रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५७४ रामायणमीमांसा अष्टादश कुम्भकर्ण-वध के पश्चात् इन्द्रजित् युद्ध में अदृश्य होकर ब्रह्मास्त्र से लक्ष्मण को आहत करता है और बहुत से योद्धाओं का वध करता है। जाम्बवान् के आदेशानुसार हनुमान् रात को हिमालय जाते हैं। वहाँ औषधियों को न देखकर औषधपर्वत को ही उठा लाते हैं। उसकी सुगन्ध से सब योद्धा स्वस्थ हो जाते हैं। वे पुनः पर्वत को वहीं पहुँचा देते हैं। बुल्के यह भी मानते हैं कि कालनेमि तथा मकरी (ग्राही) का वृत्तान्त और हिमालय के गन्धर्वों की चुनौती तथा उनका हनुमान् द्वारा वध, औषधपर्वत ले जाते समय राक्षसों का आक्रमण और पराजय भी उदीच्य पाठ में हैं। गौड़ीय पाठ में भरत और हनुमान् का विवाद भी वर्णित है। हमने पहले लिखा है कि सभी पाठ प्रामाणिक हैं। अतः उक्त कथाएँ बाद में विकसित हुई हैं, बुल्के की यह कल्पना निराधार ही है। अतएव तुलसीदास- जी ने अपने रामचरितमानस में कालनेमि आदि का वृत्तान्त दिया है। रावण की प्रेरणा से रामकाज में विघ्न डालने के लिए कालनेमि तपस्वी बनकर मायामय आश्रम में हनुमान् से भूत-भविष्य की बातें करता है। हनुमान्जी उससे दीक्षा लेने के लिए सरोवर में स्नान करने जाते हैं। वहाँ मकरी उनको निगलना चाहती है। पर वह हनुमान् के द्वारा मारी जाकर दिव्यरूप धारण करती है एवं कालनेमि का रहस्य बतलाती है। पश्चात् हनुमान् कामनेमि का भी वध करते हैं। गौड़ीय पाठ तथा पश्चिमोत्तरीय पाठ के अनुसार सूर्योदय के पहले ही हनुमान् को लौटने के लिए कहा गया था। कृत्तिवास के अनुसार मध्यरात्रि में रावण की आज्ञा के अनुसार सूर्योदय हुआ था, किन्तु हनुमान् ने सूर्य को अपनी काँख में दबा लिया था। भावार्थरामायण के अनुसार राम के डर से, हनुमान् के लङ्का पहुँचने के पहले, सूर्यदेव उदित होने का साहस नहीं करते। उक्त कथाओं का तात्पर्य रावण का प्रभाव तथा उससे भी अधिक हनुमान् और राम का महत्त्ववर्णन करने में ही है। फिर भी सूर्य के उदय में विलम्ब होना अत्यन्त असंभव नहीं। अतएव शाण्डिली ब्राह्मणी अपने पातिव्रत्य के बल से सूर्योदय रोक सकी थी। गौड़ीय पाठ (६।८२।९०-१२८) के अनुसार हिमालय की ओर जाते हुए हनुमान् को देखकर भरत को कौतूहल हुआ। उन्होंने बाण मारकर हनुमान् को गिराना चाहा, पर हनुमान् अपना परिचय देकर अपनी यात्रा का उद्देश्य बताते हैं। सब कथा सुनाकर विजयी राम के शीघ्र प्रत्यावर्तन का आश्वासन देकर हनुमान् हिमालय की ओर प्रस्थान करते हैं। अन्यत्र प्रस्तुत प्रसङ्ग में स्वप्न का भी उल्लेख मिलता है। सुमित्रा ने देखा कि एक साँप उनकी बाईं भुजा खा रहा है। अपशकुन को शान्ति के लिए तुरन्त देवार्चन का आयोजन हुआ। शान्ति-मण्डप से ही भरत ने आकाश में जाते हुए हनुमान् को गिरा दिया। राम-लक्ष्मण का नाम स्मरण करते हुए हनुमान् मूच्छित हो गये। तब वसिष्ठ ने पर्वत की ओषधियों द्वारा उन्हें स्वस्थ किया। भरत की परीक्षा लेने की दृष्टि से हनुमान् ने कहा कि श्रान्त होने के कारण मेरा सूर्योदय के पहले पहुँचना कठिन है। यह सुनकर भरत ने पर्वत सहित हनुमान् को बाण पर चढ़ाकर धनुष से प्रेषित करने का उपक्रम किया। भरत का पराक्रम देखकर हनुमान् को सन्तोष हुआ। बाण से उतरकर उन्होंने भरत के बाहुबल की प्रशंसा की। पश्चात् रुद्रावतार हनुमान् पर्वत उठाकर लङ्का पहुँच गये। रङ्गनाथरामायण के अनुसार भरत ने ही अशुभ स्वप्न देखा था। उन्होंने ब्राह्मणों को बुलाकर हवन आदि शान्तिक कर्म कराया। हनुमान् ने आकाश से भरत को देखा तो उन्हें भ्रम हुआ कि राम सीता और लक्ष्मण के बिना यहाँ कैसे आये ? भरत ने हनुमान् को देखकर गिराने का निश्चय किया तो आकाशवाणी ने उन्हें रोका। आनन्दरामायण के अनुसार भरत ने बाण मारकर उनके हाथों से पर्वत गिरा दिया। हनुमान् ने भरत को देखकर उन्हें राम ही समझा। जब भरत पुनः बाण मारने को तैयार हुए तो उनका भ्रम दूर हुआ और उन्होंने भरत को अपना परिचय दिया। अन्त में भरत ने पर्वत लौटा दिया हनुमान् उसे लङ्का ले गये।