रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय उत्तरकाण्ड ५९९ वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड के अनुसार रावण कैलास के ऊपर जा रहा था तो पुष्पक अचानक रुक गया। रावण पुष्पक से उतरा, नन्दी का उपहास करके उसने कैलास पर्वत उठाया। पर्वत हिलने लगा। महादेव ने पादाङ्गुष्ठ से पर्वत को दबाया। रावण की भुजाएँ कैलास के नीचे जकड़ गयीं। वह क्रोध और पीड़ा से चिल्लाने लगा। मन्त्रियों के परामर्श से वह विविध स्तोत्रों से महादेव को सन्तुष्ट करने लगा। सहस्र वर्ष तक विलाप करता रहा तब भगवान् प्रसन्न हुए। उन्होंने दशग्रीव की भुजाएँ मुक्त कर दीं। उसका नाम रावण रखा, क्योंकि उसने पर्वत से आक्रान्त होकर दारुण राव किया था। दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार शिव ने उसको चन्द्रहासनामक खड्ग दिया था (सर्ग १६)। उत्तरकाण्ड (सर्ग ३१) में यह भी मिलता है कि रावण सदा ही सुवर्णलिङ्ग अपने पास रखता था और उसकी पूजा करता था। पउमचरियं के अनुसार रावण ने उस चन्द्रहासनामक खड्ग से भुजा काटकर उसकी शिराओं से वीणा का तार बनाकर जिन की स्तुति की थी। यह देखकर धरणेन्द्र मुनि ने रावण को अमोघविजया शक्ति का वर दिया था। अन्य रचनाओं के अनुसार शिव ने रावण को अपनी अँगुली से दबा लिया था। इसपर रावण ने एक सिर तथा एक भुजा मुक्त कर उस सिर से वीणा बनाकर शिव को अपने गायन से प्रसन्न किया था। इस तरह रावण को त्रिलोक पर अधिकार मिला। रामकियेन के अनुसार एक देवता ने किसी दिन कैलास पर एक छिपकली पर इतना प्रबल प्रहार किया कि पर्वत एक ओर झुक गया। देवता कैलास सीधा करने में असमर्थ रहे। तब ईश्वर ने रावण को बुलाया। उसने कैलास को उठाकर पूर्ववत् सीधा कर दिया। वर पाकर रावण ने उमा को माँग लिया और विष्णु की माया से उसने उमा को छोड़कर मण्डो को प्राप्त किया। बुल्के कहते हैं कि रामायण के प्रामाणिक सर्गों में कहीं भी रावण के प्रति किसी शाप का उल्लेख नहीं है, परन्तु शापबोधक सर्गों को अप्रामाणिक कहना सर्वथा निराधार ही है। युद्धकाण्ड (सर्ग ९४।३५) के अनुसार महादेव ने देवताओं को आश्वासन दिया था कि एक स्त्री के कारण रावण का नाश होगा। महाभारत का रामोपाख्यान बुल्के की दृष्टि से रामायण के प्रक्षेपों की कसौटी है। परन्तु उसमें भी नलकुबर के शाप का उल्लेख है। इससे स्पष्ट है कि उनकी कसौटी भी तभी तक कसौटी है जब तक उनके मत की वह पोषक है। सुन्दरकाण्ड में त्रिजटा कहती है कि रम्भा के कारण अभिशप्त रावण किसी अनिच्छुक नारी का कुछ बिगाड़ नहीं सकता (म० भा० ३।२६४।५९)। रावण-वध के बाद राम को सीता के विषय में सन्देह होता है और उसी समय देवता प्रकट होते हैं। ब्रह्मा कहते हैं कि मैंने नलकूबर-शाप के द्वारा सीता की रक्षा का प्रबन्ध कर लिया था। नलकूबर-शाप यह था कि उसे न चाहनेवाली पराई स्त्री का सेवन करने पर रावण के सिर के सैकड़ों टुकड़े हो जायेंगे— “यदि ह्यकामामासेवेत् स्त्रियमन्यामपि ध्रुवम् । शतधाऽस्य फलेन्मूर्धा इत्युक्तः सोऽभवत् पुरा ॥” (म० भा० ३।२९१।३४) वाल्मीकिरामायण (७। सर्ग २६) में इसका विस्तृत वर्णन है। रम्भा को देखकर रावण उसपर आसक्त हुआ। रम्भा ने कहा-मैं आपकी पुत्रवधू नलकूबर की पत्नी हूँ। रावण ने कहा-अप्सराओं का कोई पति नहीं होता। बाद में नलकूबर ने कहा था— “यदि ह्यकामां कामार्त्तो धर्षयिष्यति योषितम् । मूर्धा तु सप्तधा तस्य शकलीभविता तदा ॥”