रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 671, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ें५९४ रामायणमीमांसा एकोनविंश "स्वात्मन्यभाववद्भावातत्त्वब्रह्मात्मनिर्णयम् । तत्त्वमस्यादिवाक्यार्थसारं चाखण्डचेतनम् ॥ नेति नेतीत्युपनिषद्वोधशीर्षनिरञ्जनम् । स्वात्मैकवेद्यं स्वानुभवमात्रं तद्धि चिद्घनम् ॥ अनाद्यनन्ताखण्डैकसच्चिदानन्दनिर्भरम् । शिवं शान्तं तुरीयांशं तुरीयातीतमद्वयम् ॥ कारणं जगतां माया मिथ्यावेचित्र्यसद्मनाम् । स्वतो भान्तं स्वतः सत्यं स्वतः सिद्धं स्वतः स्थितम् ॥ श्रुत्यनुग्राहिताशेषानेकानुमोदितम् । स्वातन्त्र्यं स्वप्रतिष्ठानं भावाभावविवर्जितम् ॥" इस प्रकार महागुरु शिव के उपदेश से गौरी देहाद्यतीत स्वानन्यभाव से जीवतत्त्व को जानकर तदनन्य हो गयीं । भावनाबर्जित देहादिसंघात वासनाशून्य होकर गिर गया। कोटरस्थ पक्षी भी गुरु की महिमा से देहात्मवासना- शून्य होकर अखण्ड ब्रह्मात्मभाव को प्राप्त हो गया। उसका देहादिसंघात कोटर से नीचे गिर पड़ा। आश्चर्यचकित होकर शिव ने ज्ञानदृष्टि से सब कुछ जान लिया । लोकलीला विनोदाथं देवी के शरीर का स्पर्श किया। देवी ने उत्थित होकर पक्षी को देखा और शिव से पक्षी को ज्ञानप्राप्ति की बात जानकर शिव से प्रार्थना की कि इसे पुनः जीवित कर दें, क्योंकि इसने आज्ञा का उल्लङ्घन किया है, अतः इसका ब्राह्मणयोनि में एक जन्म होगा। शिव-शक्ति से पक्षी जीवित हो गया। उसने गुरुदम्पति को प्रणाम कर प्रसन्नता से हँसते हुए कहा- सद्गुरु, अब अनेक कोटि जन्म भी हों तो भी मेरी कोई हानि नहीं । द्विजत्व, क्षत्रियत्व तथा कोई भी जन्म हो या त्रिमूर्ति ब्रह्मादिजन्म भी हो मैं उनसे रागवान् नहीं होऊँगा । स्वात्मानन्द गुरु की कृपा से अब मैं स्वयंभासमान आत्मा ही हूँ। पक्षी की बात सुनकर गौरी और हर दोनों ही ने जाना कि इसका ज्ञान परिपक्व हो गया है तो भी एक जन्म होगा और गर्भ में ही इसे पुनः स्वात्मसाक्षात्कार होगा । उससे कहा- तुम्हें ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो गया है तथापि अब्राह्मण होने से वह सिद्ध नहीं होगा, क्योंकि उपनिषद्ज्ञान के लिए द्विजत्व अपेक्षित है, तस्मात् एक ब्राह्मणजन्म प्राप्त कर तुम मुक्त हो जाओगे । "लब्धमप्यात्मविज्ञानमद्विजत्वान्न सिध्यति द्विजत्वमुपनिषदामर्थज्ञानाय कारणं मतम् । तस्मादेकं विप्रजन्म प्राप्य मामाप्स्यसि ध्रुवम् ॥" सेरीराम के अनुसार ब्रह्मराजनामक इन्द्रपुर का राजा 'ब्रह्मा का वंशज था। उसके एक पुत्र का नाम चित्रवहा ( विश्रवा ) था । चित्रवहा ने दतिआ कूअच नामक राक्षस को परास्त कर उसकी पुत्री रक्षपन्दी से विवाह किया । उससे दशग्रीव रावण का जन्म हुआ। रावण दुराचारी था । निर्वासित होकर लङ्का पहुँच गया। इसके बाद ही कुम्भकर्ण, विनुसनम ( विभीषण ) तथा सूरपंदाकी (शूर्पणखा ) उत्पन्न हुई । सेरतकाण्ड में चित्रवहा इन्द्रतनी से रावण को उत्पन्न करते हैं तथा दूसरी पत्नी सुकेशी से अम्बकर्ण ( कुम्भकर्ण ), शूर्पणखा तथा विभीषण को उत्पन्न करते हैं। रामकियेन ( अ० ३) में चतुर्र्वक्त्र के पुत्र लस्तियेन ( पुलस्त्य ) की पाँच पत्नियों का उल्लेख है : १-सुनन्दा कुबेर की माता, १- चित्रमाली देवनासुर की माता, ३- सुवर्णमाला अशघाता की माता, ४-वरप्रभा मारण की माता तथा ५- रजता दशकण्ठ, कुम्भकर्ण, विभेक, दूषण, खर और सम्मक्खा ( शूर्पणखा ) की माता हुई ।