रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय युद्धकाण्ड ५८७ इतना ही है कि नल और नील के स्पर्श से पाषाण समुद्र में डूबते नहीं थे । फलतः आसानी से समुद्र में सेतु बना दिया गया । वाल्मीकिरामायण से अविरुद्ध अन्य कथाओं का उसके साथ समन्वय करना ही उचित है । रामकियेन तथा सेरीराम आदि में हनुमान् एवं नल-नील के विवाद की कथा विकृति ही है । वाल्मीकिरामायण तथा अध्यात्मरामायण आदि के अनुसार हनुमान् एक महान् दिव्यगुणसम्पन्न ज्ञानी तथा भक्त थे । नल और नील भी देवांश थे । उनके समन्वय से ही सेतुबन्ध जैसा महान् कार्य सम्पन्न हो सका था । आनन्दरामायण तथा भावार्थरामायण का यह कथन भी विरुद्ध नहीं है कि रामनाम के दोनों अक्षरों से अङ्कित होने के कारण पत्थरों में आपस में दृढ़ संयोग बना रहा । गिलहरियों ने समुद्र में गोता लगाकर अपने अंग के बालू को सेतु पर गिरागिराकर पुल बाँधने में सहायता की थी । इसपर राम ने उनपर अनुग्रह कर अपना हाथ उनपर फेरा था । यह कथा राम की सर्वप्रियता ही व्यक्त करती है । इसका मूलकथा से कोई विरोध तो है ही नहीं । बल्कि कहते हैं तुलसीदास ने तो सभी जलचरों को रामभक्त बना दिया, परन्तु इसमें आश्चर्य की बात ही क्या है ? जब राम ब्रह्मरूप ही हैं उनका दर्शन जिन जिन लोगों को प्राप्त हुआ वे भगवद्भक्त ही हो सकते हैं— देखन कहँ प्रभु करुणा कन्दा । प्रकट भये सब जलचर बृन्दा ॥ प्रभुहि बिलोकहिं टरहिं न टारे । मन हरषित सब भये सुखारे ॥ सेरीराम के अनुसार रावण अपने पुत्र गङ्गामहासूरा को बुलाता है जो समुद्र की रानी गंगा महादेवी के गर्भ से उत्पन्न है । गंगामहासूरा मछलियों को समुद्र-सेतु नष्ट करने का आदेश देता है । उनका आक्रमण देखकर हनुमान् अपनी पूँछ हिलाते हैं । उससे समुद्र का जल पंकिल हो जाता है । मछलियाँ ऊपर आ जाती हैं। वानरों द्वारा फँसायी और खायी जाती हैं । बाद में एक केकड़ा सेतु पर आक्रमण करता है । हनुमान् केकड़े को स्थल पर पटक देते हैं । वह इतना बड़ा था कि उसे खाकर समस्त सेना तृप्त हो जाती है । हनुमान् रानी के पास जाकर उससे सेतु पुनः बनवाते हैं । उससे एक पुत्र उत्पन्न करते हैं । रामकेर्ति (सर्ग ७) के अनुसार सागर ने नागों और मछलियों को सेतु नष्ट करने का आदेश दिया । जब राम समुद्र पर बाण चलाने को तैयार हुए तो समुद्र ने क्षमा माँग ली । रामकियेन (अध्याय २६) के अनुसार रावण अपनी पुत्री सुवर्णमच्छा को सेतु नष्ट करने का आदेश देता है । वह अपनी सेना लेकर सेतु नष्ट करने गयी । हनुमान् उससे पुनः सेतु बनवाते हैं और उससे एक पुत्र मच्छानु को भी उत्पन्न करते हैं । सेरीराम के अनुसार सागर का एक स्थल नहीं पटता था । जब राम क्रुद्ध होकर बाण चलाना चाहते थे तब एक सुन्दरी ने प्रकट होकर कहा—यह स्थल पाताल जाने का मार्ग है । यहाँ का जल पीकर आपके सैनिक अजेय हो जायेंगे । राम ने सेना को जल पीने का आदेश दिया । उक्त अनेक ऐसी कथाओं का तात्पर्य राम और हनुमान् की महिमा वर्णन करने में ही है । “यत्परः शब्दः स शब्दार्थः” शब्दों का जिसमें तात्पर्य होता है, वही उनका अर्थ होता है । ५७९ वें अनु० में बालरामायण के अनुसार रावण मायामय जानकी का वध करता है । पश्चात् रावण- पुत्र सिंहनाद प्रकट होता है, उसका राम के द्वारा वध किया जाता है । एक प्रभञ्जनी राक्षसी राम-लक्ष्मण का वध करने के लिए आती है । उसे अङ्गद मारते हैं । रामकियेन के अनुसार विभीषण पुत्री बेंजकाया रावण की आज्ञा के अनुसार सीता के रूप में मृतवत् बहती हुई दिखती है । उसे देख राम निराश होते हैं । हनुमान् उस बनावटी सीता को चिता पर रखते हैं तब वह चिल्लाकर अपने रूप में प्रकट होती है । सुग्रीव के द्वारा कोड़ों से पिटने पर वह अपने को विभीषण की पुत्री बताती है । इसपर राम विभीषण को उसे उचित दण्ड देने का आदेश देते हैं । विभीषण ने उसे प्राणदण्ड की सजा सुनायी । राम विभीषण की निष्पक्षता देखकर हनुमान् के साथ उसे लङ्का भेज देते हैं । हनुमान् द्वारा उससे एक पुत्र भी उत्पन्न होता है । राम, लक्ष्मण एवं हनुमान् के आदर्शों एवं आचारों के सम्बन्ध में वाल्मीकिरामायण ही परम प्रमाण है । उसके विपरीत आचरण का उल्लेख विकृति ही है ।