रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअग्नि में अर्पित करता था । उसने नौ हजार वर्ष तक नौ सिरों का अग्नि में होम कर दिया। दसवें हजार वर्ष में दसवाँ सिर काटनेवाला ही था कि ब्रह्मा संतुष्ट होकर प्रकट हुए । उन्होंने उसे सुपर्ण, नाग, यक्ष, दैत्य, दानव, राक्षस और देवताओं द्वारा अवध्य होने का वरदान दिया एवं उसके नौ सिर लौटाकर उसे कामरूपी होने का भी वरदान दिया । विभीषण ने धार्मिक होने का वर माँगा, कुम्भकर्ण ने सरस्वती की प्रेरणा से निद्रा माँग ली। रावण ने सुमाली की प्रेरणा से प्रहस्त को भेजकर लङ्का की माँग की । पिता के परामर्श से वैश्रवण लङ्का छोड़कर कैलास चले गये । वाल्मीकिरामायण ( युद्धकाण्ड अध्याय ६१ ) के अनुसार ब्रह्मा ने कुम्भकर्ण के अत्याचार के कारण उसे शाप दिया था कि वह छः महीने सोयेगा और एक ही दिन जागेगा । उसी दिन वह पृथ्वी पर विचरता हुआ बहुत लोगों को खा जायगा । बुल्के कहते हैं कि महाभारत ( ३।२५९।२८ ) के अनुसार कुम्भकर्ण ने सरस्वती की प्रेरणा से नहीं वरन् अपनी ही तामसी दुर्बुद्धि के कारण दीर्घ नींद का वरदान माँग लिया था— “स वव्रे महतीं निद्रां तमसा ग्रस्तचेतनः ।।” ( ३।२५९।२८ ) परन्तु इसमें कोई विरोध नहीं है । सरस्वती की प्रेरणा से ही तामसी शक्ति का विकास मानना चाहिये । अतएव आनन्दरामायण ( १।१३।५५ ) में कहा गया है कि सरस्वती से मोहित होकर कुम्भकर्ण ने छः महीने की निद्रा माँगी । कृत्तिवासरामायण के अनुसार ब्रह्मा ने कहा था कि नर और वानरों के सिवा कोई भी तुम्हें न मार सकेगा । सिर कटने पर तुम न मर सकोगे । रावण की शिवभक्ति प्रसिद्ध है । स्कन्दपुराण ( माहेश्वरखण्ड अ० ८ ) तथा पद्मपुराण ( उत्तरख० अ० २६९ ) के अनुसार शिव ही रावण तथा उसके भाइयों को वर देते हैं । पउमचरियं के अनुसार तपस्या द्वारा रावण ने ५५ विद्याएँ, भानुकर्ण ने ५ विद्याएँ एवं विभीषण ने ४ विद्याएँ सिद्ध कर लीं तथा आकाशगामिनी विद्या तीनों भाइयों ने प्राप्त की थी । सेरीराम के अनुसार केवल रावण ने ही घोर तप किया था । अल्लाह ने नवी आदम का निवेदन स्वीकार कर रावण को चार ( १ स्वर्ग, २ पृथ्वी, ३ पाताल और ४ महासागर ) लोकों में राज्यस्थापन का अधिकार दिया बशर्ते कि वह न्यायपूर्वक शासन करे । रामकियेन ( अध्याय ९ ) के अनुसार रावण ने अपने गुरु के परामर्श से ऐसा यज्ञ किया था जिसके फलस्वरूप वह जीवित रहते हुए अपना जीवन शरीर से अलग करने में समर्थ हुआ था । रावण अपना जीव गुरु की रक्षा में छोड़कर अत्याचार करता हुआ भी अवध्य रहा । विवाह और सन्तति वाल्मीकिरामायण ( उत्तरकाण्ड सर्ग १२ ) के अनुसार रावण ने मृगया के समय अपनी पुत्री के साथ टहलते हुए मय को देखा । परस्पर परिचय के बाद मय ने रावण को कन्यादान के साथ एक अमोघ शक्ति भी दी । जिससे उसने लक्ष्मण को आहत किया था । आनन्दरामायण के अनुसार रावण ने गान द्वारा शिव को प्रसन्न कर अपनी माता कैकसी के लिए शिव- लिङ्ग और अपने लिए पार्वती को माँग लिया । शिव ने सावधान करके कैकसी के लिए पूजनार्थं शिवलिङ्ग देकर कहा