रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
अध्याय युद्धकाण्ड ५७९ "नींद नारि भोजन शत कोटी । तजब तासु महिमा अति छोटी ॥" (रा० मा० परिशिष्ट ७।३।२) अर्थात् बारह वर्ष ही नहीं शतकोटि वर्ष भी नींद, नारी तथा भोजन का त्याग करना लक्ष्मण के लिए कोई बड़ी बात नहीं है। सुलोचना रावण से पति के सिर की प्राप्ति के लिए कहती है । रावण कहता है—धैर्य रखो, मैं राम और लक्ष्मण के सिर के साथ ही इन्द्रजित् का सिर ला दूँगा । परन्तु मन्दोदरी उसे परामर्श देती है कि वह स्वयं राम के दरबार में जाकर सिर प्राप्त करे । उसने कहा वहाँ विभीषण तुम्हारे ससुर हैं। लक्ष्मण की महिमा भुजा ने ही लिखी है। अङ्गद मेरा पुत्र है । हनुमान् रुद्रावतार हैं। राम सदा नीतिनिष्ठ हैं फिर वहाँ जाने में क्या संकोच ? "सदा नीतिरत राम नरेशा । तहाँ जात कहु कोन कलेशा ॥" (रा० मा० परिशिष्ट ६।१२।५) सुलोचना जाती है। त्रिलोकसुन्दरी नागकन्या सुलोचना को देखकर भी अनुशासननिष्ठ वानर-सेना प्रशान्त थी। सुलोचना ने इन्द्रजित् की भुजा द्वारा लिखित लक्ष्मण की महिमा का उल्लेख करके सहगमन के लिए सिर मांगा। किन्हीं लोगों ने कहा कि मृत भुजा द्वारा उल्लेख का विश्वास तभी किया जा सकता है। जब यह सिर हँसे । इसपर सुलोचना ने सिर को अपनी गोद में लेकर बहुत सी बातें कहीं और यह भी कहा कि यदि मुझे यह मालूम होता तो मैं अपने पिता शेष को तुम्हारी सहायता के लिए बुलाती । इसपर वह सिर बहुत जोर से हँसा, जिसका आशय यह था कि शेष द्वारा हीं मेरा वध हुआ है। वाल्मीकिरामायण से अनुक्त होने पर भी आनन्दरामायण आदि की उक्तियाँ तथा अप्रतिषिद्ध अन्य उक्तियाँ भी अनुमत ही हैं । रावण-वध ५९५ अनु०, खोतानी रामायण के अनुसार राम द्वारा आहत होकर दशग्रीव राजकर देने की प्रतिज्ञा करता है। युद्ध स्थगित हो जाता है। जैन राम-कथाओं, उन्मत्तराघव तथा बिहौरराम-कथा के अनुसार लक्ष्मण द्वारा रावण का वध होता है। परन्तु इसे भी वाल्मीकिरामायण के अनुसार ही लगाना उचित है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार महोदर, महापार्श्व तथा विरूपाक्ष के वध के बाद रावण रणभूमि में स्वयं प्रवेश करता है। वह लक्ष्मण को अपनी शक्ति से आहत करता है, किन्तु राम द्वारा पराजित होकर लङ्का भाग जाता है। बाद में वह महान् रथ- पर चढ़कर युद्ध-भूमि में आता है । इन्द्र अपने रथ सहित मातलि सारथि को भेज देते हैं । द्वन्द्वयुद्ध हुआ । स्वामी को मूच्छित देखकर रावण-सारथि रथ को रणभूमि से दूर ले जाता है। चेतना प्राप्त कर रावण ने फिर युद्ध-भूमि में रथ ले जाने का अंदिश दिया । अन्तिम युद्ध में रामने रावण के पुनः पुनः सिर काटे और वे पुनः पुनः उत्पन्न होते गये । इस तरह सैकड़ों बार उसके सिर कटे और उत्पन्न हुए । मातलि के परामर्श से राम ने अगस्त्य द्वारा प्रदत्त ब्रह्मास्त्र से रावण के हृदय को विदीर्ण कर दिया। महाभारत में न मिलने के कारण बुल्के रावण की शक्ति द्वारा लक्ष्मण के आहत होने को प्रक्षिप्त या परिवर्धन मानते हैं, परन्तु यह असङ्गत है, क्योंकि वाल्मीकिरामायण की परम्परा तथा टीकाकारों की संमति से वह प्रक्षिप्त नहीं है । वाल्मीकिरामायण के अनुसार विभीषण ने रावण के रथ के घोड़ों का वध किया था, फलस्वरूप रावण ने विभीषण की ओर शक्ति का प्रहार किया। लक्ष्मण ने उसे बीच में ही छिन्न-भिन्न कर दिया। रावण ने पुनः अन्य शक्ति विभीषण पर चलायी । लक्ष्मण ने उससे भी विभीषण को बचा लिया । अन्त में रावण ने मय द्वारा निर्मित अमोघ
५८० रामायणमीमांसा अष्टादश शक्ति से लक्ष्मण को मारा। राम ने लक्ष्मण की छाती से शक्ति को निकाल कर तोड़ दिया। लक्ष्मण को हनुमान् आदि वानरों की रक्षा में छोड़कर राम ने पुनः रावण को रणभूमि छोड़कर भागने को बाध्य कर दिया। हनुमान् ने हिमालय से औषध लाकर लक्ष्मण को जिलाया। महानाटक के अनुसार रावण की शक्ति को हनुमान् रोक लेते हैं। कहा जाता है कि रावण के अनुरोध से नारद हरिकीर्तन द्वारा हनुमान् को प्रेमविभोर कर के रण से असावधान करते हैं। तब रावण लक्ष्मण को आहत करने में समर्थ होता है। पउमचरियं के अनुसार विशल्या द्रोणमेघ की कन्या थी, ओषधि नहीं। इसके स्नान जल से लक्ष्मण की चिकित्सा हुई थी। अन्त में हनुमान् ने उससे विवाह किया था। बुल्के ने मातलि-रथ के प्रसङ्ग को भी प्रक्षिप्त कहा है, क्योंकि रावण की पत्नियों ने रावण-वध के बाद विलाप करते हुए कहा था कि जिसे देवता भी नहीं मार सके, वह एक पदाति मनुष्य द्वारा मारा गया— “अवध्यो देवतानां यस्तथा दानवरक्षसाम् । हतः सोऽयं रणे शेते मानुषेण पादतिना ॥” (वा० रा० ११०।१५) पर बुल्के यह नहीं समझते हैं कि—'बाहुल्येन व्यपदेशा भवन्ति ।' बहुलता के अनुसार व्यवहार होता है। राम ने अधिकांश युद्ध पदाति ही किया था और अब भी राम की सेना में कोई रथ नहीं था। राम पदाति ही थे। बीच में इन्द्रप्रेषित रथ और मातलि आया भी तो उन स्त्रियों को ज्ञात न होगा। अतः आकुल-व्याकुल विलाप-प्रलाप और परिदेवन करती हुई नारियों के केवल 'पदातिना' एक संदि- ग्धार्थ पद के आधार पर मातलिसम्बन्धी अनेकों असंदिग्ध सर्गों को प्रक्षेप कहना केवल दुराग्रह ही है। ठीक इससे उल्टा यही कहा जा सकता है कि अनेक सर्गों और श्लोकों से विरुद्ध होने के कारण उस एक ही श्लोक को प्रक्षिप्त मानना युक्त है। वस्तुतः तो पूर्वोक्त प्रकार से कोई भी प्रक्षिप्त नहीं, दोनों की सङ्गति ही है। १०२ वें सर्ग तक मातलिरथ की चर्चा है। एक श्लोक के आधार पर महत्त्वपूर्ण इन सर्गों को प्रक्षेप कहना अत्यन्त असङ्गत है। इस तरह बुल्के युद्ध के समय अगस्त्य द्वारा राम को उपदिष्ट आदित्यहृदय को भी प्रक्षिप्त ही कहते हैं। यह भी प्रमाद ही है, कारण वह परम्पराप्राप्त एवं टीकाकारसम्मत है। आज तक लाखों पुरुषों के द्वारा अनुष्ठान रूप में प्रतिदिन उसका पाठ किया जाता है। सेरीराम के अनुसार रावण के रथ में १०० सिंह और १०० अश्व जुते हुए थे। लक्ष्मणचिकित्सा सम्बन्धी अनेकविध कथाएँ सेरीराम, रामकियेन आदि में विस्तार से वर्णित है। रावण के होम का आयोजन जानकर विभीषण राम को सावधान करता है कि इस यज्ञ के विध्वंस करने की आवश्यकता है, नही तो रावण शिव के प्रसाद से अजेय हो जायगा। वानर-भट हनुमान् के नेतृत्व में यज्ञस्थल पर पहुँच कर विघ्न करते हैं। परन्तु उसका ध्यान-भङ्ग करने में असमर्थ होते हैं। तब अङ्गद हनुमान् की आज्ञा से मन्दोदरी के केशों को खींचकर उसे रावण के पास ले आता है। तब रावण उत्तेजित होकर यज्ञ को अपूर्ण छोड़कर अङ्गद पर आक्रमण करता है। पउमचरियं के अनुसार रावण बहुरूपिणी सिद्धि के लिए शान्तिनाथ के मन्दिर में आराधना करता है। मन्दोदरी लङ्का के सभी नागरिकों से अहिंसा-पालन के लिए निवेदन करती है। विभीषण सुझाव देता है कि राम जाकर रावण को मन्दिर से निकाल कर कैदी बना लें। किन्तु राम यह प्रस्ताव अस्वीकार करते हैं। वानरों का एक दल ध्यानस्थ रावण को क्षुब्ध करने के उद्देश्य से लङ्का में प्रवेश करता है। अन्तःपुर की स्त्रियों का अपमान
करता है। फिर भी रावण विचलित नहीं हुआ और उसने बहुरूपिणी विद्यासिद्धि प्राप्त कर ली। गुणभद्र के अनुसार रावण विद्याएँ सिद्ध करने के लिए आदित्यपाद पर्वत पर तप करता है। राम एक विशाल सेना के साथ आक्रमण करते हैं। परिणामतः रावण साधना छोड़कर लङ्का चला जाता है। अनेक रामकथाओं में यह उल्लेख है कि रावण ने दैत्य-गुरु शुक्राचार्य के परामर्श से यज्ञ आरम्भ किया था। कृत्तिवास के अनुसार रावण ने शान्तिकर्म का आयोजन किया। चण्डीपाठ के लिए बृहस्पति को बुलाया। देवताओं ने पवन के द्वारा राम को चण्डीपाठ अशुद्ध कराने का परामर्श दिया। हनुमान् मक्खीरूप धारण कर जाकर चण्डीपाठ के दो अक्षर चाट आये। परन्तु बृहस्पति ने अभ्यास वश शुद्ध ही पाठ किया। हनुमान् ने विक्रमरूप दिखाया, वृहस्पति डर गये। हनुमान् ने ग्रन्थ छीनकर प्रथम अध्याय के तीन श्लोक मिटा दिये। अशुद्ध पाठ देखकर माहेश्वरी कैलास चली गयीं। सेरीराम के अनुसार रावण अपने यज्ञ के धूम से राम की साँस रोकना चाहता था। रामकेर्ति (सर्ग १०) के अनुसार रावण के पास विष था वह रावण की प्रार्थना पूर्ण होते ही अजेय हो जाता इत्यादि। यद्यपि यज्ञों में विघ्न करना अनुचित कार्य माना जाता है तथापि दुष्ट भावना होने से यज्ञ, तप, दान आदि सभी कर्म अधर्म हो जाते हैं। “तपो न कल्कोऽध्ययनं न कल्कः स्वभाविको वेदविधिर्न कल्कः । प्रसह्य वित्ताहरणं न कल्कः तान्येव भावोपहतानि कल्कः ॥” (म० भा० १।१।२७५) तप, अध्ययन, स्वाभाविक दारपरिग्रह, अग्निहोत्र आदि कर्म, उञ्छवृत्ति, शिलवृत्ति आदि पाप नहीं हैं परन्तु भावदोष से उक्त सभी कर्म पाप बन जाते हैं। रावण और इन्द्रजित् दूसरों की पत्नी, बहू-बेटियों का हरण एवं हजम करने की शक्ति प्राप्त करने के लिए ही यज्ञादि कर्म करते थे, अतः वह पाप ही था। “चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः” (जै० सू० १।