भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 672

अध्याय उत्तरकाण्ड ५९५ पालकपालाम के अनुसार ब्रह्मा ही दशरथ की देवरानी के गर्भ में प्रवेश करके हाथ में धनुष तथा तलवार लिये जन्म लेकर रावण कहलाते हैं। ब्रह्मचक्र के अनुसार लङ्का के महाराज की पुत्री विवाह करना अस्वीकार करती है। किसी ऋषि के यहाँ साधना करने जाती है। किसी दिन ब्रह्मा आकर उससे कहते हैं—तुम तीन पुत्रों की माँ बनोगी। उसकी नाभि तीन बार छूकर चले जाते हैं। बाद में वह ब्रह्मचक्र (रावण), कुम्भकर्ण तथा विभीषण को जन्म देती है। तीनों ब्रह्मा की सन्तान माने जाते हैं। ब्रह्मा का वर पाकर रावण पृथ्वी का सबसे बड़ा योद्धा बनना चाहता है, कुम्भकर्ण नींद माँगता है एवं विभीषण प्रज्ञा और धार्मिकता का वर माँगता है। ब्रह्मा ने रावण को आश्वासन दिया कि तुम बुद्ध तथा वानरों को छोड़कर और सबों पर विजय पाओगे। आर्ष ग्रन्थों से दूर होने के कारण इन कथाओं में अनेक विकृतियाँ आ गयी हैं। बुल्के कहते हैं कि “वाल्मीकिरामायण तथा महाभारत में रावण और कुम्भकर्ण के पूर्वजन्म अथवा शाप के कारण उनकी राक्षस्योनि की प्राप्ति का उल्लेख नहीं मिलता।” परन्तु बुल्के को ज्ञात होना चाहिए कि वैदिक ग्रन्थों में विभिन्न ग्रन्थों के समन्वय से ही तत्त्वज्ञान होता है। भले भारत और रामायण में वैसा वर्णन न हो, परन्तु अन्य पुराणों के अनुसार यह सिद्ध ही है कि विष्णु के द्वारपाल जय और विजय शापवश हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष, रावण तथा कुम्भकर्ण एवं शिशुपाल और दन्तवक्त्र के रूप में उत्पन्न हुए थे। पुराण सर्वाधिक प्राचीन हैं। बुल्के जैसे पाश्चात्य लोग विभिन्न ग्रन्थों की विभिन्न कथाओं के समन्वय के बिना किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाते हैं। अतएव वे सब को मिथ्या कल्पना या विकास कहकर भ्रम पैदा करते हैं। सिद्धान्ततः वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, पुराण, तन्त्र तथा आगमों का समन्वय ही है। अन्य कथाओं को भी उनके अनुसार ही लगाना चाहिये। देशभेद से एक ही स्त्री या पुरुष का नामभेद सङ्गत हो जाता है। समन्वय न कर सकने के कारण ही बुल्के स्वयं भ्रान्त होकर अपने पाठकों को भी भ्रम में ही डालते हैं। वे कहते हैं कि हिरण्यकशिपु की प्राचीनतम कथाएँ जय-विजय के सम्बन्ध में मौन हैं। महाभारत (आदि पर्व ६१।५) में दितिपुत्र हिरण्यकशिपु का उल्लेख है। वह नृसिंह द्वारा नहीं मारा जाता। उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णुभक्त नहीं होता। उसके भाई हिरण्याक्ष का निर्देशमात्र भी नहीं मिलता। शान्तिपर्व (अ० ३२६।७३) में नृसिंह द्वारा हिरण्यकशिपु का वध तथा वराह द्वारा हिरण्याक्ष का वध वर्णित है। किन्तु दोनों में किसी प्रकार के सम्बन्ध का उल्लेख नहीं है। पर बुल्के को जानना चाहिये कि जिस विषय में एक ग्रन्थ मौन है, उसका ज्ञान अन्य वचनशील ग्रन्थ से जानना चाहिये। अतएव हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु का कोई सम्बन्ध उक्त नहीं है, हिरण्यकशिपु का नृसिंह द्वारा वध नहीं हुआ, उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णुभक्त नहीं हुआ इत्यादि उक्तियाँ बालभाषित ही हैं। आगे वे स्वयं हरिवंश के प्रथम पर्व (अध्याय ४१) की कथा का वर्णन करते हुए मानते हैं कि वह ११५०० वर्ष तपस्या करके देव, असुर, गन्धर्व आदि द्वारा अवध्यता का वर प्राप्त कर अत्याचार करता हैं। विष्णु ने नृसिंहरूप धारण कर उसका वध किया। २य पर्व के अनेक स्थलों पर (अर्थात् अध्याय २२, ४७ और ७१ में) नृसिंह द्वारा हिरण्यकशिपु का तथा वराह द्वारा हिरण्याक्ष का वध वर्णित है। अन्तिम पर्व (अ० ३६।३२) में हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष दोनों को दिति का पुत्र माना गया है। प्रह्लाद ने नृसिंह का दिव्य रूप देखा था और पिता को सावधान किया था (अध्याय ४३)। पुनः बुल्के कहते हैं कि हरिवंश में कहीं भी हिरण्यकशिपु तथा रावण में किसी सम्बन्ध का उल्लेख नहीं है। परन्तु बुल्के को इसी लिए समझ जाना चाहिये कि अल्पश्रुत अल्पज्ञ किसी एक ग्रन्थ के सहारे किसी एक निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकता। अल्पश्रुत से वेद डरता हैं कि यह अल्पज्ञ मुझपर प्रहार करेगा अर्थ का अनर्थ करेगा—