रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबतलाया कि ये अङ्गद-प्रेषित दशमुख के किरीट हैं। हनुमत् ने उनको पकड़कर राम के पास रखा । सूर्य के समान प्रकाशवाले उन मुकुटों को कौतुक से वानर देख रहे थे— ये किरीट दशकन्धर केरे । आवत वालिनयके प्रेरे ॥” ( रा० मा० ६।३१।५ ) आश्चर्य है, बुल्के तुलसीदास में श्रद्धा प्रकट करते हैं, परन्तु उन्हें मिथ्याकल्पनाकार भी लिखते हैं । गुणभद्र आदि के अनुसार हनुमान् को ही दौत्य के लिए भेजा गया है । सेरीराम के अनुसार कुम्भकर्ण-वध के बाद राम हनुमान् के द्वारा पत्र भेजते हैं जिसमें सीता को लौटाने का प्रस्ताव था । शूर्पणखा को विरूपित करनेवाले लक्ष्मण को बाँधकर लङ्का भेज दिया जाय तो रावण इस प्रस्ताव को स्वीकार करने को तैयार था। रामचन्द्रिका ( १६।३२ ) के अनुसार रावण निम्नोक्त शर्तों के साथ सीता को लौटाने को तैयार था । सुग्रीव को मारकर अङ्गद को राज्य दिया जाय, विभीषण को बाँधकर लङ्का भेजा जाय, सेतु नष्ट कर दिया जाय, हनुमान् की पूँछ जला दी जाय तथा राम रुद्र की पूजा करें । वस्तुतः रावण सीता को लौटाना नहीं चाहता था । तदनुसार कवियों ने असंभावित शर्तों की भी कल्पना की है । वाल्मीकिरामायण, अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, महाभारत, विभिन्न पुराणों तथा रामचरितमानस की परम्पराप्राप्त कथाओं में ही कल्पभेद से समन्वय होता है। अन्य कथाओं को उनके अनुसार ही लगाना चाहिये । सर्वथा विपरीत जैनबौद्ध कथाएँ त्याज्य ही हैं । नागपाश ५८६ वें अनु० में लङ्कावरोध के अनन्तर रावण युद्ध का आदेश देता है । इसमें अनेक द्वन्द्वयुद्धों का वर्णन है । अङ्गद द्वारा इन्द्रजित् की पराजय तथा इन्द्रजित् के द्वारा राम और लक्ष्मण का नागपाश में बाँधा जाना सबसे महत्त्वपूर्ण घटना है । ब्रह्मा के वरदान से अदृश्य होकर इन्द्रजित् नागमय शरों से राम और लक्ष्मण को आहत करता है। दोनों निश्चेष्ट होकर रणभूमि में शयन करते हैं । इन्द्रजित् दोनों को मृत समझकर रावण को सूचना देता है— ( वा० रा० ६। सर्ग ४३–४६ ) । रावण ने सीता तथा त्रिजटा को पुष्पक विमान द्वारा मूच्छित राम और लक्ष्मण को दिखलाया । सीता विलाप करने लगी तब त्रिजटा ने कहा कि राम जीवित हैं । यदि राम जीवित न होते तो तुम पुष्पक में बैठ ही नहीं सकती, क्योंकि पुष्पक विधवा का वहन नहीं करता है तथा राम और लक्ष्मण के मुख पर मृत्यु का विकार लक्षित नहीं होता ( वा० रा० ६। सर्ग ४७, ४८ ) । बाद में राम चेतना प्राप्त कर लक्ष्मण के लिए विलाप करते हैं । सुषेण औषध लेने हनुमान् को भेजने का प्रस्ताव करते हैं । इतने में गरुड़ के आगमन से नाग भाग जाते हैं । उनके स्पर्श से दोनों स्वस्थ हो जाते हैं ( वा० रा० ६। सर्ग ५० ) । बुल्के गरुड़ागमन को प्रक्षिप्त मानते हैं । पर उनके श्रद्धेय तुलसीदास के रामचरित का मुख्य आधार ही गरुड़-भुशुण्डिसंवाद है । गरुड़ को नागपाशबद्ध राम के दर्शन से ही मोह होता है । महाभारत के रामोपाख्यान में विभीषण स्वयं ही प्रज्ञास्त्र से राम और लक्ष्मण को शरपाश से मुक्त करते हैं । गोविन्दरामायण के अनुसार सीता नागमन्त्र पढ़कर नागपाश काट देती हैं । वस्तुतः विभीषण का प्रज्ञास्त्र सही समझना चाहिये । उन्होंने जान लिया कि नाग ही बाण बनकर बन्धन बने हैं । अतः गरुड़ से ही उनका निवारण होगा । इसी तरह सीता के मन्त्र का प्रभाव भी गरुड़ के आगमन में हेतु कहा जा सकता है । इसी दृष्टि से