१।२) सूत्र में अर्थ शब्द का ग्रहण इसी लिए हैं कि अनर्थ श्येनयाग आदि धर्मकोटि में न गृहीत हों। ‘पशुना यजेत’ आदि वेद-वचनों में यज्ञ के उद्देश्य से पशु का आलम्भन विहित होने से पाप नहीं है। किन्तु ‘शत्रुमारणकामः श्येनेनाभिचरन् यजेत्’ इस आभिचारिक श्येनयाग में शत्रुमारणरूप हिंसा उद्देश्य है विधेय नहीं है। क्योंकि वह रागप्राप्त हिंसा ‘न हिंस्यात् सर्वाभूतानि’ निषिद्ध ही है। किन्तु ‘पशुना यजेत’ में हिंसा उद्देश्य एवं राग- प्राप्त नहीं है, विहित है, अतः वह धर्म ही है। सर्वथापि आभिचारिक कर्म पाप ही है। अतः उसका विध्वंस करना धर्म ही है। परन्तु हनुमान् द्वारा जो मन्दोदरी का सतीत्वभङ्ग आदि का वर्णन है तथा हनुमान् का यत्र तत्र स्त्रियों से विवाह या भोग आदि का वर्णन है वह सब विकृति ही है। काश्मीरीरामायण के अनुसार रावण ने कैलास जाकर शिव की सहायता माँगी थी। शिव ने उसे मकेश्वर लिङ्ग देकर आश्वासन दिया कि इस लिङ्ग के लङ्का में स्थापित हो जाने पर राम की विजय नहीं होगी। पर इस लिङ्ग को कहीं पृथिवी पर नहीं धरना चाहिये। मार्ग में रावण को लघुशङ्का लगी। उस मकेश्वर लिङ्ग को उसने नारद के हाथ में थमा दिया जो कि वृद्ध ब्राह्मण के रूप में आ पहुँचे थे। नारद भूमि पर लिङ्ग रखकर चले गये। रावण पुनः उस लिङ्ग को उठाने में सफल नहीं हुआ। रावण के अन्य भी कई प्रयत्न रामकियेन में वर्णित हैं। उन्हें पिछले प्रसङ्ग में देखना चाहिये। पउमचरियं के अनुसार बहुरूपा विद्या सिद्ध करने के पश्चात् रावण सीता से मिलने गया। सीता ने उसके प्रस्ताव को ठुकरा दिया और सीता यह कहकर मूच्छित हो गयीं कि मैं तभी तक जीवित रहूँगी जब तक राम, लक्ष्मण तथा भामण्डल की मृत्यु का समाचार नहीं पाती।
५८२ रामायणमीमांसा अष्टादश रावण सीता का पातिव्रत्य देखकर दयार्द्र हो गया और सोचने लगा कि मैंने सीता का हरण कर पाप किया । परन्तु बिना युद्ध के लौटाने से अपयश होगा । अतः वह युद्ध में राम और लक्ष्मण को हराकर सीता को लौटा देने का संकल्प करता है । तोरवेरामायण के अनुसार युद्ध के लिए प्रस्थान करने से पहले वह अपनी सारी सम्पत्ति दरिद्रों में बाँट देता है, जेल के बन्दियों को रिहा कर देता है और आदेश निकालता है कि यदि मैं युद्ध में मारा गया तो विश्वासपात्र विभीषण को गद्दी पर बैठाया जाय, अनेक परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न भावनाएँ प्राणियों के हृदय में उठती ही हैं । उक्त कथा में उन्हीं का उल्लेख हुआ है । मर्मस्थान अध्यात्मरामायण ( ६।११।५३ ) के अनुसार रावण की नाभि में अमृतकुण्ड था । विभीषण से यह रहस्य जानकर राम ने आग्नेय बाण से उसे सुखाया था । आनन्दरामायण, रङ्गनाथरामायण आदि में भी इसका उल्लेख है । कृत्तिवास के अनुसार तपस्या के पश्चात् ब्रह्मा ने कहा था कि तुम्हारे सिर एवं भुजाएँ कटने पर फिर उत्पन्न हो जायेंगी और रावण को ब्रह्मास्त्र देकर कहा इसी ब्रह्मास्त्र से तुम्हारा मर्मस्थान भेदित होने पर ही मृत्यु होगी । रावण ने उसे मन्दोदरी के रक्षण में दे रखा था । विभीषण ने यह रहस्य राम को बताया । हनुमान् ने मन्दोदरी के पास ब्राह्मण वेष में जाकर कहा, जब तक ब्रह्मास्त्र तुम्हारे पास है रावण नहीं मर सकता है, किन्तु मुझे शङ्का है कि विभीषण कहीं यह जान न ले । तुमने उसे कहाँ छिपा रखा है । मन्दोदरी ने कहा मैं सावधान हूँ। मैंने उसे स्फटिक के खंभे में छिपा रखा है। हनुमान् ने लाठी से खंभा तोड़ दिया तथा ब्रह्मास्त्र राम के पास ले गये । सेरीराम के अनुसार सीता ने हनुमान् से कहा था कि इसके पास एक मायावी खड्ग है। मन्दोदरी उसकी पूजा करती है । हनुमान् ने जाकर मन्दोदरी से रावण की मृत्यु का समाचार सुनाया । वह शोकसन्तप्त हुई । हनुमान् ने उससे लाभ उठाया और खड्ग लेकर राम को दे दिया । विहोरराम-कथा के अनुसार रावण का जीव मञ्जूषा में बन्द था । हनुमान् और लक्ष्मण ने मञ्जूषा लेकर उसे मुक्त किया । रामकियेन के अनुसार रावण का जीव उसके गुरु के पास था। हनुमान् और अङ्गद उसे छल से प्राप्त करते हैं । ब्रह्मचक्र के अनुसार लङ्का-दहन के पश्चात् रावण ने अपना हृदय किसी ऋषि के यहाँ सुरक्षित रखा था । हनुमान् ने रावण का रूप धरकर उसे प्राप्त कर लिया । पद्मपुराण ( पातालखण्ड ११२ अध्याय ) के अनुसार अतिकाय और महाकाय गुप्तचर राम की सेना में पकड़े गये । महानाटक तथा रामचरितमानस के अनुसार रावण के हृदय में सीता और सीता के हृदय में राम और राम के हृदय में विश्व था । अतः रावण जब सिर कटते-कटते व्याकुल हो सीता को भूलता है, तब हृदय में बाण मारकर राम रावण को मारते हैं । महाभारत ( ३।२७४ ) के अनुसार रावण ने राम और लक्ष्मण का रूप धारण करनेवाले बहुत से मायामय योद्धाओं को उत्पन्न किया था । महाभारत ( ३।२७४।३१ ) के अनुसार ब्रह्मास्त्र से राम ने रावण को इस प्रकार जलाया था कि उसका भस्म भी शेष नहीं रहा। किसी कथा के अनुसार मन्दोदरी रावण की चिता पर सती हो गयी थी ।
अध्याय युद्धकाण्ड ५८३ आनन्दरामायण ( राज्यकाण्ड सर्ग २० ) के अनुसार रावण-वध के बहुत काल बाद तक अयोध्या में एक आवाज सुनायी देती थी । उसका रहस्य वसिष्ठ ने बतलाया था । रावण ने जिस शरीर से बार-बार ब्रह्म-हत्या की थी, वह शरीर आज भी जल रहा है । हनुमान् उसमें सौ भार काष्ठ रोज डालते हैं । रावण ने राम से एक वर माँगा था । जिससे लोग उसे सदा स्मरण करते रहें । राम ने कहा तुम्हारे शरीर को जलानेवाली अग्नि की आवाज सप्त द्वीपों के लोगों को सुनायी पड़ेगी । सेरीराम के अनुसार राम द्वारा पराजित तथा आहत रावण रण-भूमि में जीवित ही पड़ा था । अग्नि- परीक्षा के बाद राम अपने भाइयों के साथ मिलने जाते हैं और बात चीत भी करते हैं । यह भी प्रसिद्ध कथा है कि राम ने लक्ष्मण को नीति सीखने के लिए रावण के पास भेजा था । पहले रावण बोला ही नहीं, लक्ष्मण लौट आये । राम ने लक्ष्मण से नम्रता से पूछने के लिए कहा । जब लक्ष्मण ने नम्रता से पूछा तब उसने कहा कि मनुष्य को चाहिये कि वह जो करना चाहता है कर ले, समय न टाले । मैंने सोचा था मृत्यु को नष्ट कर दूँ पर आज-कल करता रह गया । आज मैं मृत्यु का शिकार हो रहा हूँ । मैंने सोचा था स्वर्गधाम के लिए सीढ़ी बना दूँगा जिससे लोग बिना श्रम वहाँ पहुँच जायें पर वह भी संकल्प टलता ही गया, पूरा न हो सका । कहा जाता है कि रामेश्वरलिङ्ग-स्थापना के लिए सीता की अपेक्षा थी । सीता लङ्का में थी । ऋषियों की सम्मति से राम ने रावण को रामेश्वरलिङ्ग-प्रतिष्ठा कराने को बुलाया था । रावण ने सोचा बिना सीता के अकेले राम कैसे प्रतिष्ठा कार्य सम्पन्न करेंगे ? तदर्थ वह त्रिजटा के साथ पुष्पक यान पर सीता को ले गया और राम के दक्षिणाङ्क में बैठा कर प्रतिष्ठा करायी फिर सीता को पुष्पक में बैठाया । राम ने दक्षिणा के लिए प्रार्थना की तो उसने कहा कि आप क्या दे सकते हैं । तुम्हारी अयोध्या मिट्टी की है और मेरी लङ्का सोने की है, तुम्हारे नगर में सरयू नदी है, हमारे यहाँ समुद्र है । तुम्हारे पुत्र पिता दोनों नहीं हैं; मेरे आगे पीछे अनेक पीढ़ियाँ हैं । अतः यही दक्षिणा दो कि मेरा तुम से वैर बढ़ता ही जाय । तुम्हारे स्वरूप, ऐश्वर्य तथा माधुर्य के प्रभाव से घटे नहीं । मुक्ति अध्यात्मरामायण ( ६।११।७८ ) के अनुसार रावण की ज्योति राम के रूप में मिल गयी थी । विष्णुपुराण के अनुसार सनकादि के शाप से जय और विजय को तीन जन्म तक असुर योनि में जन्म लेना पड़ता है । हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु, रावण और कुम्भकर्ण के रूप से मुक्त न होकर वे शिशुपाल और दन्तवक्त्र के रूप में कृष्ण के हाथ मरकर मुक्ति पाते हैं । अग्नि-परीक्षा का विवेचन पीछे हो चुका है। पउमचरियं के अनुसार अग्नि-परीक्षा के लिए तीन सौ हाथ गहरा अग्निकुण्ड बनाकर उसमें अग्नि प्रज्वलित की गयी । सीता ने सतीत्व की शपथ लेकर उसमें प्रवेश किया । सीता के प्रवेश करते ही अग्निकुण्ड अपने आप स्वच्छ जल से भर गया । धीरे-धीरे उमड़ कर वह सर्वत्र फैलने लगा । जनता की प्रार्थना पर सीता उसे सीमित कर देती है । सबने देखा कि बावड़ी के मध्य सहस्रदल कमल पर सीता विराज- मान हैं । राम ने सीता से क्षमा याचना कर अयोध्या चलने को कहा पर सीता सब छोड़ कर विरक्त हो गयीं । यहाँ जैनों की साम्प्रदायिकता की दृष्टि से सीता ने जैन दीक्षा ले ली । जो सर्वथा मिथ्या है । कथासरित्सागर के अनुसार सीता टिट्टिभ सरोवर के तट पर जाकर सतीत्व की शपथ लेकर जल में प्रवेश करती है । पृथ्वी देवी प्रकट होकर उसे गोद में लेकर सरोवर के उस पार पहुँचा देती हैं । कही केवल मायासीता का ही अग्नि में प्रवेश माना गया है । बुल्के इन सब कथाओं को विकास, कल्पना या परिवर्धन नाम देकर अवास्तविक कहते हैं । परन्तु यह भूल है कारण वाल्मीकिरामायण के समान ही पुराणों की परम्पराओं का भी प्रामाण्य मान्य है । अतः वाल्मीकिरामायण
