् ने ही सेतु का निर्माण किया । शरीर के जितने बाल थे उतने ही पत्थर वे प्रत्येक बार लाते थे । तत्त्वसंग्रहरामायण ( ६।६ ) के अनुसार सागरपुत्री कन्याकुमारी ने राम के पास विवाह का प्रस्ताव किया । राम ने युद्धव्याज से विवाह अस्वीकार करके सेतु बनवाने की अनुमति मांगी । वाल्मीकिरामायण ( ६।२२।४१ ) के अनुसार नल राम से कहता है मुझे अपने पिता विश्वकर्मा की सामर्थ्य प्राप्त है । विश्वकर्मा ने नल की माता को यह वरदान दिया था कि तुम्हारा पुत्र मेरे ही समान होगा— “मया तु सदृशः पुत्रस्तव देवि भविष्यति ।” ( वा० रा० ६।२२।४७ ) रङ्गनाथरामायण ( ६।२५ ) के अनुसार नल मुनियों की पूजा की प्रतिमाओं को समुद्र में फेंक देते थे । अतः मुनि ने यह कह दिया था कि यह बालक जो कुछ भी वस्तु समुद्र में फेंकेगा वह जल पर तैरती रहेगी । तुलसी- दास ने नल और नील दोनों भाइयों को ऐसे वर की प्राप्ति मानी है । इस तरह की अन्यान्य कथाओं का भी निष्कर्ष