भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 652

अध्याय युद्धकाण्ड ५७५ सूरसागर, रामचरितमानस आदि के अनुसार भरत ने बाण मारकर हनुमान् को नीचे गिराया था। भावार्थरामायण के अनुसार भरत ने हनुमान् को इन्द्र समझकर रामनामाङ्कित बाण चलाया था। वह हनुमान् के पैरों को पकड़कर उन्हें नीचे की ओर खींचने लगा। हनुमान् ने रामनामाङ्कित बाण देखकर समझा कि राम अयोध्या चले आये और भरत से कहा कि आप अपने मित्रों को छोड़कर यहाँ कैसे आ गये। रामचरितमानस के अनुसार भरत बाण पर बैठाकर पर्वत सहित हनुमान् को लङ्का भेजने का प्रस्ताव करते हैं, पर हनुमान् नम्रता से अस्वीकार कर शीघ्र ही पहुँच जाने का आश्वासन देते हैं। उक्त कथाओं का तात्पर्य हनुमान् और भरत दोनों की लोकोत्तर महिमा का वर्णन करने में ही है। अतः वाच्यार्थ में कुछ विरोधाभास होने पर भी तात्पर्यतः अविरोध ही है। कुम्भकर्ण वध ५८९वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि “कुम्भकर्ण (वा० रा० ६।१२ में) सीता को लौटाने के लिए रावण से अनुरोध करता है। महाभारत में इसका उल्लेख नहीं है, इसलिए वे इसे प्रक्षिप्त कहते हैं, क्योंकि रावण के आदेशानुसार जगाये जाने पर कुम्भकर्ण सीता-हरण, लङ्कावरोध आदि घटनाओं से अनभिज्ञ प्रतीत होता है (सर्ग ५१)।” बुल्के का उक्त कथन असङ्गत है। वस्तुतः ५१ वें सर्ग में नहीं दाक्षिणात्य पाठ ६० वें सर्ग में कुम्भकर्ण को जगाया गया था। अस्वाभाविक जागरण के कारण ही कुम्भकर्ण को पिछली बातों का स्मरण नहीं रहा। आज भी घोर निद्रा से जगाये जाने पर प्राणी को यह भी समझ में नहीं आता है कि मैं कौन हूँ और कहाँ हूँ? अस्वाभाविक प्रबोधन के कारण ही कुम्भकर्ण ने अकाल-बोधन से विस्मित होकर कहा कि आप लोगों ने मुझे क्यों जगाया ? “बोधनाद्विस्मितश्चापि राक्षसानिदमब्रवीत् । किमर्थमहमाहृत्य भवद्भिः प्रतिबोधितः ॥ नह्यल्पकारणे सुप्तं बोधयिष्यति मादृशम् ॥” (वा० रा० ६।६०।६६-७०) तिलककार ने लिखा है— “स्वभावतो निद्रापगमाभावेनाकालबोधनादिति भावः” अर्थात् स्वभावतः निद्रा नहीं गयी, क्योंकि अकाल में जगाया था। अतएव जब वह नेत्र-मुखप्रक्षालन कर स्नान, पान, भोजन आदि करके रावण के पास पहुँचा और रावण का परिदेवन सुना तो उसने ६३ वें सर्ग में कहा है—मन्त्रकाल में हम लोगों ने जो सर्वनाशरूप दोष देखा था वही आज उपस्थित है— “दृष्टो दोषो हि योऽस्माभिः पुरा मन्त्रविनिर्णये । हितेष्वनभियुक्तेन सोऽयमासादितस्त्वया ॥” (वा० रा० ६।६३।२) मन्दोदरी ने और विभीषण ने हित की बात कही थी, पर आपने किसी की नहीं सुनी— “यदुक्तमिह ते पूर्वं प्रियया मेऽनुजेन च। तदेव नो हितं वाक्यं यथेच्छसि तथा कुरु ॥” (वा० रा० ६।६३।२१) इन पूर्वापर प्रसङ्गों से स्पष्ट है कि केवल ६०वें सर्ग में निद्राक्रान्ति की दशा में सीता-हरण तथा लङ्का- वरोध की चर्चा न करने के कारण यह नहीं कहा जा सकता कि १२ वाँ सर्ग ही प्रक्षिप्त है। ६३ वें सर्ग में १२ वें सर्ग के मन्त्र की चर्चा करने से उसको प्रक्षेप कहनेवाले का मुखबन्द हो जाता है। बुल्के कहते हैं कि वाल्मीकिरामायण दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार कुम्भकर्ण के जगाने में विभिन्न प्रयत्नों का अतिरञ्जित वर्णन है। अन्त में सहस्र हाथियों से उसके शरीर को कुचलवा कर वह जगाया गया था। वा० रा०