५८४ रामायणमीमांसा अष्टादश में अनुक्त अविरुद्ध अंश का समन्वय और विरुद्ध अंश का कल्पभेद से समाधान करना उचित है। तुलसीदास का भी यही विचार है । अवश्य कई कथाओं में सीता का महत्त्व वर्णन की दृष्टि से विविध परीक्षाएँ वर्णित हैं । भोजपुरी ग्रामगीत के अनुसार सीता ने अग्नि को हाथ में लिया वह ठंडी हो गयी । सूर्य को हाथ में लिया वह भी लुस हो गया । सर्प को हाथ में लिया वह फन फैलाकर बैठ गया । गङ्गा को हाथ में लिया वह सूख गयी । सब का तात्पर्य सीता की परम पवित्रता के प्रतिपादन में ही है । अयोध्या-प्रत्यावर्त्तन वाल्मीकिरामायण में अयोध्या-प्रत्यावर्तन के पहले ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवताओं के द्वारा राम की स्तुति, इन्द्र का वरदान, दशरथ का आगमन, शिवजी द्वारा स्तुति आदि वर्णित है । परन्तु बुल्के उन सब को प्रक्षिप्त मानते हैं, क्योंकि उन सर्गों में राम को परब्रह्म परविष्णु रूप कहा गया है । सीता को भी साक्षात् लक्ष्मी कहा गया है । ६०४ अनु०, वाल्मीकिरामायण के अनुसार विभीषण आतिथ्य ग्रहण की प्रार्थना करते हैं पर राम उनका संमान करते हुए भरत का चिन्तन कर के अयोध्या-यात्रा की अनुमति माँगते हैं। विभीषण द्वारा उपस्थित पुष्पक द्वारा चलते हुए सीता को संबोधित करके तत्तत् स्थानों में घटित वृत्तान्तों का वर्णन करते हैं । भरद्वाज आश्रम पहुँचकर अयोध्या का वृत्तान्त जानकर हनुमान् को गुह एवं भरत के पास भेज देते हैं । जनता भरत के साथ नन्दिग्राम में सबका स्वागत करती है। किन्तु पउमचरियं आदि जैन कथाओं के अनुसार राम और लक्ष्मण लङ्का के राजमहल में ६ वर्ष बिताते हैं । वहाँ राम और लक्ष्मण की बहुत पत्नियां भी होती हैं । नारद के द्वारा वर्णित अपराजिता ( कौशल्या ) की दीन दशा सुनकर राम साकेत की यात्रा करते हैं । किन्तु यह सब वाल्मीकिरामायण का ही विकृत रूप है । रामकियेन की युद्धसम्बन्धी अन्य कथाएँ पूर्व में ही दी गयी हैं । वाल्मीकिरामायण (६।१२३।२३-३८) में सीता के अनुरोध से तारा आदि वानरियां भी पुष्पक पर बैठ- कर अयोध्या जाती हैं। अध्यात्मरामायण (६।१४।८) तथा आनन्दरामायण (१।१२।५६) में भी उक्त वृत्तान्त उल्लिखित है । वाल्मीकिरामायण तथा आनन्दरामायण (१।१२।४४) में कृतज्ञ सीता त्रिजटा और सरमा दोनों को अपने साथ अयोध्या ले जाती हैं । परन्तु बुल्के का यह कहना कि आदिरामायण पुष्पक के सम्बन्ध में मौन है । पूर्व में खण्डित कर दिया गया है । जैसे वानरों को किसी फोड़े की चिकित्सा की छूट देने से घाव भरने की अपेक्षा बढ़ेगा ही उसी तरह दुरभिसन्धिपूर्वक शुष्क निःसार तर्कों के आधार पर पाश्चात्यों को भारतीय ग्रन्थों की छानबीन करने की छूट देने पर कोई भी ग्रन्थ सुरक्षित नहीं रह सकता । वाल्मीकिरामायण के अनेकों सर्गों में पुष्पक की चर्चा होने पर भी वे आसानी से उसे अपनी धारणामात्र के आधार पर प्रक्षेप कह देते हैं । खोतानीरामायण के अनुसार समुद्र पार करते ही सेतु को नष्ट कर दिया गया था, जिससे रामसेना का कोई भी योद्धा युद्ध छोड़कर भाग न जाय । यह वाल्मीकिरामायण आदि के विरुद्ध होने से अग्राह्य ही है। रावण- वध के बाद सेतुभङ्ग की वात अनेक रामायणों से सङ्गत है । स्कन्दपुराण (सेतुमाहात्म्य अ० ३०), आनन्दरामायण (१।१२।४८), पद्मपुराण (सृष्टिखण्ड ३५।१३५) आदि में रावणवध के बहुत काल बाद राम की लङ्का यात्रा के समय सेतुभङ्ग का वर्णन है । लङ्का की सुरक्षा की दृष्टि जिज्ञासादृष्टि से बहुत से लोग लङ्का-यात्रा कर सकते थे और राक्षस उन्हें प्रतिबन्ध होने पर भी खा सकते थे, अतः विभीषण की प्रार्थना से तथा कृत्तिवास के अनुसार समुद्र की प्रार्थना से सेतुभङ्ग किया गया था ।
अध्याय युद्धकाण्ड ५८५ बुल्के कहते हैं कि यथार्थवादी वाल्मीकि के अनुसार भरद्वाज आश्रम में पहुँचकर हनुमान् को इसलिए भरत के पास भेज दिया था कि वह राम के प्रति भरत की परीक्षा ले लें, क्योंकि यह सर्वथा सम्भव था कि राज्य करते करते भरत का मन बदल गया हो— “कस्य नावत्तंयेन्मनः” (वा० रा० ६।१२५।१६), यदि वास्तव में भरत राज्य चाहते हैं तो राम उनका विरोध नहीं करना चाहेंगे। “प्रशास्तु वसुधां सर्वाम्” (वा० रा० ६।१२५।१७) पर राम की आशङ्का निर्मूल सिद्ध हुई। राम का आगमन सुनकर भरत आनन्दित हो उठे। मैंने पहले ही लिखा है कि सम्पूर्ण ही वाल्मीकिरामायण का यथार्थवादी दृष्टिकोण है। कौशल्या, दशरथ, सीता, राम, लक्ष्मण आदि सभी के जिस समय अनुकूल या प्रतिकूल जैसे भी भाव उद्भूत हुए हैं, महर्षि वाल्मीकि ने उनका वैसा ही वर्णन किया है। इसी लिए यह आदिकाव्य होता हुआ आर्ष इतिहास भी है। सीताचरित्र की शुद्धि के सम्पादन में यथार्थवादी दृष्टिकोण का अत्यन्त महत्त्व था। अवधवासियों को इस यथार्थवाद से स्थालीपुलाकन्याय से सीताचरित्र की शुद्धि पर उसी दृष्टि से विश्वास करना स्वाभाविक हो गया था। दशरथ द्वारा राज्याभिषेक के पूर्व राम को शिक्षा देते समय भरत के चित्त के सम्बन्ध में शङ्का प्रकट करना तथा ननिहाल से लौटे हुए भरत से कौशल्या का प्रथम कुछ रोषपूर्ण व्यवहार तथा अरण्य में लक्ष्मण के प्रति सीता की कटूक्तियाँ भावुकों के हृदयों को प्रतिकूल लगती हैं। परन्तु सत्य घटना होने के कारण महर्षि वाल्मीकि ने उनका स्पष्ट वर्णन कर दिया। ऐसे ही यदि रावण के प्रति सीता के मन में भी कोई आकर्षण होता या किसी प्रकार की चारित्रिक त्रुटि होती तो महर्षि ने अवश्य ही उसका निःसंकोच वर्णन किया होता। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि राम को भरत की भक्ति एवं सद्भावना में विश्वास नहीं था। अवश्य ही भरत की भक्ति में पूर्ण विश्वास रखते हुए भी राज्य एवं राजनीति की दृष्टि से वैसा व्यवहार अत्यन्त सङ्गत है। “विश्वस्ते नातिविश्वसेत्” के अनुसार विश्वस्त के प्रति देश, काल और परिस्थिति वश भावजिज्ञासा उचित ही है। किन्तु बुल्के तो यथार्थवादी दृष्टिकोण का दुरुपयोग करके रामायण में तात्पर्यविधया वर्णित राम की ब्रह्मरूपता को ही यथार्थ न मानकर काल्पनिक मानने लगते हैं। पर क्या इस यथार्थ- वादी दृष्टि से बाइबिल की चमत्कार की अनेक घटनाएँ अप्रामाणिक नहीं सिद्ध होंगी ? उदात्तराघव आदि अनेक नाटकों में राक्षसों के अनेक छलों का वर्णन है। एक राक्षस वसिष्ठ-शिष्य का रूप धारण कर भरत के पास आकर कहता है कि मैंने सुना है कि लक्ष्मण युद्ध में मारे गये हैं। दूसरा राक्षस नारद के रूप में आकर कहता है कि राम का देहान्त हो गया है। सीता अकेले ही अयोध्या आ गयी। एक राक्षसी सीता का रूप धारण करके पति एवं देवर की मृत्यु का समाचार सुनाती है। यह सुनकर भरत सरयू में शरीर त्यागने को प्रस्तुत होते हैं। किन्तु हनुमान् समय से पहुँचकर भरत को सही समाचार देकर वैसा करने से रोक देते हैं। एक राक्षस सुमन्त्र के रूप में राम को समाचार देता है कि भरत मरणासन्न हैं। जानकीपरिणय में छद्मवेशी शूर्पणखा अयोध्या में राम के देहान्त का मिथ्या समाचार फैलाती है। बुल्के कहते हैं—युद्धकाण्ड के अन्तिम सर्ग में वाल्मीकि ने अपने काव्य का निर्वहण किया। भरत ने राज्य लौटाते हुए कहा कि मैं चोरों आदि के कारण दुःसह राज्यभार सँभालने में असमर्थ हूँ— “किशोरवद् गुरुं भारं न वोढुमहमुत्सहे। वारिवेगेन महता भिन्नः सेतुरिव क्षरन्॥ दुर्बन्धनमिदं मन्ये राज्यच्छिद्रमसंवृतम् ।” (वा० रा० ६।१२८।३,४) ७४
५८६ रामायणमीमांसा अष्टादश जैसे बलवान् एकाकी वृषभ द्वारा न्यस्त गुरु भार को किशोर नहीं वहन कर सकता, जैसे महान् वारिवेग से दरार पड़ने के कारण क्षरण करता हुआ भिन्न सेतु (टूटा बाँध) दुर्बन्धन होता है (कठिनाई से बाँधा जाता है) उसी प्रकार चोर आदि के कारण असंवृत राज्यच्छिद्र का संवरण करना कठिन है। परन्तु यह भरत का अनौद्धत्यमात्र है, जो बुल्के की समझ के बाहर है। अनन्तर राम पहले ब्राह्मणों को तथा बाद में विभीषण, सुग्रीवादि वानरों को विविध सम्मान देकर निष्कण्टक राज्य करने लगे। राम ने लक्ष्मण को युवराज बनाना चाहा, किन्तु लक्ष्मण ने अस्वीकार किया, जिससे भरत युवराज बनाये गये। राम १०००० वर्ष तक राज्य करते रहे। उन्होंने अन्यान्य यज्ञों के अतिरिक्त अपने पुत्रों के साथ दस बार अश्वमेधयज्ञ सम्पन्न किया था। रामराज्य के गुणगान तथा रामायण की फलश्रुति पर वाल्मीकिकृत आदिकाव्य समाप्त हो जाता है। परन्तु इस प्रसङ्ग में भी समझ लेना चाहिये कि बालकाण्ड में तथा उत्तरकाण्ड में सोत्तर आदिकाव्य का वर्णन है। अतः आदिकाव्य की पूर्ण समाप्ति उत्तरकाण्ड की समाप्ति पर ही है। बुल्के कहते हैं कि "उत्तरकाण्ड (सर्ग ३७-४०) में रामाभिषेक के लिए आमन्त्रित राजाओं तथा सुग्रीव, विभीषण, हनुमान् आदि की बिदाई का पुनः वर्णन है।" परन्तु उसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। वाल्मीकिरामायण ही नहीं किन्तु गीतादि ग्रन्थों में भी अध्याय के अन्त में भावी अध्याय का सूत्ररूप में वर्णन किया जाता है। अगले अध्याय में उसकी विस्तृत व्याख्या की जाती है। अन्य काव्यों में भी यह पद्धति अपनायी गयी है। गीता के ११ वें अध्याय के अन्त में "मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः" की व्याख्या १२ वें अध्याय में है। आनन्दरामायण (१।