भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 670

अध्याय उत्तरकाण्ड ५९३ २—वक्रा ३—कैकेयी (कैकसी) और ४—पुष्पकूट । इनसे रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण, त्रिजटा तथा शूर्पणखा का जन्म होता है । जैनियों ने मनगढन्त ही नामों की कल्पनाएँ की हैं । केदारखण्ड के अनुसार शिव के भद्र-सुभद्र नामक गण ही जय-विजय तथा वे ही रावण-कुम्भकर्ण हुए हैं । काशी केदारखण्ड के अनुसार ब्रह्मा की प्रार्थना तथा श्रीशिव की आज्ञा के अनुसार श्रीगणेश सनक, वीरभद्र सनन्दन, नन्दिकेश्वर सनातन तथा कार्तिकेय सनत्कुमार नाम से ब्रह्मा के मानस पुत्र हुए थे । वे सदा पञ्चवर्षवयस्क ही रहते थे । सभी परम तत्त्वविद् तथा शिवभक्त थे । उनकी सर्वत्र ही अव्याहत गति थी । उधर भगवान् शङ्कर के ही सुभद्र और भद्र नामक गण भी भगवान् विष्णु की प्रार्थना से और शिवजी की आज्ञा से विष्णु के पार्षद हुए थे । “सुभद्रभद्रनामानौ स्वगणौ प्राह चाह्वयन् ॥” २३-४१ यद्यपि गणों को भगवान् शिव का वियोग असह्य था तो भी शिवाज्ञा भी दुर्लङ्घ्य थी । शिवजी ने कल्प के पश्चात् सनकादि के शाप के व्याज से पुनः अपने धाम में बुला लेने का आश्वासन दिया था । सुभद्र और भद्र ने विष्णु के विरोधी बहुत से दैत्यों और दानवों को पराजित करके विष्णु के लिए विजयप्रदान किया था, इसी लिए विष्णु ने उनका नाम जय और विजय रखा था । बहुत काल के अनन्तर शिवेच्छा से ही सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार विष्णु के दर्शनार्थ विष्णु- लोक में गये । विष्णु लक्ष्मी के साथ एकान्त में थे । जय और विजय द्वारपाल थे । उन्होंने भीतर जाने से उन्हें रोक दिया । तभी उन्होंने जय और विजय को तीन जन्म तक आसुरी योनि में जन्म लेने का शाप दे दिया । पश्चात् विष्णु सहित लक्ष्मी की प्रार्थना तथा जय और विजय की प्रार्थना से उन्हें उनके उद्धार का आश्वासन दिया । सनक ही हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रह्लाद के रूप में उत्पन्न हुए थे— “कशिपोः पुत्रभावेन प्रह्लादः सनकस्त्वभूत् ।” (का० मा० २३।८ ) लक्ष्मी ने आश्वासन दिया कि दूसरे जन्म में इन्हें मोहित कर के शिवाविष्ट विष्णु के द्वारा वध कराकर मैं इनका उद्धार करूँगी । तीसरे जन्म में विष्णु ने कहा मैं स्वयं इनका उद्धार करूँगा । वही सुभद्र और भद्र हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष, रावण तथा कुम्भकर्ण एवं शिशुपाल और दन्तवक्त्र होकर अन्त में पुनः शिवभाव को प्राप्त हो गये थे । काशीकेदारखण्ड के अध्याय २३ के अनुसार नित्यसिद्ध ज्ञानी निर्विकार भाव से जन्मादि से भी मोहित नहीं होते हैं । शिवाज्ञा-पालनतत्पर ज्ञानी शिवभक्त कोटि कोटि जन्मों से भी उद्विग्न नहीं होते हैं । एक बार गौरी को स्वात्मतत्त्वोपदेश करने के लिए शिव ने शिवा को आदेश दिया कि सभी प्राणियों को हटा दिया जाय । शिवा ने प्राणिमात्र कीट, पतङ्ग आदि तक को हटा दिया । एक पारावत रुग्ण था और दूर वृक्ष के कोटर में था; वह नहीं हटाया जा सका । शिव ने बतलाया कि मुझ अखण्ड चिदात्मा में संसारप्रपञ्च का अभाव रहता हुआ भी प्रातिभासिक रूप से जगत् भासमान होता है । अखण्ड चेतन ही ‘तत्त्वमसि’ आदि महावाक्यों का सार है । नेति नेति इत्यादि उपनिषद्वाक्यों से स्वात्मैकवेद्य स्वानुभवमात्र चिद्धन वस्तु लक्षित होती है । वह अनादि, अनन्त, अखण्डैकरसच्चिदानन्दनिर्भर है । वही शिव है, शान्त है, तुरीयातीत अद्वय है । सारे जगत् का कारण मिथ्या माया ही विश्ववैचित्र्य का निदान है । आत्मा स्वतः भासमान है, स्वतः सत्य है, स्वतः स्थितः है । वही श्रुत्यनुग्रहित सहस्रों अनुमानों से भी वेद्य है । वह स्वस्वरूप है, स्वप्रतिष्ठ है तथा भावाभावविवर्जित है— ७५