रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५७६ रामायणमीमांसा अष्टादश उदीच्यपाठ के अनुसार यक्ष, राक्षस तथा गन्धर्वों को कन्याओं के आभूषणों की झनकार, सङ्गीत तथा स्पर्श से उसका जागरण हुआ । वा० रा० गौड़ीय पाठ, भावार्थरामायण आदि के अनुसार घृताची, रम्भा, मेनका, उर्वशी आदि अप्सराओं द्वारा उसे जगाया गया था । सेरीराम के अनुसार चार दासियाँ कुम्भकर्ण की नाक में प्रवेश कर बाल उखाड़ती हैं । वे कुम्भकर्ण की छींक से बाहर फेंकी जाती हैं । अन्त में पैर के बाल उखाड़े जाने पर वह जागता है । वाल्मीकिरामायण के विभिन्न पाठों का समन्वय होने में कोई बाधा नहीं है । अन्य कथाओं का तात्पर्य उसकी निद्रा की भीषणता के प्रतिपादन में ही है । रामायण के सभी पाठों के अनुसार राम ने कुम्भकर्ण का वध किया है । उदीच्य पाठ के अनुसार कुम्भ- कर्ण ने रावण से कहा था कि नारद ने विष्णु के अवतार राम का रहस्य मुझसे प्रकट किया था । रावण ने उत्तर में कहा था कि मैं विष्णु के हाथ मरकर परम गति प्राप्त करना चाहता हूँ— “निहतो गन्तुमिच्छामि तद्विष्णोः परमं पदम् ।” दाक्षिणात्य पाठ में यह प्रसङ्ग नहीं मिलता, किन्तु अध्यात्मरामायण ( ६।७ ), आनन्दरामायण ( १।११।१४ ), रङ्गनाथरामायण ( ६।७० ), भावार्थरामायण ( ६।२२ ) तथा रामचरितमानस ( ६।६३ ) आदि में पाया जाता है । वा० रा० पश्चिमोत्तरीय पाठ ( ४६।८२-९१ ) के अनुसार रणभूमि में विभीषण से मिलकर रामशरण लेने के कारण उसकी प्रशंसा कुम्भकर्ण ने की थी । वाल्मीकिरामायण के अन्य पाठों में इसका उल्लेख नहीं है, किन्तु यह प्रसङ्ग अध्यात्मरामायण ( ६।८ ), आनन्दरामायण ( १।११।१२५ ), रामचरितमानस ( ६।१४ ) तथा भावार्थरामायण ( ६।२५ ) में वर्णित है । अन्य पाठों में वैसा उल्लेख न होने पर भी पश्चिमोत्तरीय पाठ तथा अन्य ग्रन्थों से सम्मत होने के कारण उक्त वृत्तान्त को प्रामाणिक ही समझना चाहिये । रङ्गनाथरामायण के अनुसार कुम्भकर्ण का सिर लङ्का की ऊँची अट्टालिकाओं को चूर्ण करता हुआ एवं समुद्र के विविध प्राणियों को नष्ट करता हुआ समुद्र में डूब गया । भावार्थरामायण के अनुसार कुम्भकर्ण का सिर कट जाने के पश्चात् कबन्ध राक्षसों पर गिरा एवं उसने बहुतों को नष्ट कर दिया । सेरीराम के अनुसार राम ने कुम्भकर्ण का सिर रावण के शिविर में फेंक कर बहुत से राक्षसों का वध किया था । महाभारत के रामोपाख्यान ( अध्याय २७१ ), स्कन्दपुराण ( सेतुमाहात्म्य अध्याय ४४ ) आदि में लक्ष्मण के द्वारा कुम्भकर्ण का वध वर्णित है । परन्तु भावदीपकार नीलकण्ठ ने कहा है कि रामचरित में वाल्मीकि- रामायण ही मुख्य प्रमाण है, अतः अन्य ग्रन्थों को तदनुसार लगाना ही उचित है । अतः लक्ष्मण के द्वारा कुम्भकर्ण मृतप्राय हो गया था । यही लक्ष्मण द्वारा उसके वध का अभिप्राय है । परन्तु उसकी मृत्यु राम के ही बाण से स्वीकार करना उचित है, क्योंकि जय-विजयरूप रावण और कुम्भकर्ण दोनों का वध विष्णु के द्वारा ही प्रमाणसिद्ध है । ५९० अनु० में बुल्के कहते हैं कि “इन्द्रजित् के द्वितीय युद्ध में प्रथम युद्ध के नागपाश-वृत्तान्त का अनुकरणमात्र प्रतीत होता है,” परन्तु यह सङ्गत नहीं हैं; क्योंकि उन्होंने आगे स्वयं उसकी विशेषताएँ स्वीकार की हैं कि द्वितीय युद्ध के पूर्व इन्द्रजित् पावक को होम देकर ब्रह्मास्त्र प्राप्त करता है और अदृश्य होकर वानर-सेनापतियों तथा राम और लक्ष्मण को घायल करता है, फिर विजयी के रूप में लङ्का लौटता है । युद्ध में किसी अंश में तो तुल्यता होती ही है । इतनेमात्र से वह अनुकरण नहीं कहा जा सकता है । वस्तुतः इस युद्ध में इन्द्रशत्रु ने इन्द्र, वैवस्वत, विष्णु एवं रुद्र, साध्य, वैश्वानर, चन्द्र और सूर्य को अपना अप्रमेय पराक्रम दिखाया था । वह तान्त्रिक आभिचारिक विधानों का अनुकरण कर अपने प्रयोग को सिद्ध कर विजयसूचक चिह्नों से प्रेरित होकर अपने रथ, धनुष तथा ब्रह्मास्त्र को अभिमन्त्रित कर सम्पूर्ण सेनानियों तथा वानरसेना को शरजाल से व्याकुल कर देता है । राम और लक्ष्मण