१२।८४) के अनुसार राम भरत का आलिङ्गन करने के पश्चात् बहुत से रूप धारण कर एक ही समय सबों से मिले थे। तुलसीदासजी ने भी कहा है— "छन महँ मिले सबन्हि भगवाना। उमा मरम यह काहु न जाना।।" (रा० मा० ७।५।४) रामकियेन (अध्याय २६) के अनुसार समुद्र पार करने के पश्चात् राम-सेना ने लङ्का के निकट पहुँचकर मायावन देखा था। राम-सेना को आकर्षित करने तथा भूमि को नीचे खींच लेने के उद्देश्य से भानुराज ने मायावन अपने सिर पर धारण किया था। हनुमान् ने उसकी माया जानकर भूमि में प्रवेश किया तथा उसे मार डाला। हरिवंश (२।५७), विष्णुपुराण (५।३३) तथा कृत्तिवासरामायण (५।४७) के अनुसार भस्मलोचन नामक राक्षस की दृष्टि जिसपर पड़ती थी वह उसी क्षण भस्मीभूत हो जाता था। इस कारण भस्मलोचन प्रायः अपनी आँखों को चमड़े के परदे से ढके रखता था। जब रामसेना समुद्र पारकर लङ्का की ओर बढ़ रही थी तब रावण ने उसके विरुद्ध भस्मलोचन को भेज दिया। विभीषण के परामर्श से राम ने ब्रह्मास्त्र छोड़कर उसके सामने असंख्य दर्पण रख दिये जिनपर दृष्टि डालकर उसने स्वयं को देखकर अपने आपको ही जला लिया। सेरीराम के अनुसार वीलावीस, जो रावण-पुत्र था, से राम की सेना को नष्ट करने के लिए कहा गया। वह दृष्टि से विनाश कर देता था। विभीषण के परामर्श से एक विस्तृत दर्पण पूँछ में बाँधकर हनुमान् ने उसके सामने रखा, जिसमें वह अपना प्रतिबिम्ब निहार कर मर गया। रामकियेन (अध्याय ३१) के अनुसार सहस्रतेज नाम का राक्षस अपनी गदा के अग्रभाग से जिसकी ओर इशारा करता था वह नष्ट हो जाता था। हनुमान् अपने को वाली का दास कहकर उसके विश्वासपात्र बनकर उसकी गदा प्राप्त कर लेते हैं और उसी से सहस्रतेज के सहस्र सिरों को काटकर राम के पास आ जाते हैं। सांग
अध्याय युद्धकाण्ड ५८७ आदित्य के पास मायावी दर्पण था, जिसपर उस दर्पण का प्रतिबिम्बित प्रकाश पड़ता था वह तुरन्त मर जाता था । वह दर्पण ब्रह्मा के संरक्षण में था। रावण ने सांग आदित्य को राम की सेना का संहार करने के लिए नियुक्त किया । अङ्गद सांग आदित्य के राज्यपाल का रूप धारणकर ब्रह्मा से वह दर्पण प्राप्त कर लेते हैं। इस तरह वह दर्पण से वंचित होकर राम के द्वारा मारा जाता है। सद्धासुर युद्ध करते समय देवताओं के आयुध अपने पास बुला सकता था । हनुमान् ने वानरों को यह आदेश दिया कि वे बादलों में छिपकर देवताओं द्वारा भेजे गये आयुधों को बीच में ही छीन लें। तब हनुमान् ने युद्ध के लिए सद्धासुर को ललकारा। सद्धासुर ने देवताओं से आयुध मँगाये। वानरों ने बीच में ही छीन लिये, जिससे हनुमान् ने उसे मार डाला । एक अदृश्य घोड़े पर चढ़कर अदृश्य होकर विरु'चंबंग युद्ध करता था। राम ने उसके अदृश्य घोड़े को मार दिया, किन्तु वह राक्षस माया करके भाग गया। वहाँ उसकी एक वानरी से भेंट हुई, उसने उसे समुद्रफेन में छिपने का परामर्श दिया। वह वानरी एक शापित अप्सरा थी जो विरु'चंबंग की खोज में हनुमान् की सहायता करने के पश्चात् शाप से मुक्ति पानेवाली थी। उस अप्सरा की सहायता से हनुमान् ने उसका वध किया । रावणचरित के अनुसार मैरावण ने रावण से कहा- मैं राम और लक्ष्मण को पाताल-लङ्का ले जाकर दुर्गा को बलि चढ़ाऊँगा। विभीषण ने वानरों को सावधान कर दिया। हनुमान् अपने विशाल रूप से सेना की रक्षा करने लगे, पर मैरावण पहले दो गुप्तचरों को भेज कर मायाविभीषण के रूप में सेना में जाकर मायाचूर्ण के प्रभाव से वानरों को सुला देता है एवं राम और लक्ष्मण को पेटिका में बन्द कर पाताल चला जाता है। हनुमान् सूक्ष्मरूप से पद्मनाल द्वारा जाकर द्वन्द्वयुद्ध में उसे मारकर राम और लक्ष्मण को ले आते हैं। मैरावण के प्राण राजधानी से दूर सात भृङ्गों में निवास करते थे। दुर्बण्डी नाम की राक्षसी के संकेत से हनुमान् पहले उन्हें मारते हैं। बाद में मैरावण को मारकर दुर्बण्डी के पुत्र नीलमेघ को मुक्त करते हैं। आनन्दरामायण (७।१४) के अनुसार शापवश अश्वनीकुमार मैरावण और ऐरावण बने हुए थे। दोनों आकाश-मार्ग से हनुमान् की बढ़ायी हुई पूँछ की परिध को पारकर निद्रामग्न राम और लक्ष्मण को ले जाते हैं। हनुमान् अपने पुत्र मकरध्वज से रहस्य जानकर कामाक्षा देवी के मन्दिर में सूक्ष्मरूप से प्रवेश करते हैं। वह देवी की वाणी में आदेश देते हैं कि जीवित ही राम और लक्ष्मण देवी के सामने लाये जायें। इस प्रकार राम और लक्ष्मण बन्धनमुक्त होकर १०० वार दोनों को मार डालते हैं पर वे दोनों पुनः पुनः जीवित हो जाते हैं। अन्त में ऐरावण की भोगपत्नी राम उसे पत्नीरूप में स्वीकार करें इस शर्त पर बतलाती है कि मैरावण और ऐरावण के शयनागार में जो भ्रमर रहते हैं वे ही अमृत लाकर दोनों को जिला देते हैं। हनुमान् ने उसका प्रस्ताव इस शर्त पर स्वीकार किया कि यदि उसकी पलँग राम के भार से न टूट जाय तो उसे पत्नीरूप में स्वीकार करेंगे। हनुमान् एक भ्रमर को छोड़कर सब को मार डालते हैं। उस भ्रमर को आदेश देते हैं कि वह उसकी पलँग की लकड़ी को खोखला कर दे। अन्त में राम दोनों राक्षसों को मार देते हैं तथा ऐरावण की भोगपत्नी को आश्वासन देते हैं कि वह तीसरे जन्म में कन्या कुमारी बनकर उनकी पत्नी बनेगी। हनुमान् राम को तथा मकरध्वज लक्ष्मण को लङ्का पहुँचा देते हैं। कृत्तिवास (६।७९-८७) के अनुसार महीरावण अष्टावक्र द्वारा शापित शक्रधनु गन्धर्व था। निकषा के परामर्श से रावण ने उसे बुलाया था, किन्तु विभीषण ने पक्षी के रूप में दोनों की मन्त्रणा सुन ली और राम को सावधान कर दिया। हनुमान् अपनी पूँछ बढ़ाकर चारों ओर से सेना की रक्षा करते हैं। राम ने आकाश में विष्णु-चक्र रख दिया था। नल ने पाताल में माया का विस्तार किया। महीरावण ने क्रमशः दशरथ, कौशल्या और जनक के रूप में आकर हनुमान् को धोखा देने का असफल प्रयास किया। अन्त में वह विभीषण के रूप में प्रवेश पाकर माया- चूर्ण से राम और लक्ष्मण को निद्रामग्न करके दोनों को अपने भवन में ले गया।
१८८ रामायणमीमांसा अष्टादश हनुमान् पाताल पहुँच कर किसी वृद्धा से राम और लक्ष्मण का वृत्तान्त जानकर मक्षिका-रूप धारण कर महल में जाकर राम और लक्ष्मण को प्रणाम करते हैं। बाद में हनुमान् महामाया-मन्दिर में देवी को राम का समाचार सुनाते हैं। देवी राम और शिव की अभिन्नता का उल्लेख करती हुई महीरावण के वध का उपाय बताती है कि जब राम और लक्ष्मण देवी के सामने उपस्थित किये जायें तो उनको महीरावण से कहना चाहिए कि हम साष्टाङ्ग प्रणाम करना नहीं जानते, हमें करके बतलाइये । जब वह साष्टाङ्ग प्रणाम करे तब उसी समय उसे मार डालना चाहिये । देवी के इस निर्देश के अनुसार ही हनुमान् ने महीरावण का वध कर दिया । बाद में महीरावण की पत्नी भी युद्ध में आती है। हनुमान् के पादप्रहार से उसके गर्भ से चार सिरवाले अहिरावण का जन्म हुआ । उसने तुरन्त हनुमान् का मुकाबला किया तथा हनुमान् के हाथ मारा गया । सेरीराम के अनुसार रावण का पुत्र पातालमहरायन हनुमान् का रूप धारण कर वानर-सेना में प्रवेश कर जाता है और राम को मायालेप से निद्रामग्न कर अपने घर ले जाता है। हनुमान् राम की खोज में पाताल जाकर एक राजकुमारी से भेंट करते हैं। जो अपने पुत्र के स्नान के लिए जल ले जानेवाली थी । ज्योतिषियों ने कहा था कि उसका पुत्र पाताल महरायन का उत्तराधिकारी होगा, अतः महरायन ने उसे राम के साथ ही मारने का निश्चय कर दिया था । हनुमान् उसे राजा बनाने की प्रतिज्ञा करते हैं । वह हनुमान् को छिपकली के रूप में अपने जलपात्र में छिपाकर किले के भीतर ले जाती है। फाटक पर हनुमान् अपने पुत्र तूगंग से द्वन्द्वयुद्ध कर उसकी सहायता अस्वीकार करते हैं। पाताल महरायन को हराकर सोये हुए राम को लड़का ले जाते हैं। राम तभी जागते हैं जब विभीषण उनके चेहरे पर के मायालेप को धो डालते हैं । अगले दिन राम रणभूमि में ही पातालमहरायन का वध करते हैं । सेरीराम के शेलावेर पाठ के अनुसार पाताल महरायन पहले दो सेनापतियों को भेजता है । बाद में वह कीट का रूप धारण कर हनुमान् का शरीर पार कर जाता है तथा क्रमशः सुग्रीव, जाम्बवान् और विभीषण के वेश में वह सेना में घुसने का असफल प्रयास करता है। रात के पिछले पहर में वह राम को पद्मनाल के मार्ग से ले जाता है । हनुमान् की जिससे भेंट होती है वह राजकुमारी अमीर अरब ( महरायन ) की बहन है । वह रावण का मामा था जिसने भानजे को कैद कर रखा