रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 654, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय युद्धकाण्ड ५७७ पर भी मन्त्रयुक्त तीव्र बाणों का प्रयोग करता है। स्वयम्भू के अचिन्त्य अस्त्र के प्रभाव को देखकर राम लक्ष्मण से अव्यग्रता से उसके बाण-वृष्टिकाल को सहने के लिए कहते हैं— “बाणावपातं त्वमिहाद्य धीमन् मया सहाव्यग्रमनाः सहस्व ।’’ ( वा० रा० ६।७३।६६ ) राम यह भी कहते हैं कि हम दोनों को रणभूमि में शयान देखकर ही यह लौटेगा और अस्त्रजालों से मेघनाद ने दोनों को पीड़ित तथा मूच्छित कर दिया। दूसरी विशेषता यह है कि पूर्व युद्ध में नाग ही बाणरूप में छोड़े गये थे। अतएव उनकी निवृत्ति के लिए गरुड़ की ही आवश्यकता थी। पर ७३वें सर्ग के युद्ध में वह बात नहीं थी । ७४वें सर्ग में तो ब्रह्मास्त्र को सम्भावित करके मारुति हनुमान् उठ खड़े हुए । विभीषण और हनुमान् रात्रि में उल्का ( मशाल ) हाथ में लेकर जीवित वीरों को आश्वस्त करने में लग गये । सागरौघतुल्य बाणों से अदित भीमबल में विभीषण सहित हनुमान् वृद्ध जाम्बवान् को ढूंढते हैं। जाम्बवान् प्रजापति के पुत्र थे। अवस्था से वृद्ध तथा सैकड़ों बाणों से आहत होने के कारण पावक के समान प्रशान्त हो रहे थे। विभीषण ने उनके मिलने पर कहा—आर्य ! तीक्ष्ण बाणों से आपके प्राण तो ध्वस्त नहीं हुए। विभीषण की बात को सुनकर बड़ी कठिनाई से बोलते हुए उन्होंने कहा राक्षसेन्द्र ! मैं तुम्हें स्वर से पहचान रहा हूँ। तीक्ष्ण बाणों से अतिविद्ध होने के कारण मैं चक्षु से तुम्हें देख नहीं पा रहा हूँ। जिसके द्वारा अञ्जना और मरुत् दोनों ही सुपुत्र हुए हैं वह वानरश्रेष्ठ हनुमान् क्या जीवित है ? जाम्बवान् की बात सुनकर साश्चर्य विभीषण ने कहा—क्या कारण है कि आपने आर्यपुत्र राम, लक्ष्मण तथा सुग्रीव एवं अङ्गद के सम्बन्ध में वैसा स्नेह नहीं प्रदर्शित किया। जाम्बवान् ने कहा नैर्ऋतशार्दूल, सुनो वह कारण, जिससे मैं हनुमान् को पूछ रहा हूँ। हनुमान् के जीवित रहने पर सब सेना नष्ट होने पर भी अनष्ट ही समझिये और उसके मृत हो जाने पर हम सब जीवित रहते हुए भी मृत होंगे। यदि मारुततुल्य तथा वैश्वानरोपम हनुमान् जीवित हैं तो हम सबको जीवन की आशा बनी रहेगी। हनुमान् ने बड़ी नम्रता से वृद्ध जाम्बवान् के पास जाकर पादग्रहण कर अभिवादन किया । जाम्बवान् ने प्रसन्न होकर अपना पुनर्जन्म समझा और कहा, हरिशार्दूल ! यह तुम्हारे पराक्रम का काल है। आकाश-मार्ग से नगश्रेष्ठ हिमवान् में जाकर अत्युग्र काञ्चन पर्वत ऋषभ और कैलास के मध्य में स्थित ओषधि-पर्वत है। वहाँ स्थित मृतसञ्जीवनी, विशल्यकारिणी, सुवर्णकरणी तथा सन्धानी इन चारो औषधों को लाओ । हनुमान् भीषण नाद कर लङ्कास्थ राक्षसों की भयभीत एवं स्तब्धकर वेग से आकाश-मण्डल में धावन करते हुए शैलों, शिलाओं तथा सामान्य वानरों को आकृष्ट करते हुए हिमालय की ओर गये और ओषधि पर्वत ही उठा लाये । समस्त वानर-सेना और राम-लक्ष्मण स्वस्थ हो गये । ऐसे महत्त्वपूर्ण वर्णन को बुल्के इसी लिए प्रक्षेप कहने का साहस करते हैं, क्योंकि वे हिमालय-यात्रा को ही प्रक्षेप कह चुके हैं। ऐसे ही उसके तीसरे युद्ध की भी अपनी विशेषताएँ हैं ही।- उत्तरकाण्ड के अनुसार इन्द्रजित् ने अग्निष्टोम, राजसूय, अश्वमेध आदि यज्ञों का अनुष्ठान किया था । माहेश्वर यज्ञों से सन्तुष्ट पशुपति से कामग रथ, अक्षय तूणीर तथा अदृश्य रहने की शक्ति प्राप्त की थी। मेघनाद ने इन्द्र को भी जीतकर लङ्का के कारावास में रख दिया था । ब्रह्मादि देवताओं ने 'इन्द्रजित्' उपाधि प्रदान कर उसके अतिरिक्त भी एक वर प्रदान किया था। जिससे उसने यह माँगा कि विधिवत् होम करने पर अग्नि से एक अश्वयुक्त रथ उत्पन्न हो जब तक मैं उसपर रहूँ अमर बना रहूँ (सर्ग ३०)। अन्त में उसने यह भी कहा कि जप, होम आदि की समाप्ति के पहले यदि मैं संग्राम करूँ तभी मेरा विनाश हो । इस तरह बिना तपस्या के उसने अमरत्व प्राप्त किया था । ७३