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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 650, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 650

अध्याय युद्धकाण्ड ५७३ कथाओं का परस्पर समन्वय किया जा सकता है। अन्यथा यह कहना होगा कि सभी कथाएँ परस्पर असंबद्ध ही हैं। किन्तु प्रामाणिक कथाओं के सम्बन्ध में ऐसा कहना उचित नहीं। चतुर्लक्षणी ब्रह्मसूत्र और द्वादशलक्षणी पूर्वमीमांसा तथा तदनुसारी धर्मशास्त्रों के निबन्धग्रन्थ सभी निरर्थक सिद्ध होंगे। यदि उनके अनुसार परस्परविरुद्ध वाक्यों का समन्वय न किया जायगा तो सम्पूर्ण वेद, उपनिषद्, धर्मशास्त्र, तन्त्र, आगम सभी असम्बद्ध एवं अप्रामाणिक ही समझे जायेंगे। अतः जैसे पूर्वोत्तरमीमांसाओं के अनुसार मन्त्र-ब्राह्मणरूप वेदों का समन्वय किया जाता है उसी तरह रामायण और पुराणों का समन्वय करना उचित है। तिलक आदि टीकाकारों ने उसी सरणि का अवलम्बन किया है। उनकी दृष्टि से विचार करने पर असंगति तथा असम्भव का प्रश्न ही नहीं उठता है। सेरीराम के अनुसार इन्द्रजित् की एक विशाल सेना को आकाशमार्ग से आती देखकर हनुमान् ने राम को परामर्श दिया कि वानर-सेना की रक्षा के लिए गरुड़ महावीर को बुलाया जाय। राम ने गरुड़ को बुलाया। इन्द्रजित् पत्थर बरसाने लगा। गरुड़ ने राम के आदेशानुसार समस्त वानर-सेना पर अपने पङ्ख फैला दिये। बाद में गरुड़ ने पत्थरों की मार से व्यग्र होकर राम से सहायता माँगी। राम ने गरुड़ को ऊपर उठाकर उनका शरीर हिलाकर पत्थर भार से मुक्त किया। ४० दिन तक वैसी ही पत्थर वर्षा होती रही। कृत्तिवास के अनुसार गरुड़ ने नागपाशमुक्ति के पश्चात् कृष्ण-रूप देखने की इच्छा प्रकट की। राम ने कहा मुझे न देखकर वानर-सेना किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो जायगी। तब गरुड़ ने पङ्ख फैलाकर राम को छिपा लिया और राम ने उन्हें कृष्ण-रूप दिखाया। हनुमान् ने योगबल से सब वृत्तान्त जान लिया। उन्होंने कृष्णावतार के समय बदला लेने का निश्चय किया। किसी पौराणिक कथा के अनुसार श्रीकृष्ण ने हनुमान् को बुलाने के लिए गरुड़ को भेजा। गरुड़ ने आकर हनुमान् से कहा कि आपको श्रीकृष्ण ने बुलाया है। मैं आपको ले चलूँगा। हनुमान् ने कहा आप चलो, मैं आ जाऊँगा। गरुड़ को अभिमान हो गया कि ये मुझसे पहले कैसे पहुँचेंगे ? वे बड़े वेग से चले तो मनोजव हनुमान् उनके पहले ही भगवान् के पास पहुँच गये। बीच में किसी उद्यान से पुष्प लेने भी गये। वहाँ सुदर्शन चक्र का पहरा था, उन्होंने भी बाधा डाली। हनुमान् ने उन्हें मुद्रिका बनाकर अपनी अँगुली में पहन लिया। ऐसी अनेक कथाएँ पुराणों में मिलती हैं। वस्तुतः हनुमान् के माहात्म्य के वर्णन में ही उक्त आख्यायिकाओं का तात्पर्य है। "नहि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवर्तते किन्तु विधेयं स्तोतुम् ।" इस मीमांसा-सिद्धान्त के अनुसार निन्दा का तात्पर्य गरुड़ या चक्र आदि का अपकर्ष वर्णन करने में न होकर विधित्सित हनुमान् की उपासना—स्तुति में ही है। बुल्के कहते हैं कि वाल्मीकिरामायण में तारा के पिता वानर-सेनापति सुषेण को वैद्य भी माना गया है। वह लक्ष्मण एवं योद्धाओं की चिकित्सा करता है (सर्ग ९१)। हनुमान् द्वारा लायी गयी औषधियों से वह रावण की शक्ति से आहत लक्ष्मण को स्वस्थ करता है (सर्ग १०१)। महानाटक, रामचरितमानस आदि में वह राक्षस-वैद्य माना जाता है, जिसे हनुमान् लङ्का से ले आते हैं। इस विरोध का समाधान भी कल्पभेद ही है। हनुमान् की हिमालय-यात्रा ५८७ वें अनु० में बुल्के हनुमान् की हिमालय-यात्राविषयक सामग्री को प्रक्षिप्त मानते हैं। उनके तद्विषयक तर्क का खण्डन पीछे किया जा चुका है।

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