था । हनुमान् पक्षी का रूप धारण कर जलपात्र में छिप जाते हैं । अमीर अरब को मार कर भानजे को राजा बनाते हैं । रामकियेन के अनुसार मैयरब को सहमालिबन का पोता माना गया है । उसके गुरू सुमेध ने उसका जीव मक्खी के रूप में त्रिकूट पर्वत पर छिपाया था । वह मायाचूर्ण से वानरों को सुला देता है । राम को हनुमान् के मुख से निकालकर पाताल ले जाता है। हनुमान् वहाँ जाकर अपने पुत्र मच्छानु तथा बाद में बिरक्वन नामक मैयरब की बहन से भेंट करते हैं । बिरक्वन को आदेश मिला कि वह एक हण्डा जल से भर दे; उसमें उसका पुत्र उबाला जायगा । बिरक्वन हनुमान् को पद्मतन्तु के रूप में अपने दुपट्टे में छिपाकर ले जाती है । तथा मैयरब के वध की युक्ति बताती है । हनुमान् राम के साथ लौटने के पहले बिरक्वन के पुत्र वैयविक को राजा तथा मच्छानु को युवराज नियुक्त करते हैं । बुल्के इसी तरह की अनेक कथाओं का संकलन कर राम-कथा का परिवर्तन, परिवर्धन, विकास या कल्पना सिद्ध करना चाहते हैं। उनकी दृष्टि में प्रचलित वाल्मीकिरामायण भी परिवर्धित, विकसित तथा कल्पित कथाओं से पूर्ण है । उनकी तथाकथित आदिरामायण का कोई व्यावहारिक रूप उपलब्ध नहीं है । उनकी कल्पना ही उसका आधार है। इसी तरह कुछ लोगों की दृष्टि में उनकी आदिरामायण में भी बहुत अंश कल्पित कहे जा सकेंगे ।
अध्याय युद्धकाण्ड ५८९ परिणामस्वरूप सम्पूर्ण रामायण के प्रति अनास्था और अविश्वास ही उत्पन्न होगा। यह सब ईसाइयत के प्रचार की भूमिका है। यही बुल्के का उद्देश्य है। वस्तुतः अनादि अपौरुषेय मन्त्र, ब्राह्मण और उपनिषद् रूप वेद परम प्रमाण हैं। वही रामकथा का मूल है। वाल्मीकिरामायण द्वारा उसी का उपबृंहण होता है। शतकोटिप्रविस्तर रामायण, पुराण आदि राम-कथा के भिन्न-भिन्न प्रस्थान हैं। कल्पभेद से उनमें कुछ विलक्षणताएँ भी होती हैं। अन्य अर्वाचीन भारतीय एवं अभारतीय रामायणों के वही स्रोत हैं। देश और काल के व्यवधान से उनमें वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध विकृतियाँ भी आ गयी हैं। रामकियेन आदि का तो अधिकांश भाग वाल्मीकिरामायण पर ही निर्भर है। कुछ अंशों में विकृतियाँ भी हैं। राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान् आदि का आदर्श वैदिक धर्म की मर्यादाओं के अनुरूप ही है।
एकोनविंश अध्याय उत्तरकाण्ड बुल्के उत्तरकाण्ड, जो उनकी दृष्टि में प्रक्षेप है, में रावणचरित को प्रक्षेप मानते हैं । रामचरित से अलग रावण के विषय में स्वतन्त्र काव्य का कहीं निर्देश नहीं है । वैदिक साहित्य में रावण, कुबेर, विश्रवा, वैश्रवण आदि का संकेत नहीं किया गया है । पाली जातकट्ठवण्णना में बेस्सवण ( यक्षों के राजा ) का बहुत स्थलों पर उल्लेख है; रावण का कहीं भी उल्लेख नहीं है, किन्तु धनेश, कुबेर, वैश्रवण आदि का उल्लेख स्वतन्त्ररूप से बहुत स्थलों पर किया गया है । इससे यह अनुमान दृढ़ हो जाता है कि वैश्रवण अथवा कुबेर रावण-कथा से पूर्व ही प्रसिद्ध हो चुके थे । बाद में ही रावण के साथ उनका सम्बन्ध स्थापित किया गया है । पर बुल्के का उक्त कथन निस्सार एवं निराधार ही है । वैदिक साहित्य में कुबेर, वैश्रवण नाम हैं तो वैदिक साहित्य में राम, दशरथ, जनक आदि के नाम भी हैं ही । रावण का नाम भी रामतापनीय आदि उपनिषदों में है ही । अथर्ववेद में दशशीर्ष ब्राह्मण का भी स्पष्ट उल्लेख है । उपनिषद् भी वैदिक साहित्य ही हैं । रावण भी विश्रवा का पुत्र है, यह रामायण से सिद्ध ही है । रामायण वेद का ही उपबृंहण है । वेद का विवरण धर्मशास्त्र, पुराण, रामायण आदि द्वारा ही होता है । शिखा और यज्ञोपवीत का नाममात्र वेदमन्त्रों में है । परन्तु शिखा कहाँ हो, यज्ञोपवीत कैसे बने और कहाँ पहना जाय, इसका स्पष्ट निरूपण धर्मशास्त्रों से ही होता है । इसी तरह वैश्रवण, कुबेर कौन हैं ? विश्रवा कौन हैं ? उनके पिता कौन हैं ? पत्नी कौन है ? वैश्रवण के कितने भाई थे ? इन सब बातों का परिज्ञान इतिहास-पुराणों से ही होता है । तत्तद्वैदिक शाखाओं में प्रवक्ता कौन हैं ? गोत्र क्या है ? वेदाधिकारी कौन होते हैं ? इत्यादि सब बातों का पूरा परिज्ञान इतिहास- पुराण से ही संभव है । अन्यथा मिथ्या सम्बन्ध कल्पना किसने की ? किसने देखा ? इत्यादि बातों का उत्तर देना बुल्के के लिए मुश्किल हो जायगा । बुल्के यह भी कहते हैं कि रावण के नाम से बहुत सी अर्वाचीन रचनाओं का उल्लेख मिलता है— अर्कप्रकाश ( वैद्यक ), कुमारतन्त्र, इन्द्रजाल ( उड्डीश ), प्राकृतकामधेनु, प्राकृतलङ्केश्वर, ऋग्वेदभाष्य, रावणभेट आदि । बलरामदास के रामायण में माना गया है कि रावण ने वैदिक मन्त्रों का सम्पादन कर वेदों की एक नयी शाखा चलायी थी । बुल्के का यह भी कथन निस्सार है कि वे अपने मतानुसार ही इन ग्रन्थों को अर्वाचीन कहते हैं । उनके अनुसार तो वेद भी, जो लाखों वर्ष पुराने ही नहीं, किन्तु अनादि हैं, रावण की अपेक्षा अर्वाचीन ही ठहरेंगे, क्योंकि पाश्चात्य ई० पू० दो या तीन हजार वर्ष की ही वेदरचना मानते हैं । परन्तु यह मत असङ्गत है, क्योंकि वेद नित्य, अनादि और अपौरुषेय हैं । ( देखिये वेद की अपौरुषेयता ) । वेद के साथ ही वेदाङ्ग भी होते हैं । किसी को क्या आवश्यकता पड़ी है कि जो स्वयं ऋग्भाष्य लिखकर उसे रावण के नाम से प्रसिद्ध करे । वेदों की कोई नई शाखा मान्य नहीं होती है, अतः रावणनिर्मित वेदशाखा सर्वथा अप्रामाणिक है । वाल्मीकिरामायण के अनुसार रामाभिषेक के बाद तपस्वी लोग राम का अभिनन्दन करने आये थे । इसी अवसर पर अगस्त्य ने राक्षसवंश का इतिहास सुनाया था । महाभारत में रावणचरितवर्णन रामोपाख्यान के प्रारम्भ में है । पउमचरियं राक्षस तथा वानरों के वंश के इतिहास से प्रारम्भ होता है ।
अध्याय उत्तरकाण्ड ५९१ तिब्बती तथा खोतानी रामायण, हिन्देशिया के सेरीराम तथा सेरतकाण्ड, श्याम के रामकियेन में रावण- चरित का कुछ वर्णन भूमिका में ही रखा गया है । काश्मीरीरामायण में प्रस्तुत रावणचरित की सामग्री सुन्दरकाण्ड के अन्तर्गत रखी गयी है। सुन्दरकाण्ड में लङ्का में सीता की खोज करते हुए हनुमान् रावण का वर्णन नारद से सुनते हैं । बुल्के कहते हैं कि रावण के चरित के सम्बन्ध में प्रामाणिक काण्ड मौन हैं, परन्तु उनकी यह भ्रान्ति है। बाल और उत्तर दोनों ही प्रामाणिक काण्ड हैं। बुल्के के तथाकथित प्रामाणिक काण्ड में यदि रावणचरित होता भी तो उसे प्रक्षेप कहने में उन्हें क्या कठिनाई होती ? वाल्मीकिरामायण के अनुसार शूर्पणखा रावण की बहन है। कुम्भकर्ण और विभीषण दो भाइयों के अतिरिक्त तीसरे भाई खर का भी उल्लेख है जिसका सेनापति दूषण था। दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार रावण की माता कैकसी थी। अन्य पाठों के अनुसार रावण की माता का नाम निकषा है। (वाल्मीकिरामायण गो० पा० ५।७६; प० पा० ५।७५) तथा भागवत (७।१।४३) में उसे केशिन कहा गया है । बुल्के कहते हैं युद्धकाण्ड में रावण को क्षत्रिय उपाधि दी गयी है (वा० रा० ६।१०९।१९)। परन्तु यह ठीक नहीं, क्योंकि रावण जन्मतः ब्राह्मण है। युद्ध प्रधानरूप से क्षत्रिय-धर्म है। क्षत्रधर्म में प्रतिष्ठित होने के कारण ही उसे क्षत्रिय कहा गया है— "नैवं विनष्टाः शोच्यन्ते क्षत्रधर्मव्यवस्थिताः । वृद्धिमाशंसमाना ये निपतन्ति रणाजिरे ॥" क्षत्रधर्म में व्यवस्थित रणनिहत क्षत्रिय शोचनीय नहीं होता— "क्षत्रियो निहतः संख्ये न शोच्य इति निश्चयः।" (वा० रा० ७।१०९।१५-१८) वे यह भी कहते हैं कि राम-कथा के विकास के साथ-साथ रावण का महत्त्व भी बढ़ने लगा था। जिससे उत्तरकाण्ड की रचना के समय तक रावण को ब्रह्मा का वंशज माना गया है। यह भी बुल्के का प्रमाद ही है। मिथ्या कल्पना को विकास कहना भी भ्रामक है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार तो रावण ब्रह्मा के पुत्र पुलस्त्य का पौत्र एवं विश्रवा का पुत्र है। बुल्के को बतलाना चाहिये कि रावण किसका पुत्र है ? और वह भी किस प्रमाण के बल से ? पुराण भी रामायण के ही पक्ष को अङ्गीकार करते हैं। प्रजापति ने जल की सृष्टि के बाद प्राणियों की सृष्टि की। उनको जल की रक्षा करने का आदेश दिया । उनमें से कुछ ने 'रक्षामः' कहा और कुछ ने 'यक्षामः' कहा। अतः ब्रह्मा ने क्रम से उन्हें राक्षस एवं यक्ष कह दिया (वा० रा० ७।४।९-१२)। राक्षसों के हेति, तथा प्रहेति दो नेता थे। हेति के पुत्र विद्युत्केश से सुकेश उत्पन्न हुआ। सुकेश के माल्यवान्, सुमाली और माली तीन पुत्र हुए। तीनों ने तपस्या कर अमरत्व का वरदान पाया। विश्वकर्मा ने उनके लिए त्रिकूट पर लङ्का बना दी। आनन्दरामायण के अनुसार गरुड़ एक गज, ग्राह तथा गृध्र को लेकर क्षीरसागर के स्वर्णवृक्ष पर बैठे। उनके भार से वह शाखा टूट पड़ी। उसके नीचे ऋषि तप करते थे, अतः उस शाखा को भी लेकर गरुड़ ने लङ्का पहुँच कर तीनों को खा लिया। तीनों की अस्थियों का ही त्रिकूट पर्वत बन गया। वह स्वर्णशाखा पाषाण बन गयी। लङ्का-दहन के समय वह द्रवित हो गयी, अतः लङ्काभूमि स्वर्णमयी हो गयी। रंगनाथ के अनुसार वायु द्वारा हेमाद्रि का एक हेममय शिखर उड़कर वहाँ आ पड़ा था, वही त्रिकूट हो गया। वाल्मीकिरामायण (३।३५।२७-३२)
