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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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५६८ रामायणमीमांसा अष्टादश रामेश्वर-प्रतिष्ठा ५८० वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि वाल्मीकिरामायण दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार सीता को सेतु दिखलाकर राम कहते हैं कि यहाँ महादेव ने मुझपर अनुग्रह किया था— "अत्र पूर्वं महादेवः प्रसादमकरोद् विभुः ।" (वा० रा० ६।१२३।२० ) वाल्मीकिरामायण के अन्य पाठों में न होने पर भी दाक्षिणात्य पाठ में उपलब्ध होने से यह प्रामाणिक ही है । पर बुल्के कहते हैं "बाद की रामकथाओं में सेतुबन्ध के समय शिवप्रतिष्ठा का प्रायः उल्लेख किया गया है । लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि पहले राम द्वारा शिवप्रतिष्ठा युद्ध के पश्चात् ही मानी जाती थी। नारदीयपुराण (उत्तरार्द्ध अ० ७६), नृसिंहपुराण (अ० ५२), कूर्मपुराण (अ० २१), सौरपुराण (अ० ३०) तथा पद्मपुराण (पा० ख० अ० ११२। २२१; सृष्टिख० अ० ४०) में युद्ध के पश्चात् ही शिवलिङ्ग-स्थापना का उल्लेख है। स्कन्दपुराण (ब्राह्मख० सेतुमाहात्म्य अ० ७ और अ० ४४-४७) में सेतुबन्ध के समय और युद्ध के बाद दोनों बार इसका वर्णन है। सेतु-माहात्म्य में द्वितीय बार की शिव-प्रतिष्ठा का वृत्तान्त इस प्रकार है : युद्ध के पश्चात् गन्धमादन पर्वत पर जाकर राम दण्डकारण्य से आये हुए मुनियों से पूछते हैं कि रावण-वध का प्रायश्चित्त किस प्रकार किया जाय ? वे रामेश्वरलिङ्ग-स्थापना का परामर्श देते हैं। इसपर राम हनुमान् को शिव-लिङ्ग लाने के लिए कैलास भेजते हैं। वहाँ जाकर हनुमान् को उसे प्राप्त करने के लिए तपस्या करनी पड़ती है। मुहूर्त बीत जाने के भय से मुनि सैकतलिङ्ग स्थापित कराते हैं। सैकत- लिङ्ग की प्रतिष्ठा के बाद पहुँचने पर हनुमान् दुःखित होते हैं। राम हनुमान् को स्थापित सैकत लिङ्ग उठाने की आज्ञा देते हैं । हनुमान् प्रयत्न कर असफल होकर मूर्च्छित हो जाते हैं। बाद में राम की आज्ञा से हनुमान् अपने लाये लिङ्ग को रामेश्वर से उत्तर में स्थापित करते हैं। आनन्दरामायण में ऐसी ही कथा युद्ध के पूर्व है। उसके अनुसार हनुमान् को काशी भेजा था। शिव ने दो लिङ्ग दिये थे। बाद में शिव ने समुद्र-तट पर राम को दर्शन देकर बारह ज्योतिर्लिङ्गों की कथा और रामेश्वर का माहात्म्य बताया था ।" वस्तुतः वाल्मीकिरामायण के अनुसार युद्ध के पहले सेतुबन्ध के समय ही रामेश्वर की स्थापना हुई, यह "अत्र पूर्वं महादेवः प्रसादमकरोद् विभुः ।" से ही स्पष्ट है। अन्य कथाएँ कल्पान्तरीय ही समझनी चाहिये । भावार्थरामायण के अनुसार वानरों ने राम को उठाकर सेतु के उस पार किया था कि कहीं राम के चरण-स्पर्श से अहल्या के समान पत्थरों से सुन्दरियाँ न प्रकट हो जायें। सेरीराम के अनुसार हनुमान् सहस्रस्कन्ध सिंह का रूप धारण करते हैं। राम उनपर चढ़ कर सेतु पार करते हैं। कहा जाता है कि हनुमान् सेतु के लिए एक पहाड़ ला रहे थे। उन्हें ज्ञात हुआ कि सेतु-निर्माण पूरा हो गया। अतः हनुमान् पहाड़ को वहीं छोड़कर राम के पास गये। राम ने कहा कि वह पर्वत मेरा प्रेम-पात्र है। मैं कृष्णावतार में सात दिनों तक उसे अपनी कनिष्ठिका पर रख- कर ब्रजवासियों की रक्षा करूँगा। वही पर्वत ब्रज का गोवर्धन कहलाया । वाल्मीकिरामायण की कथा से विरोध न होने से एवं आप्त भक्तों में प्रसिद्धि से उक्त कथाएँ भी प्रामाणिक ही हैं। लङ्कावरोध शुक तथा सारण राम की सेना की टोह लगाने गये, पर वे पहचान लिये गये । फिर भी राम ने उन्हें छुड़ा दिया। उन्होंने लङ्का लौटकर सीता को लौटाने का परामर्श दिया। रावण ने स्वीकार नहीं किया । शुक के साथ रावण ने उच्च भवन पर आरूढ़ होकर वानर-सेना देखी । शत्रु राम की प्रशंसा करने के कारण रावण ने उन दोनों की भर्त्सना की और शार्दूल के नेतृत्व में नये गुप्तचरों को भेजा। वह भी पकड़ा गया। राम ने उसे भी मुक्त किया। उसने लौटकर समाचार दिया कि राम सुबेल पर आ गये हैं। शुक आदि के वर्णन में विभिन्न वानर भटों एवं राम और लक्ष्मण का शौर्य, पराक्रम और माहात्म्य वर्णित है। किन्तु बुल्के गुप्तचर-वृत्तान्त को प्रक्षेप कहते हैं। उनका