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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 648

आत्महत्या कर ले। सीता चिता जलाकर जलने को तैयार हुई तब त्रिजटा ने विभीषण से राम का कुशल वृत्तान्त जानकर सीता को आश्वस्त किया। तात्पर्य प्रायः सबका एक ही है, अवान्तर कथाओं में कुछ भेद संभव है, फिर भी इतिहास की दृष्टि से वाल्मीकिरामायण-कथा ही ठीक है। ५८४ अनु०, वाल्मीकिरामायण के केवल दाक्षिणात्य पाठ में अङ्गद के दौत्य कार्य से पहले ही सुग्रीव और रावण का द्वन्द्वयुद्ध वर्णित है। सुग्रीव सहसा पर्वत से लङ्का के गोपुर पर कूद कर रावण के पास पहुँचता है और द्वन्द्वयुद्ध करता है। सुग्रीव रावण को द्वन्द्वयुद्ध में परास्त करता है (अ० रा० ६।५।४१-४५)। सुवेल से ही राम ने रावण को उसके मन्त्रियों सहित देखा और एक ही बाण से उसके हजारों श्वेत छत्र काट डाले। रावण लज्जित होकर अपने भवन के अन्दर चला गया। रामकियेन (अध्याय २६) के अनुसार ब्रह्मा ने रावण को एक चमत्कारी छत्र दिया था। जब रावण उसे खोल देता था तब लङ्का के चारों ओर गहन अन्धकार छा जाता था। जिससे कोई योद्धा लङ्का को देख नहीं सकता था। सुग्रीव ने कूदकर उस छत्र को छिन्न-भिन्न कर दिया। लङ्का का गहन अन्धकार दूर हो गया। कृत्तिवासरामायण के अनुसार अन्तरिक्ष में स्थित देवता युद्ध की प्रतीक्षा कर रहे थे। पार्वती ने शिव से अनुरोध किया कि वह अपने भक्त रावण की रक्षा करें। शिवजी ने कहा, रावण को अमरत्व का वर नहीं प्राप्त है। विष्णु अवतार लेकर उसका वध करने आये हैं। अब उसका बचना संभव नहीं है। बालरामायण (८।२) के अनुसार रावण ने शुक और सारण को भेजने के बाद शिव की पूजा की, किन्तु स्त्री समझकर उमा को प्रणाम नहीं किया। उन्होंने क्रुद्ध होकर शिव के वरदायक हाथ को खींच लिया था। उक्त कथाएँ वाल्मीकिरामायण के अविरुद्ध होने से असंभव नहीं हैं। ५८५ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि "वाल्मीकिरामायण के अनुसार लङ्कावरोध के पहले विभीषण के परामर्शानुसार अङ्गद द्वारा यह संदेश भेजा गया था कि यदि रावण सीता को लौटा दे तो मैं राक्षसों का विनाश नहीं करूँगा।" सन्देश से क्रुद्ध होकर रावण ने अङ्गद के वध का आदेश दिया। चार राक्षसों ने अङ्गद को पकड़ना चाहा। अङ्गद बाहुसम्बद्ध चारों के साथ ही वेग से एक भवन पर कूदा। चारों निस्सहाय भूमि पर गिरे ऊपर से भवन को ढहाकर अङ्गद राम के पास चला गया। रामचरितमानस आदि में अङ्गद और रावण का संवाद विस्तार से वर्णित है। उस परम्परा के अनुसार वह ठीक ही है। आनन्दरामायण तथा भावार्थरामायण के अनुसार अङ्गद अपनी पूंछ का कुण्डल बनाकर सिंहासन की भाँति उसपर बैठा था। बुल्के कहते हैं कि "अङ्गद द्वारा बलप्रदर्शन तथा राक्षसों की पराजय के विषय में अनेक नयो घटनाओं की कल्पना कर ली गयी है।" बुल्के यह नहीं जानते कि भारतीय विद्वान् या तुलसीदास जैसे सन्त अप्रामाणिक कल्पना को पाप समझते हैं। झूठे इतिहास के निर्माण की परम्परा पाश्चात्यों में ही प्रसिद्ध है। अतएव रामचरितमानस के अनुसार अङ्गद का प्रण कर पैर रोपना और उसे उठाने में कोटि कोटि सुभटों का असमर्थ होना कल्पना नहीं है, किन्तु वह सत्य घटना थी। तुलसीदास ने जिस परम्परा की चर्चा की है वह ऐतिहासिक तथ्य है। शतकोटि-प्रविस्तर रामायण में उक्त कथानक विद्यमान ही है। रामचरितमानस के अनुसार अङ्गद के बलप्रदर्शन पर पृथिवी हिलने लगी, रावण के मुकुट गिर पड़े। कुछ तो रावण ने उठाकर अपने सिर पर रख लिये और कुछ अङ्गद ने राम के पास प्रेषित कर दिये। अङ्गद प्रेषित मुकुटों को आते देख वानरों ने उन्हें उल्कापात समझा था या रावण प्रेषित वज्र समझा था। राम ने