५९२ रामायणमीमांसा एकोनविंश में कहा गया है कि गरुड़ के हस्ती और कच्छप को लेकर महान् न्यग्रोध पर बैठने से उसकी सौ योजन की एक शाखा टूट पड़ी थी। ऋषियों की रक्षा के लिए गरुड़ ने उस शाखा को भी लेकर सिन्धु के अनूप में एक पाद से उनका भक्षण किया था। वे तीनों राक्षस देवताओं तथा तपस्वियों को सताते थे। विष्णु ने माली का वधकर राक्षसों को परास्त किया। वे सुमाली के नेतृत्व में लङ्का छोड़कर रसातल चले गये। कुछ दिनों के बाद सुमाली अपनी पुत्री कैकसी के साथ पृथ्वी पर भ्रमण करने लगा। सुमाली ने विश्रवा के पुत्र वैश्रवण को पुष्पक पर विराजमान देखकर अपनी पुत्री को विश्रवा के पास भेजने का निश्चय किया। पिता के आदेशानुसार कैकसी विश्रवा के पास गयी। विश्रवा अग्निहोत्र कर रहे थे। उन्होंने उसे पत्नी के रूप में स्वीकार किया और कहा तुम दारुण वेला में आयी हो, अतः तुम्हारे पुत्र क्रूरकर्मा राक्षस होंगे। कैकसी के अनुनय पर अन्तिम पुत्र के धर्मात्मा होने का वरदान दिया। कैकसी ने—दशग्रीव, कुम्भकर्ण, शूर्पणखा तथा विभीषण को जन्म दिया। दशग्रीव और कुम्भकर्ण लोक के उद्वेजक हुए। पर विभीषण धर्मात्मा, वेदों के अध्ययन में तत्पर, जितेन्द्रिय तथा नियताहार हुए (सर्ग ९)। महाभारत के रामोपाख्यान (अध्याय २९९) में पुलस्त्य वैश्रवण के पिता बन जाने के बाद स्वयं विश्रवा का रूप धारण करते हैं तथा विभिन्न पत्नियों से रावणादि को उत्पन्न करते हैं। पुष्पोत्कटा से रावण और कुम्भकर्ण को, मालिनी से विभीषण को तथा राका से खर तथा शूर्पणखा को उत्पन्न करते हैं। रामोपाख्यान रामायण का ही संक्षेप है। अतः उसके अनुसार ही रामोपाख्यान की संगति लगानी चाहिये। आत्मा ही पुत्ररूप में प्रकट होता है, अतः पुलस्त्य का विश्रवारूप धारण करना सङ्गत ही है। पुष्पोत्कटा आदि को कैकसी का ही रूपान्तर समझना उचित है। कूर्मपुराण के अनुसार विश्रवा ने देववर्णिनी से वैश्रवण को, कैकसी से रावण, कुम्भकर्ण, शूर्पणखा तथा विभीषण को उत्पन्न किया था, पुष्पोत्कटा से महोदर, प्रहस्त, महापार्श्व, खर तथा कुम्भीनसी को एवं वाका से त्रिशिरा, दूषण तथा विद्युज्जिह्व को उत्पन्न किया था। सौरपुराण (अध्याय ३०) में भी वैसी ही उत्पत्ति वर्णित है। किन्तु उसमें पुष्पोत्कटा के पुत्र खर का उल्लेख नहीं है। क्षेमेन्द्र के दशावतारचरित में रावणादि को पुष्पोत्कटा की सन्तान माना गया है। आनन्दरामायण (१।१३।२४) में विश्रवा तथा कैकसी के तीन पुत्र तथा तीन पुत्रियों का उल्लेख है—रावण, कुम्भकर्ण, क्रौञ्ची, शूर्पणखा, कुम्भीनसी तथा विभीषण। काश्मीरीरामायण आदि के अनुसार रावण, खर, शूर्पणखा, कुम्भकर्ण, विभीषण तथा वैश्रवण सब सहोदर भाई-बहन हैं। अद्भुतरामायण के अनुसार सहस्रस्कन्ध रावण भी विश्रवा तथा कैकसी का पुत्र था। वस्तुतः उपनिषदों में विभिन्न प्रकार की सृष्टि का विगान है। कहीं तेज, आप और अन्न की सृष्टि वर्णित है। कहीं आकाश, वायु, तेज, आप और पृथ्वी की उत्पत्ति वर्णित है। कहीं सीधे लोकों की सृष्टि कही गयी है। कहीं अन्य प्रकार से सृष्टि वर्णित है। यद्यपि तैत्तिरीय उपनिषद् के अनुसार सबका समन्वय करके आकाश आदि के क्रम से सृष्टि का निर्णय किया गया है तथापि विगान के कारण सृष्टि को मायामयी अतात्त्विक माना गया है। उसी तरह रावणादि की सृष्टि में विगान या विविधता के कारण इसे भी मायामयी मानना उचित है। पउमचरियं के अनुसार सुकेश के माली, सुमाली और माल्यवान् पुत्र होते हैं। सुमाली का पुत्र रत्नश्रवा अपनी पत्नी कैकसी से क्रमशः दशमुख, भानुकर्ण, चन्द्रनखा और विभीषण को उत्पन्न करते हैं। वैश्रवण को यक्षपुर के राजा विश्वसेन तथा कैकसी की बहन कौशिकी का पुत्र माना जाता है। गुणभद्र के उत्तरपुराण में रावण के पूर्वजों की वंशावली निम्नरोक्त है—सहस्रग्रीव, शतग्रीव, पञ्चाशद्ग्रीव, पुलस्त्य एवं रावण। वसुदेवहिण्डि में क्रमशः बलि, सहस्रग्रीव, पञ्चशतग्रीव, शतग्रीव, पञ्चाशद्ग्रीव और विंशतिग्रीव। विंशतिग्रीव की चार पत्नियां हैं—१—देववर्णिनी
अध्याय उत्तरकाण्ड ५९३ २—वक्रा ३—कैकेयी (कैकसी) और ४—पुष्पकूट । इनसे रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, त्रिजटा तथा शूर्पणखा का जन्म होता है । जैनियों ने मनगढन्त ही नामों की कल्पनाएँ की हैं । केदारखण्ड के अनुसार शिव के भद्र-सुभद्र नामक गण ही जय-विजय तथा वे ही रावण-कुम्भकर्ण हुए हैं । काशी केदारखण्ड के अनुसार ब्रह्मा की प्रार्थना तथा श्रीशिव की आज्ञा के अनुसार श्रीगणेश सनक, वीरभद्र सनन्दन, नन्दिकेश्वर सनातन तथा कार्तिकेय सनत्कुमार नाम से ब्रह्मा के मानस पुत्र हुए थे । वे सदा पञ्चवर्षवयस्क ही रहते थे । सभी परम तत्त्वविद् तथा शिवभक्त थे । उनकी सर्वत्र ही अव्याहत गति थी । उधर भगवान् शङ्कर के ही सुभद्र और भद्र नामक गण भी भगवान् विष्णु की प्रार्थना से और शिवजी की आज्ञा से विष्णु के पार्षद हुए थे । “सुभद्रभद्रनामानौ स्वगणौ प्राह चाह्वयन् ॥” २३-४१ यद्यपि गणों को भगवान् शिव का वियोग असह्य था तो भी शिवाज्ञा भी दुर्लङ्घ्य थी । शिवजी ने कल्प के पश्चात् सनकादि के शाप के व्याज से पुनः अपने धाम में बुला लेने का आश्वासन दिया था । सुभद्र और भद्र ने विष्णु के विरोधी बहुत से दैत्यों और दानवों को पराजित करके विष्णु के लिए विजयप्रदान किया था, इसी लिए विष्णु ने उनका नाम जय और विजय रखा था । बहुत काल के अनन्तर शिवेच्छा से ही सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार विष्णु के दर्शनार्थ विष्णु- लोक में गये । विष्णु लक्ष्मी के साथ एकान्त में थे । जय और विजय द्वारपाल थे । उन्होंने भीतर जाने से उन्हें रोक दिया । तभी उन्होंने जय और विजय को तीन जन्म तक आसुरी योनि में जन्म लेने का शाप दे दिया । पश्चात् विष्णु सहित लक्ष्मी की प्रार्थना तथा जय और विजय की प्रार्थना से उन्हें उनके उद्धार का आश्वासन दिया । सनक ही हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रह्लाद के रूप में उत्पन्न हुए थे— “कशिपोः पुत्रभावेन प्रह्लादः सनकस्त्वभूत् ।” (का० मा० २३।८ ) लक्ष्मी ने आश्वासन दिया कि दूसरे जन्म में इन्हें मोहित कर के शिवाविष्ट विष्णु के द्वारा वध कराकर मैं इनका उद्धार करूँगी । तीसरे जन्म में विष्णु ने कहा मैं स्वयं इनका उद्धार करूँगा । वही सुभद्र और भद्र हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष, रावण तथा कुम्भकर्ण एवं शिशुपाल और दन्तवक्त्र होकर अन्त में पुनः शिवभाव को प्राप्त हो गये थे । काशीकेदारखण्ड के अध्याय २३ के अनुसार नित्यसिद्ध ज्ञानी निर्विकार भाव से जन्मादि से भी मोहित नहीं होते हैं । शिवाज्ञा-पालनतत्पर ज्ञानी शिवभक्त कोटि कोटि जन्मों से भी उद्विग्न नहीं होते हैं । एक बार गौरी को स्वात्मतत्त्वोपदेश करने के लिए शिव ने शिवा को आदेश दिया कि सभी प्राणियों को हटा दिया जाय । शिवा ने प्राणिमात्र कीट, पतङ्ग आदि तक को हटा दिया । एक पारावत रुग्ण था और दूर वृक्ष के कोटर में था; वह नहीं हटाया जा सका । शिव ने बतलाया कि मुझ अखण्ड चिदात्मा में संसारप्रपञ्च का अभाव रहता हुआ भी प्रातिभासिक रूप से जगत् भासमान होता है । अखण्ड चेतन ही ‘तत्त्वमसि’ आदि महावाक्यों का सार है । नेति नेति इत्यादि उपनिषद्वाक्यों से स्वात्मैकवेद्य स्वानुभवमात्र चिद्धन वस्तु लक्षित होती है । वह अनादि, अनन्त, अखण्डैकरसच्चिदानन्दनिर्भर है । वही शिव है, शान्त है, तुरीयातीत अद्वय है । सारे जगत् का कारण मिथ्या माया ही विश्ववैचित्र्य का निदान है । आत्मा स्वतः भासमान है, स्वतः सत्य है, स्वतः स्थितः है । वही श्रुत्यनुग्रहित सहस्रों अनुमानों से भी वेद्य है । वह स्वस्वरूप है, स्वप्रतिष्ठ है तथा भावाभावविवर्जित है— ७५
