भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 673, कुल 1049 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 673

"बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ।" फिर वे कहते हैं कि पहले पहल विष्णुपुराण ( १। अध्याय १७-२०) में हिरण्यकशिपु एवं उसके विष्णुभक्त पुत्र प्रह्लाद के संघर्ष की कथा मिलती है और यह भी वर्णन है कि हिरण्यकशिपु ने पहले रावण पश्चात् शिशुपाल के रूप में जन्म लिया । यह उनका प्रलाप मात्र है, क्योंकि जैसे वेदों की विभिन्न शाखाएँ अनादि हैं। उनमें कोई पहली और कोई पिछली नहीं है । वैसे ही पुराण सभी अनादि हैं। उनमें कोई पहला और कोई पिछला नहीं, अतः सबका समन्वय करके यह निश्चित होता है कि हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष दोनों कश्यप एवं दिति के पुत्र थे। दोनों सगे भाई थे। प्रह्लाद हिरण्यकशिपु का पुत्र था। वह महान् विष्णुभक्त था। उसकी रक्षा के लिए विष्णु ने नृसिंहरूप धारण कर हिरण्यकशिपु को मारा। हिरण्याक्ष को वारहरूप धारण कर के विष्णु ने मारा था। वे दोनों विष्णु के द्वारपाल जय और विजय थे। सनकादि के शाप से तीन जन्म के लिए उन्हें आसुरी योनि प्राप्त हुई थी। ये सब बातें भागवतपुराण ( ३। अध्याय १५-१९) से भी सिद्ध हैं। ब्रह्मवैवर्तपुराण (कृष्णजन्मखण्ड ५६।४६-४९), पद्मपुराण (उत्तरखण्ड २६९।४) आदि में भी यही बात स्पष्ट है। किसी समय विष्णु के द्वारपाल चण्ड और प्रचण्ड ने लक्ष्मी को नारायण की सभा में जाने से रोका था । अतः क्रुद्ध होकर लक्ष्मी के शाप से वे दोनों राक्षस बने । नारायण ने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—तुम पृथ्वी को जीत कर जय और विजय नामों से प्रसिद्ध होओगे। लक्ष्मी को सीता के रूप में जन्म लेना पड़ेगा। कहीं कहीं वृन्दा ने जय और विजय को राक्षस बनने का शाप दिया था, ऐसी कथा उल्लिखित है। इसी तरह शापों के योग भी उक्त हैं। बलरामदास के अनुसार दुर्वासा नारायण से मिलना चाहते थे। नारायण लक्ष्मी के साथ एकान्त में थे। दुर्वासा ने हठ किया। द्वारपालों ने उन्हें गला पकड़ कर हटा दिया। उन्होंने १०० जन्मों तक राक्षस होने का उन्हें शाप दे दिया । नारायण ने उसे तीन जन्मों तक ही सीमित कर दिया । अन्य कथाएँ भी कल्पभेद से सङ्गत हैं। शिवपुराण के अनुसार दो शिवगण नारद के शाप से रावण, कुम्भकर्ण बने थे। वह्निपुराण में वर्णित है कि मधु और कैटभ ही हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष बने थे । रामचरितमानस के अनुसार एक बार जलन्धर रावण बना था तथा किसी कल्प में रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण क्रम से पूर्व जन्म के प्रतापभानु, अरिमर्दन और धर्म- रुचि थे । रामकियेन के अनुसार नन्दक ने रावण के रूप में जन्म लिया, जो शिव के गणों में एक था। उसने ईश्वर से वरदान प्राप्त किया था कि वह जिसकी ओर इशारा करे वह मर जाय । उसने उक्त वर के प्रभाव से बहुत देवताओं का वध किया । अन्त में नारायण अप्सरा का रूप धारण कर नन्दक को नृत्य सिखाने लगे । जिसमें नन्दक अंगुली से अपने शरीर की ओर इशारा करके मर गया था। वही दशग्रीव बना था। अप्रतिषिद्ध अन्य मत भी अनुमत होता है। अतः वाल्मीकिरामायण द्वारा अप्रतिषिद्ध उक्त मत भी किसी कल्प के अनुसार सत्य है ही। ऐसे ही अन्य जैन, बौद्ध आदि ग्रन्थों में उनके पूर्व जन्म के नामान्तर भी प्रसिद्ध हैं। किन्तु उनमें साम्प्रदायिक दुराग्रह तथा मिथ्या आडम्बरों का प्राधान्य है। तप और वर वाल्मीकिरामायण के अनुसार वैश्रवण ने तपस्या कर चतुर्थ लोकपाल का पद तथा पुष्पक विमान प्राप्त किया था । विश्रवा के आदेशानुसार वे लङ्का में रहते थे। वैश्रवण का वैभव देखकर विश्रवा की द्वितीय पत्नी कैकसी ने उस ओर रावण का ध्यान आकर्षित किया। दशग्रीव माता की प्रेरणा से तप करने गोकर्ण गया ( वा० रा० ७।९।४७ ) । वहाँ तीनों भाई १०००० वर्ष तक घोर तप करते रहे । दशग्रीव प्रति हजारवर्षों के अन्त में अपना सिर