रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५७८ रामायणमीमांसा अशक्य ५९१ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि "मायामय सीता के वध का वृत्तान्त आदिरामायण में नहीं पाया जाता था, क्योंकि महाभारत के रामोपाख्यान में इसका अभाव है।" परन्तु उनका यह कहना भी असङ्गत है, क्योंकि रामोपाख्यान में संक्षेप के कारण ही कई सामग्रियों का छूट जाना स्वाभाविक ही है। शाखाभूत किसी ग्रन्थ में किसी चरित्र के न मिलने पर भी मूल ग्रन्थों में जो चरित्र विद्यमान है उसको शाखा ग्रन्थ में न होने से प्रक्षिप्त कहना अजीब बात है। रामायण, महाभारत, पुराण और धर्मशास्त्र सभी ग्रन्थ वेदमूलक ही हैं। फिर वेद की अनेक बातें उनमें अविद्यमान हो सकती हैं और हैं भी तथापि मूल वैदिक वस्तुओं को प्रक्षेप नहीं कहा जा सकता। वाल्मीकिरामायण (सर्ग ८१ और ८२) के अनुसार इन्द्रजित् हनुमान् तथा अन्य वानरों के सामने अपने रथ पर मायासीता का सिर काटता है। हनुमान् से समाचार जानकर राम व्याकुल होते हैं, किन्तु विभीषण आश्वा- सन देते हुए कहते हैं कि यह तो राक्षसी माया है, क्योंकि दुरात्मा रावण का सीता में प्रेम है, वह सीता का वध कभी न होने देगा। “मायामयीं महाबाहो तां विद्धि जनकात्मजाम् ।” (वा० रा० ६।८४।१३) विभीषण सच्चाई जानने के लिए मधुमक्खी का रूप या अन्य सूक्ष्म रूप धारण कर के जाता है। रामकियेन आदि में सीता-वध का कुछ विलक्षण वृत्तान्त है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार विभीषण ने राम को सावधान किया कि इन्द्रजित् निकुम्भिला में अपना यज्ञ करने के पश्चात् अजेय बन जायगा, अतः यज्ञ का विध्वंस करना अत्यावश्यक है। अतएव विभीषण तथा अङ्गद, हनुमान् आदि वानरों को साथ लेकर लक्ष्मण ने इन्द्रजित् की रक्षा करनेवाली सेना पर आक्रमण कर दिया। युद्ध का कोलाहल सुनकर इन्द्रजित् अपूर्ण यज्ञ छोड़कर युद्ध करने के लिए उठ खड़ा हुआ। विभीषण को देखकर इन्द्रजित् ने उनकी निन्दा की। अनन्तर लक्ष्मण इन्द्रजित् का घोर संग्राम हुआ। लक्ष्मण ने उनके सारथि को मार डाला। इन्द्रजित् पैदल लङ्का लौट गया। पुनः वह नये रथपर चढ़कर आया। पुनः लक्ष्मण ने उसके सारथि एवं घोड़ों को मार डाला। अन्त में लक्ष्मण ने ऐन्द्र अस्त्र से इन्द्रजित् का वध किया। बाद में सुषेण ने लक्ष्मण, विभीषण आदि की चिकित्सा की। इन्द्रजित् की मृत्यु का समाचार सुनकर रावण ने सीता का वध करना चाहा, पर सुपाश्र्वं ने रोक दिया। महानाटक के अनुसार इन्द्रजित् का कटा सिर रावण के हाथों में फेंका गया था। कम्बरामायण के अनुसार इन्द्रजित् ने युद्ध करते हुए यह जान लिया था कि लक्ष्मण विष्णु के अवतार हैं। अतः उसने रावण से अनु- रोध किया कि सीता राम को दे दी जाय। रावण ने नहीं माना, तब रणभूमि में लौटकर उसने पुनः युद्ध किया। लक्ष्मण ने उसका बायां हाथ काटा और सिर काटकर राम के चरणों में धर दिया। आनन्दरामायण के अनुसार हनुमान् ने उसका सिर उठाकर राम को दिखलाया। बहुत सी कथाओं में कहा गया गया है कि बारह वर्ष नींद, नारी तथा भोजन त्याग के प्रभाव से लक्ष्मण ने मेघनाद को मारा था। सेरीराम के अनुसार उसका वध राम के द्वारा होता है। समाचार सुनकर रावण रणभूमि में आकर उसके कबन्ध को लेकर ऐसा विलाप करता है कि सभी वानर और राम भी रो पड़ते हैं। पर कुछ वानर उसको दसों मुखों से रोते देखकर हँसी नहीं रोक पाते। अन्त में वह उसके देह को लङ्का ले जाता है। जहाँ उसकी पत्नी चिता पर बैठकर सती होती है। द्विपदरामायण (६।१११-११३), भावार्थरामायण तथा आनन्दरामायण में उल्लेख है कि सुलोचना कटी हुई पति की भुजा देखकर विलाप करने लगती है। भुजा ने बाण द्वारा अपने रक्त से लिखा कि मैंने शेष के हाथ से मरकर मुक्ति पायी है। रामचरितमानस के क्षेपकों के अनुसार वह कहती है कि जो बारह वर्ष नींद, नारी और भोजन त्याग सकता हैं उससे मेरे पति का मरण हो सकता है। इस भुजा ने लिखा—