५९४ रामायणमीमांसा एकोनविंश "स्वात्मन्यभाववद्भावातत्त्वब्रह्मात्मनिर्णयम् । तत्त्वमस्यादिवाक्यार्थसारं चाखण्डचेतनम् ॥ नेति नेतीत्युपनिषद्वोधशीर्षनिरञ्जनम् । स्वात्मैकवेद्यं स्वानुभवमात्रं तद्धि चिद्घनम् ॥ अनाद्यनन्ताखण्डैकसच्चिदानन्दनिर्भरम् । शिवं शान्तं तुरीयांशं तुरीयातीतमद्वयम् ॥ कारणं जगतां माया मिथ्यावेचित्र्यसद्मनाम् । स्वतो भान्तं स्वतः सत्यं स्वतः सिद्धं स्वतः स्थितम् ॥ श्रुत्यनुग्राहिताशेषानेकानुमोदितम् । स्वातन्त्र्यं स्वप्रतिष्ठानं भावाभावविवर्जितम् ॥" इस प्रकार महागुरु शिव के उपदेश से गौरी देहाद्यतीत स्वानन्यभाव से जीवतत्त्व को जानकर तदनन्य हो गयीं । भावनाबर्जित देहादिसंघात वासनाशून्य होकर गिर गया। कोटरस्थ पक्षी भी गुरु की महिमा से देहात्मवासना- शून्य होकर अखण्ड ब्रह्मात्मभाव को प्राप्त हो गया। उसका देहादिसंघात कोटर से नीचे गिर पड़ा। आश्चर्यचकित होकर शिव ने ज्ञानदृष्टि से सब कुछ जान लिया । लोकलीला विनोदाथं देवी के शरीर का स्पर्श किया। देवी ने उत्थित होकर पक्षी को देखा और शिव से पक्षी को ज्ञानप्राप्ति की बात जानकर शिव से प्रार्थना की कि इसे पुनः जीवित कर दें, क्योंकि इसने आज्ञा का उल्लङ्घन किया है, अतः इसका ब्राह्मणयोनि में एक जन्म होगा। शिव-शक्ति से पक्षी जीवित हो गया। उसने गुरुदम्पति को प्रणाम कर प्रसन्नता से हँसते हुए कहा- सद्गुरु, अब अनेक कोटि जन्म भी हों तो भी मेरी कोई हानि नहीं । द्विजत्व, क्षत्रियत्व तथा कोई भी जन्म हो या त्रिमूर्ति ब्रह्मादिजन्म भी हो मैं उनसे रागवान् नहीं होऊँगा । स्वात्मानन्द गुरु की कृपा से अब मैं स्वयंभासमान आत्मा ही हूँ। पक्षी की बात सुनकर गौरी और हर दोनों ही ने जाना कि इसका ज्ञान परिपक्व हो गया है तो भी एक जन्म होगा और गर्भ में ही इसे पुनः स्वात्मसाक्षात्कार होगा । उससे कहा- तुम्हें ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो गया है तथापि अब्राह्मण होने से वह सिद्ध नहीं होगा, क्योंकि उपनिषद्ज्ञान के लिए द्विजत्व अपेक्षित है, तस्मात् एक ब्राह्मणजन्म प्राप्त कर तुम मुक्त हो जाओगे । "लब्धमप्यात्मविज्ञानमद्विजत्वान्न सिध्यति द्विजत्वमुपनिषदामर्थज्ञानाय कारणं मतम् । तस्मादेकं विप्रजन्म प्राप्य मामाप्स्यसि ध्रुवम् ॥" सेरीराम के अनुसार ब्रह्मराजनामक इन्द्रपुर का राजा 'ब्रह्मा का वंशज था। उसके एक पुत्र का नाम चित्रवहा ( विश्रवा ) था । चित्रवहा ने दतिआ कूअच नामक राक्षस को परास्त कर उसकी पुत्री रक्षपन्दी से विवाह किया । उससे दशग्रीव रावण का जन्म हुआ। रावण दुराचारी था । निर्वासित होकर लङ्का पहुँच गया। इसके बाद ही कुम्भकर्ण, विनुसनम ( विभीषण ) तथा सूरपंदाकी (शूर्पणखा ) उत्पन्न हुई । सेरतकाण्ड में चित्रवहा इन्द्रतनी से रावण को उत्पन्न करते हैं तथा दूसरी पत्नी सुकेशी से अम्बकर्ण ( कुम्भकर्ण ), शूर्पणखा तथा विभीषण को उत्पन्न करते हैं। रामकियेन ( अ० ३) में चतुर्र्वक्त्र के पुत्र लस्तियेन ( पुलस्त्य ) की पाँच पत्नियों का उल्लेख है : १-सुनन्दा कुबेर की माता, १- चित्रमाली देवनासुर की माता, ३- सुवर्णमाला अशघाता की माता, ४-वरप्रभा मारण की माता तथा ५- रजता दशकण्ठ, कुम्भकर्ण, विभेक, दूषण, खर और सम्मक्खा ( शूर्पणखा ) की माता हुई ।
अध्याय उत्तरकाण्ड ५९५ पालकपालाम के अनुसार ब्रह्मा ही दशरथ की देवरानी के गर्भ में प्रवेश करके हाथ में धनुष तथा तलवार लिये जन्म लेकर रावण कहलाते हैं। ब्रह्मचक्र के अनुसार लङ्का के महाराज की पुत्री विवाह करना अस्वीकार करती है। किसी ऋषि के यहाँ साधना करने जाती है। किसी दिन ब्रह्मा आकर उससे कहते हैं—तुम तीन पुत्रों की माँ बनोगी। उसकी नाभि तीन बार छूकर चले जाते हैं। बाद में वह ब्रह्मचक्र (रावण), कुम्भकर्ण तथा विभीषण को जन्म देती है। तीनों ब्रह्मा की सन्तान माने जाते हैं। ब्रह्मा का वर पाकर रावण पृथ्वी का सबसे बड़ा योद्धा बनना चाहता है, कुम्भकर्ण नींद माँगता है एवं विभीषण प्रज्ञा और धार्मिकता का वर माँगता है। ब्रह्मा ने रावण को आश्वासन दिया कि तुम बुद्ध तथा वानरों को छोड़कर और सबों पर विजय पाओगे। आर्ष ग्रन्थों से दूर होने के कारण इन कथाओं में अनेक विकृतियाँ आ गयी हैं। बुल्के कहते हैं कि “वाल्मीकिरामायण तथा महाभारत में रावण और कुम्भकर्ण के पूर्वजन्म अथवा शाप के कारण उनकी राक्षस्योनि की प्राप्ति का उल्लेख नहीं मिलता।” परन्तु बुल्के को ज्ञात होना चाहिए कि वैदिक ग्रन्थों में विभिन्न ग्रन्थों के समन्वय से ही तत्त्वज्ञान होता है। भले भारत और रामायण में वैसा वर्णन न हो, परन्तु अन्य पुराणों के अनुसार यह सिद्ध ही है कि विष्णु के द्वारपाल जय और विजय शापवश हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष, रावण तथा कुम्भकर्ण एवं शिशुपाल और दन्तवक्त्र के रूप में उत्पन्न हुए थे। पुराण सर्वाधिक प्राचीन हैं। बुल्के जैसे पाश्चात्य लोग विभिन्न ग्रन्थों की विभिन्न कथाओं के समन्वय के बिना किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाते हैं। अतएव वे सब को मिथ्या कल्पना या विकास कहकर भ्रम पैदा करते हैं। सिद्धान्ततः वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, पुराण, तन्त्र तथा आगमों का समन्वय ही है। अन्य कथाओं को भी उनके अनुसार ही लगाना चाहिये। देशभेद से एक ही स्त्री या पुरुष का नामभेद सङ्गत हो जाता है। समन्वय न कर सकने के कारण ही बुल्के स्वयं भ्रान्त होकर अपने पाठकों को भी भ्रम में ही डालते हैं। वे कहते हैं कि हिरण्यकशिपु की प्राचीनतम कथाएँ जय-विजय के सम्बन्ध में मौन हैं। महाभारत (आदि पर्व ६१।५) में दितिपुत्र हिरण्यकशिपु का उल्लेख है। वह नृसिंह द्वारा नहीं मारा जाता। उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णुभक्त नहीं होता। उसके भाई हिरण्याक्ष का निर्देशमात्र भी नहीं मिलता। शान्तिपर्व (अ० ३२६।७३) में नृसिंह द्वारा हिरण्यकशिपु का वध तथा वराह द्वारा हिरण्याक्ष का वध वर्णित है। किन्तु दोनों में किसी प्रकार के सम्बन्ध का उल्लेख नहीं है। पर बुल्के को जानना चाहिये कि जिस विषय में एक ग्रन्थ मौन है, उसका ज्ञान अन्य वचनशील ग्रन्थ से जानना चाहिये। अतएव हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु का कोई सम्बन्ध उक्त नहीं है, हिरण्यकशिपु का नृसिंह द्वारा वध नहीं हुआ, उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णुभक्त नहीं हुआ इत्यादि उक्तियाँ बालभाषित ही हैं। आगे वे स्वयं हरिवंश के प्रथम पर्व (अध्याय ४१) की कथा का वर्णन करते हुए मानते हैं कि वह ११५०० वर्ष तपस्या करके देव, असुर, गन्धर्व आदि द्वारा अवध्यता का वर प्राप्त कर अत्याचार करता हैं। विष्णु ने नृसिंहरूप धारण कर उसका वध किया। २य पर्व के अनेक स्थलों पर (अर्थात् अध्याय २२, ४७ और ७१ में) नृसिंह द्वारा हिरण्यकशिपु का तथा वराह द्वारा हिरण्याक्ष का वध वर्णित है। अन्तिम पर्व (अ० ३६।३२) में हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष दोनों को दिति का पुत्र माना गया है। प्रह्लाद ने नृसिंह का दिव्य रूप देखा था और पिता को सावधान किया था (अध्याय ४३)। पुनः बुल्के कहते हैं कि हरिवंश में कहीं भी हिरण्यकशिपु तथा रावण में किसी सम्बन्ध का उल्लेख नहीं है। परन्तु बुल्के को इसी लिए समझ जाना चाहिये कि अल्पश्रुत अल्पज्ञ किसी एक ग्रन्थ के सहारे किसी एक निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकता। अल्पश्रुत से वेद डरता हैं कि यह अल्पज्ञ मुझपर प्रहार करेगा अर्थ का अनर्थ करेगा—
"बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ।" फिर वे कहते हैं कि पहले पहल विष्णुपुराण ( १। अध्याय १७-२०) में हिरण्यकशिपु एवं उसके विष्णुभक्त पुत्र प्रह्लाद के संघर्ष की कथा मिलती है और यह भी वर्णन है कि हिरण्यकशिपु ने पहले रावण पश्चात् शिशुपाल के रूप में जन्म लिया । यह उनका प्रलाप मात्र है, क्योंकि जैसे वेदों की विभिन्न शाखाएँ अनादि हैं। उनमें कोई पहली और कोई पिछली नहीं है । वैसे ही पुराण सभी अनादि हैं। उनमें कोई पहला और कोई पिछला नहीं, अतः सबका समन्वय करके यह निश्चित होता है कि हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष दोनों कश्यप एवं दिति के पुत्र थे। दोनों सगे भाई थे। प्रह्लाद हिरण्यकशिपु का पुत्र था। वह महान् विष्णुभक्त था। उसकी रक्षा के लिए विष्णु ने नृसिंहरूप धारण कर हिरण्यकशिपु को मारा। हिरण्याक्ष को वारहरूप धारण कर के विष्णु ने मारा था। वे दोनों विष्णु के द्वारपाल जय और विजय थे। सनकादि के शाप से तीन जन्म के लिए उन्हें आसुरी योनि प्राप्त हुई थी। ये सब बातें भागवतपुराण ( ३। अध्याय १५-१९) से भी सिद्ध हैं। ब्रह्मवैवर्तपुराण (कृष्णजन्मखण्ड ५६।४६-४९), पद्मपुराण (उत्तरखण्ड २६९।