रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 647, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ें५७० रामायणमीमांसा अष्टादश सहनन युवा राम दशरथ के पुत्र हैं । इन्होंने ही दूषण, खर एवं त्रिशिरा का वध किया था । इनके समान भूमण्डल में कोई भी शूर नहीं है। कालतुल्य विराध को इन्होंने ही मारा है । संसार में कोई मनुष्य राम के गुणों का वर्णन करने में समर्थ नहीं है । जनस्थान के राक्षसों का संहार भी इन्होंने ही किया है। धर्मात्मा लक्ष्मण इनके भ्राता ऐसे प्रभावी हैं कि इन्द्र भी उनके बाणपथ में आकर बच नहीं सकता । श्वेत और ज्योतिर्मुख भास्कर के पुत्र हैं। हेमकूट वरुण का पुत्र है । नल विश्वकर्मा का पुत्र है । वेगवान् दुर्धर वसु का पुत्र है। राक्षसों में श्रेष्ठ आपके भ्राता श्रीमान् विभीषण हैं। पहले बुल्के ही बालकाण्ड तथा उसमें वर्णित वानरों के देवांश होने का खण्डन कर चुके हैं। परन्तु इन सर्गों में भी वही सब वर्णित है । अतएव उनके सामने इन सर्गों को भी प्रक्षेप कहने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं है, परन्तु उनके सब तर्क निःसार हैं । राजशेखर के अनुसार शुक और सारण गुप्तचर न होकर रावण के दूत बनकर जाते हैं और राम के सामने द्वन्द्वयुद्ध का प्रस्ताव रखते हैं । राम उसके लिए अङ्गद को चुनते हैं और रावण नरान्तक को चुनता है । अङ्गद नरान्तक को मार डालता है। अध्यात्मरामायण के अनुसार शुक पूर्वजन्म में एक धर्मभीरु ब्राह्मण था। वह रामभक्त था । तुलसीदास के अनुसार उसने रावण को लक्ष्मण का एक पत्र भी दिया था, जिसमें सीता को लौटाने की चेतावनी थी। रामकियेन के अनुसार कोई गुप्तचर गीध बनकर आया था । विभीषण के संकेत से हनुमान् ने उसे पकड़ लिया था । वह कोड़ों की मार खाकर रावण के पास लौट गया । तब रावण संन्यासी बनकर राम के समीप गया और राम से युद्ध न करने का अनुरोध करने लगा, किन्तु राम का दृढ़ सङ्कल्प पाकर लौट गया । पद्मपुराण के अनुसार अतिकाय और महाकाय वानरों द्वारा फँसाये गये थे । अतिकाय ने शुक्राचार्य की एक भविष्यवाणी का उल्लेख किया था कि लङ्का के द्वार पर अङ्कित 'दारुपञ्चवक्त्र' के विच्छिन्न हो जाने पर रावण का वध होगा। यह सुनकर राम ने अपने बाण से उसे छिन्न-भिन्न कर दिया (पद्मपु० पा० ख० ११२।२०८-२१०) । वाल्मीकिरामायण से अप्रतिषिद्ध अविरुद्ध अन्य कथाएँ भी मान्य ही हैं। राम के मायाशीर्ष का वृत्तान्त उस वृत्तान्त को भी, महाभारत के रामोपाख्यान में वर्णन न होने से, बुल्के सीतावध का अनुकरणमात्र मानते हैं । परन्तु यह बुल्के की भ्रान्ति ही है। टीकाकारों ने उस वृत्तान्त पर भी टीका की ही है। ऐसी स्थिति में सीतावधवृत्तान्त को ही रामशीर्ष के वृत्तान्त का अनुकरण क्यों न मान लिया जाय ? कथा यों है—रावण की आज्ञा के अनुसार मायावी विद्युज्जिह्व ने राम का मायामय शीर्ष और शरसहित धनुष बनाकर अशोकवन में जहाँ जानकी थी रावण के साथ प्रवेश किया । रावण ने वहाँ जाकर प्रहस्त के द्वारा रामवध का समाचार सीता को बताया । सीता करुण विलाप करने लगी। मन्त्रियों ने रावण को बुला लिया । रावण के चले जाने पर वह मायामय शीर्ष भी लुप्त हो गया । तब सरमा ने जाकर सीता के सामने रावण की माया का रहस्य बताया । यह भी बताया कि मैंने अपनी आँखों से देखा है कि राम लङ्का के द्वार पर आ गये हैं (सर्ग ३३) । सीता के आदेशानुसार सरमा ने रावण सभा का यह निर्णय भी सीता को सुनाया (सर्ग ३४) कि वह मन्त्रियों के सत्परामर्श को अस्वीकार कर सीता को लौटाना नहीं चाहता है। कहीं कहीं त्रिजटा द्वारा उक्त कार्यों का उल्लेख किया गया है । रङ्गनाथरामायण के अनुसार एक आकाशवाणी सीता से कहती है कि यह वास्तविक राम का सिर नहीं है । आनन्दरामायण (१।११।२२१) के अनुसार ब्रह्मा ने सीता को पहले ही बता दिया था कि रावण तुम्हें राम का कृत्रिम सिर दिखलायेगा । कृत्यरामायण के अनुसार रावण ने दारुणिका राक्षसी को सीता-वध के लिए नियुक्त किया था, पर उसे यह साहस नहीं हुआ । उसी ने मायामय राम का वध इसलिए दिखाया कि सीता स्वयं ही