भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 656

अध्याय युद्धकाण्ड ५७९ "नींद नारि भोजन शत कोटी । तजब तासु महिमा अति छोटी ॥" (रा० मा० परिशिष्ट ७।३।२) अर्थात् बारह वर्ष ही नहीं शतकोटि वर्ष भी नींद, नारी तथा भोजन का त्याग करना लक्ष्मण के लिए कोई बड़ी बात नहीं है। सुलोचना रावण से पति के सिर की प्राप्ति के लिए कहती है । रावण कहता है—धैर्य रखो, मैं राम और लक्ष्मण के सिर के साथ ही इन्द्रजित् का सिर ला दूँगा । परन्तु मन्दोदरी उसे परामर्श देती है कि वह स्वयं राम के दरबार में जाकर सिर प्राप्त करे । उसने कहा वहाँ विभीषण तुम्हारे ससुर हैं। लक्ष्मण की महिमा भुजा ने ही लिखी है। अङ्गद मेरा पुत्र है । हनुमान् रुद्रावतार हैं। राम सदा नीतिनिष्ठ हैं फिर वहाँ जाने में क्या संकोच ? "सदा नीतिरत राम नरेशा । तहाँ जात कहु कोन कलेशा ॥" (रा० मा० परिशिष्ट ६।१२।५) सुलोचना जाती है। त्रिलोकसुन्दरी नागकन्या सुलोचना को देखकर भी अनुशासननिष्ठ वानर-सेना प्रशान्त थी। सुलोचना ने इन्द्रजित् की भुजा द्वारा लिखित लक्ष्मण की महिमा का उल्लेख करके सहगमन के लिए सिर मांगा। किन्हीं लोगों ने कहा कि मृत भुजा द्वारा उल्लेख का विश्वास तभी किया जा सकता है। जब यह सिर हँसे । इसपर सुलोचना ने सिर को अपनी गोद में लेकर बहुत सी बातें कहीं और यह भी कहा कि यदि मुझे यह मालूम होता तो मैं अपने पिता शेष को तुम्हारी सहायता के लिए बुलाती । इसपर वह सिर बहुत जोर से हँसा, जिसका आशय यह था कि शेष द्वारा हीं मेरा वध हुआ है। वाल्मीकिरामायण से अनुक्त होने पर भी आनन्दरामायण आदि की उक्तियाँ तथा अप्रतिषिद्ध अन्य उक्तियाँ भी अनुमत ही हैं । रावण-वध ५९५ अनु०, खोतानी रामायण के अनुसार राम द्वारा आहत होकर दशग्रीव राजकर देने की प्रतिज्ञा करता है। युद्ध स्थगित हो जाता है। जैन राम-कथाओं, उन्मत्तराघव तथा बिहौरराम-कथा के अनुसार लक्ष्मण द्वारा रावण का वध होता है। परन्तु इसे भी वाल्मीकिरामायण के अनुसार ही लगाना उचित है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार महोदर, महापार्श्व तथा विरूपाक्ष के वध के बाद रावण रणभूमि में स्वयं प्रवेश करता है। वह लक्ष्मण को अपनी शक्ति से आहत करता है, किन्तु राम द्वारा पराजित होकर लङ्का भाग जाता है। बाद में वह महान् रथ- पर चढ़कर युद्ध-भूमि में आता है । इन्द्र अपने रथ सहित मातलि सारथि को भेज देते हैं । द्वन्द्वयुद्ध हुआ । स्वामी को मूच्छित देखकर रावण-सारथि रथ को रणभूमि से दूर ले जाता है। चेतना प्राप्त कर रावण ने फिर युद्ध-भूमि में रथ ले जाने का अंदिश दिया । अन्तिम युद्ध में रामने रावण के पुनः पुनः सिर काटे और वे पुनः पुनः उत्पन्न होते गये । इस तरह सैकड़ों बार उसके सिर कटे और उत्पन्न हुए । मातलि के परामर्श से राम ने अगस्त्य द्वारा प्रदत्त ब्रह्मास्त्र से रावण के हृदय को विदीर्ण कर दिया। महाभारत में न मिलने के कारण बुल्के रावण की शक्ति द्वारा लक्ष्मण के आहत होने को प्रक्षिप्त या परिवर्धन मानते हैं, परन्तु यह असङ्गत है, क्योंकि वाल्मीकिरामायण की परम्परा तथा टीकाकारों की संमति से वह प्रक्षिप्त नहीं है । वाल्मीकिरामायण के अनुसार विभीषण ने रावण के रथ के घोड़ों का वध किया था, फलस्वरूप रावण ने विभीषण की ओर शक्ति का प्रहार किया। लक्ष्मण ने उसे बीच में ही छिन्न-भिन्न कर दिया। रावण ने पुनः अन्य शक्ति विभीषण पर चलायी । लक्ष्मण ने उससे भी विभीषण को बचा लिया । अन्त में रावण ने मय द्वारा निर्मित अमोघ

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