४) आदि में भी यही बात स्पष्ट है। किसी समय विष्णु के द्वारपाल चण्ड और प्रचण्ड ने लक्ष्मी को नारायण की सभा में जाने से रोका था । अतः क्रुद्ध होकर लक्ष्मी के शाप से वे दोनों राक्षस बने । नारायण ने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—तुम पृथ्वी को जीत कर जय और विजय नामों से प्रसिद्ध होओगे। लक्ष्मी को सीता के रूप में जन्म लेना पड़ेगा। कहीं कहीं वृन्दा ने जय और विजय को राक्षस बनने का शाप दिया था, ऐसी कथा उल्लिखित है। इसी तरह शापों के योग भी उक्त हैं। बलरामदास के अनुसार दुर्वासा नारायण से मिलना चाहते थे। नारायण लक्ष्मी के साथ एकान्त में थे। दुर्वासा ने हठ किया। द्वारपालों ने उन्हें गला पकड़ कर हटा दिया। उन्होंने १०० जन्मों तक राक्षस होने का उन्हें शाप दे दिया । नारायण ने उसे तीन जन्मों तक ही सीमित कर दिया । अन्य कथाएँ भी कल्पभेद से सङ्गत हैं। शिवपुराण के अनुसार दो शिवगण नारद के शाप से रावण, कुम्भकर्ण बने थे। वह्निपुराण में वर्णित है कि मधु और कैटभ ही हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष बने थे । रामचरितमानस के अनुसार एक बार जलन्धर रावण बना था तथा किसी कल्प में रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण क्रम से पूर्व जन्म के प्रतापभानु, अरिमर्दन और धर्म- रुचि थे । रामकियेन के अनुसार नन्दक ने रावण के रूप में जन्म लिया, जो शिव के गणों में एक था। उसने ईश्वर से वरदान प्राप्त किया था कि वह जिसकी ओर इशारा करे वह मर जाय । उसने उक्त वर के प्रभाव से बहुत देवताओं का वध किया । अन्त में नारायण अप्सरा का रूप धारण कर नन्दक को नृत्य सिखाने लगे । जिसमें नन्दक अंगुली से अपने शरीर की ओर इशारा करके मर गया था। वही दशग्रीव बना था। अप्रतिषिद्ध अन्य मत भी अनुमत होता है। अतः वाल्मीकिरामायण द्वारा अप्रतिषिद्ध उक्त मत भी किसी कल्प के अनुसार सत्य है ही। ऐसे ही अन्य जैन, बौद्ध आदि ग्रन्थों में उनके पूर्व जन्म के नामान्तर भी प्रसिद्ध हैं। किन्तु उनमें साम्प्रदायिक दुराग्रह तथा मिथ्या आडम्बरों का प्राधान्य है। तप और वर वाल्मीकिरामायण के अनुसार वैश्रवण ने तपस्या कर चतुर्थ लोकपाल का पद तथा पुष्पक विमान प्राप्त किया था । विश्रवा के आदेशानुसार वे लङ्का में रहते थे। वैश्रवण का वैभव देखकर विश्रवा की द्वितीय पत्नी कैकसी ने उस ओर रावण का ध्यान आकर्षित किया। दशग्रीव माता की प्रेरणा से तप करने गोकर्ण गया ( वा० रा० ७।९।४७ ) । वहाँ तीनों भाई १०००० वर्ष तक घोर तप करते रहे । दशग्रीव प्रति हजारवर्षों के अन्त में अपना सिर
अग्नि में अर्पित करता था । उसने नौ हजार वर्ष तक नौ सिरों का अग्नि में होम कर दिया। दसवें हजार वर्ष में दसवाँ सिर काटनेवाला ही था कि ब्रह्मा संतुष्ट होकर प्रकट हुए । उन्होंने उसे सुपर्ण, नाग, यक्ष, दैत्य, दानव, राक्षस और देवताओं द्वारा अवध्य होने का वरदान दिया एवं उसके नौ सिर लौटाकर उसे कामरूपी होने का भी वरदान दिया । विभीषण ने धार्मिक होने का वर माँगा, कुम्भकर्ण ने सरस्वती की प्रेरणा से निद्रा माँग ली। रावण ने सुमाली की प्रेरणा से प्रहस्त को भेजकर लङ्का की माँग की । पिता के परामर्श से वैश्रवण लङ्का छोड़कर कैलास चले गये । वाल्मीकिरामायण ( युद्धकाण्ड अध्याय ६१ ) के अनुसार ब्रह्मा ने कुम्भकर्ण के अत्याचार के कारण उसे शाप दिया था कि वह छः महीने सोयेगा और एक ही दिन जागेगा । उसी दिन वह पृथ्वी पर विचरता हुआ बहुत लोगों को खा जायगा । बुल्के कहते हैं कि महाभारत ( ३।२५९।२८ ) के अनुसार कुम्भकर्ण ने सरस्वती की प्रेरणा से नहीं वरन् अपनी ही तामसी दुर्बुद्धि के कारण दीर्घ नींद का वरदान माँग लिया था— “स वव्रे महतीं निद्रां तमसा ग्रस्तचेतनः ।।” ( ३।२५९।२८ ) परन्तु इसमें कोई विरोध नहीं है । सरस्वती की प्रेरणा से ही तामसी शक्ति का विकास मानना चाहिये । अतएव आनन्दरामायण ( १।१३।५५ ) में कहा गया है कि सरस्वती से मोहित होकर कुम्भकर्ण ने छः महीने की निद्रा माँगी । कृत्तिवासरामायण के अनुसार ब्रह्मा ने कहा था कि नर और वानरों के सिवा कोई भी तुम्हें न मार सकेगा । सिर कटने पर तुम न मर सकोगे । रावण की शिवभक्ति प्रसिद्ध है । स्कन्दपुराण ( माहेश्वरखण्ड अ० ८ ) तथा पद्मपुराण ( उत्तरख० अ० २६९ ) के अनुसार शिव ही रावण तथा उसके भाइयों को वर देते हैं । पउमचरियं के अनुसार तपस्या द्वारा रावण ने ५५ विद्याएँ, भानुकर्ण ने ५ विद्याएँ एवं विभीषण ने ४ विद्याएँ सिद्ध कर लीं तथा आकाशगामिनी विद्या तीनों भाइयों ने प्राप्त की थी । सेरीराम के अनुसार केवल रावण ने ही घोर तप किया था । अल्लाह ने नवी आदम का निवेदन स्वीकार कर रावण को चार ( १ स्वर्ग, २ पृथ्वी, ३ पाताल और ४ महासागर ) लोकों में राज्यस्थापन का अधिकार दिया बशर्ते कि वह न्यायपूर्वक शासन करे । रामकियेन ( अध्याय ९ ) के अनुसार रावण ने अपने गुरु के परामर्श से ऐसा यज्ञ किया था जिसके फलस्वरूप वह जीवित रहते हुए अपना जीवन शरीर से अलग करने में समर्थ हुआ था । रावण अपना जीव गुरु की रक्षा में छोड़कर अत्याचार करता हुआ भी अवध्य रहा । विवाह और सन्तति वाल्मीकिरामायण ( उत्तरकाण्ड सर्ग १२ ) के अनुसार रावण ने मृगया के समय अपनी पुत्री के साथ टहलते हुए मय को देखा । परस्पर परिचय के बाद मय ने रावण को कन्यादान के साथ एक अमोघ शक्ति भी दी । जिससे उसने लक्ष्मण को आहत किया था । आनन्दरामायण के अनुसार रावण ने गान द्वारा शिव को प्रसन्न कर अपनी माता कैकसी के लिए शिव- लिङ्ग और अपने लिए पार्वती को माँग लिया । शिव ने सावधान करके कैकसी के लिए पूजनार्थं शिवलिङ्ग देकर कहा
५९८ रामायणमीमांसा एकोनविंश कि कहीं पृथ्वी पर रख देने पर यह अटल हो जायगा । रावण लिङ्ग एवं पार्वती को लेकर चला । पार्वती ने विष्णु का स्मरण किया । विष्णु ने अपने अंग के चन्दन से सुन्दरी मन्दोदरी की सृष्टि कर उसे मय के घर धर दिया । स्वयं ब्राह्मण वेष में रावण से कहा शिव ने धोखा देकर वास्तविक पार्वती को पाताल में मय के यहाँ छिपा दिया है । यह सुनकर रावण वास्तविक पार्वती को लौटा कर पाताल जाने लगा । रास्ते में लघुशङ्का करने के लिए आत्मलिङ्ग उस विष्णुरूपी ब्राह्मण को दे दिया । देर तक लघुशङ्का होती रही । ब्राह्मण आत्मलिङ्ग को गोकर्ण में भूमि पर रख कर अन्तर्धान हो गये । रावण आत्मलिङ्ग उठाने में समर्थ नहीं हुआ तब उसने पाताल से मन्दोदरी को प्राप्त किया । रामकियेन (अध्याय ५) के अनुसार कोई मण्डूकी चार ऋषियों के पास रहती थी । कोई गाय वहीं एक पात्र में दूध दे जाती थी । ऋषि लोग स्वयं पीकर कुछ मण्डूकी को दे देते थे । किसी दिन सर्पिणी ने अपना विष डाल दिया । मण्डूकी ने सोचा ऋषि लोग मर जायेंगे ! अतः उनके प्राण बचाने के लिए वह स्वयं दूध में कूदकर मर गयी । ऋषियों को रहस्य विदित हुआ । उन्होंने उसे दिव्य सुन्दरी युवती बनाकर ईश्वर को समर्पित कर दिया । ईश्वर ने उमा को दे दिया । रावण ने ईश्वर को प्रसन्न कर उमा को प्राप्त कर लिया किन्तु उमा स्वयं तप्त लोहप्रतिमा के तुल्य हो गयीं । रावण स्पर्श करने में असमर्थ होकर उन्हें सिर पर धारण कर ले चला । नारायण माली का रूप धारण कर उल्टे ढंग से वृक्ष का रोपण कर रहे थे । रावण माली की मूर्खता पर हँसने लगा तो माली ने कहा—तुम मन्दोदरी को छोड़कर इस तप्त प्रतिमा को सिर पर ढो रहे हो, अतः तुम हमसे भी अधिक मूर्ख हो, सुनकर रावण ने ईश्वर के पास जाकर उमा को लौटाकर मण्डो को ले लिया । अतिकाय की माता धान्यमालिनी भी रावण की एक और पत्नी थी एवं अनेक और भी उसकी पत्नियाँ थी । जैन कथाओं के अनुसार सुग्रीव की बहन श्रीप्रभा भी रावण की पत्नी थी । इनके अतिरिक्त ६०० विद्याधरियाँ उसकी पत्नियाँ थीं । पुत्रों में इन्द्रजित् सर्वाधिक प्रसिद्ध था । अक्षकुमार, अतिकाय आदि तथा देवान्तक, नरान्तक अन्य भी अनेक उसके पुत्र थे । पाताल का महीरावण, गङ्गामहासूरा आदि भी उसके पुत्र थे । कुछ ग्रन्थों में सीता को रावण की पुत्री माना गया है । वाल्मीकिरामायण (सर्ग ९) के अनुसार रावण वर प्राप्त कर देव, ऋषि, गन्धर्व और यक्षों को सताता था । कुबेर ने दूत भेजकर सदुपदेश दिया, पर उसने दूत को ही मार डाला । कुबेर पर आक्रमण कर पुष्पक छीन लिया । वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड के अनुसार रावण ने मरुत्त, दुष्मन्त, सुरथ, गाधि, मय, पुरूरवा, अनरण्य आदि को जीत लिया । अन्त में नारद के परामर्श से उसने यम पर आक्रमण किया । यम ने रावण का वध करना चाहा, किन्तु ब्रह्मा का अनुरोध मानकर अन्तर्धान हो गये । रावण ने यमलोक जीत कर वरुणालय के वासुकि को परास्त किया । दैत्यों से सन्धि कर ली । विद्युज्जिह्व का वध कर वरुण की सेना को हराया । रावण की अन्य विजय-यात्राएँ रावण की अनुपस्थिति में मधु ने कुम्भीनसी का अपहरण किया । रावण ने मधु पर आक्रमण किया । किन्तु कुम्भीनसी ने रावण का स्वागत करके मधु के लिए अभयदान माँग लिया । रावण कुम्भीनसी की प्रार्थना मानकर कैलास की ओर बढ़ा । मार्ग में रम्भा के साथ बलात्कार करने के कारण नलकूबर के शाप का भागी हुआ । इन्द्रलोक में राक्षसों और देवताओं का घोर युद्ध हुआ । वहाँ सुमाली मारा गया । तब मेघनाद जयन्त को परास्त कर इन्द्र को वन्दी बनाकर लङ्का ले आया । ब्रह्मा ने इन्द्रजित् नाम देकर इन्द्र को छुड़ाया । प्रक्षिप्त सर्गों में रावण की सूर्यलोक तथा चन्द्रलोक की यात्रा भी वर्णित है । पउमचरियं के अनुसार यम, सहस्रकिरण, इन्द्र, वरुण आदि देवता न होकर राजा ही थे, पर यह सब वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध है ।