भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 669

५९२ रामायणमीमांसा एकोनविंश में कहा गया है कि गरुड़ के हस्ती और कच्छप को लेकर महान् न्यग्रोध पर बैठने से उसकी सौ योजन की एक शाखा टूट पड़ी थी। ऋषियों की रक्षा के लिए गरुड़ ने उस शाखा को भी लेकर सिन्धु के अनूप में एक पाद से उनका भक्षण किया था। वे तीनों राक्षस देवताओं तथा तपस्वियों को सताते थे। विष्णु ने माली का वधकर राक्षसों को परास्त किया। वे सुमाली के नेतृत्व में लङ्का छोड़कर रसातल चले गये। कुछ दिनों के बाद सुमाली अपनी पुत्री कैकसी के साथ पृथ्वी पर भ्रमण करने लगा। सुमाली ने विश्रवा के पुत्र वैश्रवण को पुष्पक पर विराजमान देखकर अपनी पुत्री को विश्रवा के पास भेजने का निश्चय किया। पिता के आदेशानुसार कैकसी विश्रवा के पास गयी। विश्रवा अग्निहोत्र कर रहे थे। उन्होंने उसे पत्नी के रूप में स्वीकार किया और कहा तुम दारुण वेला में आयी हो, अतः तुम्हारे पुत्र क्रूरकर्मा राक्षस होंगे। कैकसी के अनुनय पर अन्तिम पुत्र के धर्मात्मा होने का वरदान दिया। कैकसी ने—दशग्रीव, कुम्भकर्ण, शूर्पणखा तथा विभीषण को जन्म दिया। दशग्रीव और कुम्भकर्ण लोक के उद्वेजक हुए। पर विभीषण धर्मात्मा, वेदों के अध्ययन में तत्पर, जितेन्द्रिय तथा नियताहार हुए (सर्ग ९)। महाभारत के रामोपाख्यान (अध्याय २९९) में पुलस्त्य वैश्रवण के पिता बन जाने के बाद स्वयं विश्रवा का रूप धारण करते हैं तथा विभिन्न पत्नियों से रावणादि को उत्पन्न करते हैं। पुष्पोत्कटा से रावण और कुम्भकर्ण को, मालिनी से विभीषण को तथा राका से खर तथा शूर्पणखा को उत्पन्न करते हैं। रामोपाख्यान रामायण का ही संक्षेप है। अतः उसके अनुसार ही रामोपाख्यान की संगति लगानी चाहिये। आत्मा ही पुत्ररूप में प्रकट होता है, अतः पुलस्त्य का विश्रवारूप धारण करना सङ्गत ही है। पुष्पोत्कटा आदि को कैकसी का ही रूपान्तर समझना उचित है। कूर्मपुराण के अनुसार विश्रवा ने देववर्णिनी से वैश्रवण को, कैकसी से रावण, कुम्भकर्ण, शूर्पणखा तथा विभीषण को उत्पन्न किया था, पुष्पोत्कटा से महोदर, प्रहस्त, महापार्श्व, खर तथा कुम्भीनसी को एवं वाका से त्रिशिरा, दूषण तथा विद्युज्जिह्व को उत्पन्न किया था। सौरपुराण (अध्याय ३०) में भी वैसी ही उत्पत्ति वर्णित है। किन्तु उसमें पुष्पोत्कटा के पुत्र खर का उल्लेख नहीं है। क्षेमेन्द्र के दशावतारचरित में रावणादि को पुष्पोत्कटा की सन्तान माना गया है। आनन्दरामायण (१।१३।२४) में विश्रवा तथा कैकसी के तीन पुत्र तथा तीन पुत्रियों का उल्लेख है—रावण, कुम्भकर्ण, क्रौञ्ची, शूर्पणखा, कुम्भीनसी तथा विभीषण। काश्मीरीरामायण आदि के अनुसार रावण, खर, शूर्पणखा, कुम्भकर्ण, विभीषण तथा वैश्रवण सब सहोदर भाई-बहन हैं। अद्भुतरामायण के अनुसार सहस्रस्कन्ध रावण भी विश्रवा तथा कैकसी का पुत्र था। वस्तुतः उपनिषदों में विभिन्न प्रकार की सृष्टि का विगान है। कहीं तेज, आप और अन्न की सृष्टि वर्णित है। कहीं आकाश, वायु, तेज, आप और पृथ्वी की उत्पत्ति वर्णित है। कहीं सीधे लोकों की सृष्टि कही गयी है। कहीं अन्य प्रकार से सृष्टि वर्णित है। यद्यपि तैत्तिरीय उपनिषद् के अनुसार सबका समन्वय करके आकाश आदि के क्रम से सृष्टि का निर्णय किया गया है तथापि विगान के कारण सृष्टि को मायामयी अतात्त्विक माना गया है। उसी तरह रावणादि की सृष्टि में विगान या विविधता के कारण इसे भी मायामयी मानना उचित है। पउमचरियं के अनुसार सुकेश के माली, सुमाली और माल्यवान् पुत्र होते हैं। सुमाली का पुत्र रत्नश्रवा अपनी पत्नी कैकसी से क्रमशः दशमुख, भानुकर्ण, चन्द्रनखा और विभीषण को उत्पन्न करते हैं। वैश्रवण को यक्षपुर के राजा विश्वसेन तथा कैकसी की बहन कौशिकी का पुत्र माना जाता है। गुणभद्र के उत्तरपुराण में रावण के पूर्वजों की वंशावली निम्नरोक्त है—सहस्रग्रीव, शतग्रीव, पञ्चाशद्ग्रीव, पुलस्त्य एवं रावण। वसुदेवहिण्डि में क्रमशः बलि, सहस्रग्रीव, पञ्चशतग्रीव, शतग्रीव, पञ्चाशद्ग्रीव और विंशतिग्रीव। विंशतिग्रीव की चार पत्नियां हैं—१—देववर्णिनी