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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 675

५९८ रामायणमीमांसा एकोनविंश कि कहीं पृथ्वी पर रख देने पर यह अटल हो जायगा । रावण लिङ्ग एवं पार्वती को लेकर चला । पार्वती ने विष्णु का स्मरण किया । विष्णु ने अपने अंग के चन्दन से सुन्दरी मन्दोदरी की सृष्टि कर उसे मय के घर धर दिया । स्वयं ब्राह्मण वेष में रावण से कहा शिव ने धोखा देकर वास्तविक पार्वती को पाताल में मय के यहाँ छिपा दिया है । यह सुनकर रावण वास्तविक पार्वती को लौटा कर पाताल जाने लगा । रास्ते में लघुशङ्का करने के लिए आत्मलिङ्ग उस विष्णुरूपी ब्राह्मण को दे दिया । देर तक लघुशङ्का होती रही । ब्राह्मण आत्मलिङ्ग को गोकर्ण में भूमि पर रख कर अन्तर्धान हो गये । रावण आत्मलिङ्ग उठाने में समर्थ नहीं हुआ तब उसने पाताल से मन्दोदरी को प्राप्त किया । रामकियेन (अध्याय ५) के अनुसार कोई मण्डूकी चार ऋषियों के पास रहती थी । कोई गाय वहीं एक पात्र में दूध दे जाती थी । ऋषि लोग स्वयं पीकर कुछ मण्डूकी को दे देते थे । किसी दिन सर्पिणी ने अपना विष डाल दिया । मण्डूकी ने सोचा ऋषि लोग मर जायेंगे ! अतः उनके प्राण बचाने के लिए वह स्वयं दूध में कूदकर मर गयी । ऋषियों को रहस्य विदित हुआ । उन्होंने उसे दिव्य सुन्दरी युवती बनाकर ईश्वर को समर्पित कर दिया । ईश्वर ने उमा को दे दिया । रावण ने ईश्वर को प्रसन्न कर उमा को प्राप्त कर लिया किन्तु उमा स्वयं तप्त लोहप्रतिमा के तुल्य हो गयीं । रावण स्पर्श करने में असमर्थ होकर उन्हें सिर पर धारण कर ले चला । नारायण माली का रूप धारण कर उल्टे ढंग से वृक्ष का रोपण कर रहे थे । रावण माली की मूर्खता पर हँसने लगा तो माली ने कहा—तुम मन्दोदरी को छोड़कर इस तप्त प्रतिमा को सिर पर ढो रहे हो, अतः तुम हमसे भी अधिक मूर्ख हो, सुनकर रावण ने ईश्वर के पास जाकर उमा को लौटाकर मण्डो को ले लिया । अतिकाय की माता धान्यमालिनी भी रावण की एक और पत्नी थी एवं अनेक और भी उसकी पत्नियाँ थी । जैन कथाओं के अनुसार सुग्रीव की बहन श्रीप्रभा भी रावण की पत्नी थी । इनके अतिरिक्त ६०० विद्याधरियाँ उसकी पत्नियाँ थीं । पुत्रों में इन्द्रजित् सर्वाधिक प्रसिद्ध था । अक्षकुमार, अतिकाय आदि तथा देवान्तक, नरान्तक अन्य भी अनेक उसके पुत्र थे । पाताल का महीरावण, गङ्गामहासूरा आदि भी उसके पुत्र थे । कुछ ग्रन्थों में सीता को रावण की पुत्री माना गया है । वाल्मीकिरामायण (सर्ग ९) के अनुसार रावण वर प्राप्त कर देव, ऋषि, गन्धर्व और यक्षों को सताता था । कुबेर ने दूत भेजकर सदुपदेश दिया, पर उसने दूत को ही मार डाला । कुबेर पर आक्रमण कर पुष्पक छीन लिया । वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड के अनुसार रावण ने मरुत्त, दुष्मन्त, सुरथ, गाधि, मय, पुरूरवा, अनरण्य आदि को जीत लिया । अन्त में नारद के परामर्श से उसने यम पर आक्रमण किया । यम ने रावण का वध करना चाहा, किन्तु ब्रह्मा का अनुरोध मानकर अन्तर्धान हो गये । रावण ने यमलोक जीत कर वरुणालय के वासुकि को परास्त किया । दैत्यों से सन्धि कर ली । विद्युज्जिह्व का वध कर वरुण की सेना को हराया । रावण की अन्य विजय-यात्राएँ रावण की अनुपस्थिति में मधु ने कुम्भीनसी का अपहरण किया । रावण ने मधु पर आक्रमण किया । किन्तु कुम्भीनसी ने रावण का स्वागत करके मधु के लिए अभयदान माँग लिया । रावण कुम्भीनसी की प्रार्थना मानकर कैलास की ओर बढ़ा । मार्ग में रम्भा के साथ बलात्कार करने के कारण नलकूबर के शाप का भागी हुआ । इन्द्रलोक में राक्षसों और देवताओं का घोर युद्ध हुआ । वहाँ सुमाली मारा गया । तब मेघनाद जयन्त को परास्त कर इन्द्र को वन्दी बनाकर लङ्का ले आया । ब्रह्मा ने इन्द्रजित् नाम देकर इन्द्र को छुड़ाया । प्रक्षिप्त सर्गों में रावण की सूर्यलोक तथा चन्द्रलोक की यात्रा भी वर्णित है । पउमचरियं के अनुसार यम, सहस्रकिरण, इन्द्र, वरुण आदि देवता न होकर राजा ही थे, पर यह सब वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध है ।