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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 646

अध्याय युद्धकाण्ड ५६९ यह कथन निर्मूल है, क्योंकि वह परम्पराप्राप्त और टीकाकारसम्मत है। राजकीय वृत्तान्तों में यह अर्थात् गुप्तचर- वृत्तान्त अनिवार्य होता है। पढ़ते ही वे महत्त्वपूर्ण वर्णन अत्यन्त उपयुक्त प्रतीत होते हैं। इन सर्गों में देवांशभूत वानरों का अतुल पराक्रम वर्णित है। कहा गया है कि जाम्बवान् ने देवासुर-संग्राम में इन्द्र की बड़ी सहायता की थी। वानरों के पितामह संनादन के सम्बन्ध में कहा गया है कि उसने इन्द्र से युद्ध करके पराजय नहीं पायी। मैन्द तथा द्विविद का महान् पराक्रम तथा हनुमान् के पराक्रम की चर्चा में कहा गया है कि उसने उदित होते हुए सूर्य को फल समझकर खाने का उपक्रम किया था। आगमयोग से मैं उसे जानता हूँ। उसके प्रभाव का वर्णन नहीं हो सकता। वह अकेले ही लङ्का का मर्दन कर सकता है। उसी के द्वारा लगायी गयी लङ्का की अग्नि अभी तक शान्त नहीं हुई है। इन सर्गों में विविध वानरों एवं उनकी अपार संख्या का वर्णन है। जिनमें धर्म नहीं चलित होता है, जो कभी धर्म का अतिक्रमण नहीं करते, जो वेदविदों में श्रेष्ठ हैं, जो ब्राह्म अस्त्र जानते हैं, जो बाणों से आकाश और पृथिवी को विदीर्ण कर सकते हैं, मृत्यु के समान जिनका क्रोध और शक्र के समान पराक्रम है वह राम हैं, जो नीति में और युद्ध में कुशल हैं, शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ हैं और जो दुर्गम जेता एवं अमर्षी, विक्रान्त, जयी और बली हैं वे राम के दक्षिण बाहु एवं बहिश्चर प्राण ही लक्ष्मण हैं। विभीषण तथा सुग्रीव का भी महत्त्व-वर्णन है। अङ्गद, कुमुद, नल, नील, गज, पनस, गवाक्ष तथा द्विविद का वर्णन है। शुक और सारण द्वारा शत्रुसेना का प्रशंसापूर्ण वर्णन सुनकर रावण क्षुब्ध होता है और ये लोग राम, लक्ष्मण और उनकी सेना से प्रभावित हो गये हैं, यह समझ कर उनकी भर्त्सना करता है और पुनः विश्वस्त, धीर, शूर और भय तथा आतङ्क से रहित गुप्तचरों को आदेश करता है कि शत्रु कैसे सोता है ? कब क्या करता है ? सब कुछ निपुणता से जानकर आओ । चारचक्षु नराधिप चारों द्वारा शत्रु की स्थिति जानकर स्वल्प यत्न से ही शत्रु का विनाश कर सकते हैं। चारों ने जयजयकार कर शार्दूल के नेतृत्व में रावण की प्रदक्षिणा करके प्रस्थान किया। वे जहाँ राम और लक्ष्मण थे वहाँ गये एवं जहाँ सुग्रीव और विभीषण थे वहाँ भी प्रच्छन्नरूप से गये । परन्तु राम, लक्ष्मण तथा प्रभावशाली महान् शूरवीरों से अधिष्ठित महती सेना को देखकर भय से विह्वल हो गये। सहसा विभीषण द्वारा पहचाने गये वे विक्रान्त वानरों द्वारा र्अदित हो रहे थे, राम ने पुनः उन्हें छुड़ा दिया । उन चारों ने भी राम के अक्षोभ्य बल का वर्णन किया। उद्विग्न होकर रावण के पूछने पर शार्दूल ने कहा—राजन् ! उन विक्रान्त बलवान् राघवेन्द्र से रक्षित वानरपुङ्गवों में कोई चार सफल नहीं हो सकता । उनसे संभाषण करना भी कठिन है । पर्वततुल्य वानरों से सब ओर का मार्ग सुरक्षित है । प्रविष्ट होते ही हम लोग पकड़ लिये गये। वे अमर्षणशील वानर जानु, मुष्टि, दातों एवं तल-प्रहारों से आहत करके हम सबको राम की सभा में ले गये । राघव ने हम सब को बचाया । पहाड़ों और शिलाओं से समुद्र को पाट कर के सेतु बाँधकर सायुध और सपरिकर राम लङ्का-द्वार पर आकर गरुड़व्यूह रचकर स्थित हैं। उन्हीं ने हमें मुक्त किया है। अब या तो उन्हें सीता लौटा दीजिये अथवा युद्ध कीजिए । रावण ने कहा-देव, दानव तथा गन्धर्व सब लोग मुझसे युद्ध करेंगे तो भी मैं सीता को नहीं लौटाऊंगा । ३० वें सर्ग में रावण ने पुनः उस सेना के प्रधान वीरों की उत्पत्ति और प्रभाव के सम्बन्ध में प्रश्न किया। सौम्य, उन दुरासद वीरों का कैसा तेज है ? वे कैसे हैं ? किसके पुत्र या किसके पौत्र हैं ? विजिगीषु को इन बातों पर विचार करना आवश्यक होता है। शार्दूल ने बताया सुग्रीव ऋक्षरजा के पुत्र हैं। गद्गद के क्षेत्र से जृम्भमाण ब्रह्मा की शक्ति से उत्पन्न जाम्बवान् प्रसिद्ध हैं। दूसरा धूम्र है जो कि इन्द्रगुरू बृहस्पति का पुत्र है। सुषेण धर्म का पुत्र है । दधिमुख सोमपुत्र है । सुमुख, दुर्मुख और वेगदर्शी को निश्चित रूप से स्वयम्भू ने मृत्यु ही बनाया है। नील अग्नि का पुत्र है। हनुमान् वायु का पुत्र है। अङ्गद इन्द्रपुत्र वाली का पुत्र है। मैन्द और द्विविद दोनों अश्विद्वय के पुत्र हैं। गज, गवाक्ष, गवय, शरभ और गन्धमादन ये पाँच वैवस्वत के पुत्र हैं। ये काल और यम के ही तुल्य हैं। राजन्, सिंह- ७२