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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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५८६ रामायणमीमांसा अष्टादश जैसे बलवान् एकाकी वृषभ द्वारा न्यस्त गुरु भार को किशोर नहीं वहन कर सकता, जैसे महान् वारिवेग से दरार पड़ने के कारण क्षरण करता हुआ भिन्न सेतु (टूटा बाँध) दुर्बन्धन होता है (कठिनाई से बाँधा जाता है) उसी प्रकार चोर आदि के कारण असंवृत राज्यच्छिद्र का संवरण करना कठिन है। परन्तु यह भरत का अनौद्धत्यमात्र है, जो बुल्के की समझ के बाहर है। अनन्तर राम पहले ब्राह्मणों को तथा बाद में विभीषण, सुग्रीवादि वानरों को विविध सम्मान देकर निष्कण्टक राज्य करने लगे। राम ने लक्ष्मण को युवराज बनाना चाहा, किन्तु लक्ष्मण ने अस्वीकार किया, जिससे भरत युवराज बनाये गये। राम १०००० वर्ष तक राज्य करते रहे। उन्होंने अन्यान्य यज्ञों के अतिरिक्त अपने पुत्रों के साथ दस बार अश्वमेधयज्ञ सम्पन्न किया था। रामराज्य के गुणगान तथा रामायण की फलश्रुति पर वाल्मीकिकृत आदिकाव्य समाप्त हो जाता है। परन्तु इस प्रसङ्ग में भी समझ लेना चाहिये कि बालकाण्ड में तथा उत्तरकाण्ड में सोत्तर आदिकाव्य का वर्णन है। अतः आदिकाव्य की पूर्ण समाप्ति उत्तरकाण्ड की समाप्ति पर ही है। बुल्के कहते हैं कि "उत्तरकाण्ड (सर्ग ३७-४०) में रामाभिषेक के लिए आमन्त्रित राजाओं तथा सुग्रीव, विभीषण, हनुमान् आदि की बिदाई का पुनः वर्णन है।" परन्तु उसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। वाल्मीकिरामायण ही नहीं किन्तु गीतादि ग्रन्थों में भी अध्याय के अन्त में भावी अध्याय का सूत्ररूप में वर्णन किया जाता है। अगले अध्याय में उसकी विस्तृत व्याख्या की जाती है। अन्य काव्यों में भी यह पद्धति अपनायी गयी है। गीता के ११ वें अध्याय के अन्त में "मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः" की व्याख्या १२ वें अध्याय में है। आनन्दरामायण (१।१२।८४) के अनुसार राम भरत का आलिङ्गन करने के पश्चात् बहुत से रूप धारण कर एक ही समय सबों से मिले थे। तुलसीदासजी ने भी कहा है— "छन महँ मिले सबन्हि भगवाना। उमा मरम यह काहु न जाना।।" (रा० मा० ७।५।४) रामकियेन (अध्याय २६) के अनुसार समुद्र पार करने के पश्चात् राम-सेना ने लङ्का के निकट पहुँचकर मायावन देखा था। राम-सेना को आकर्षित करने तथा भूमि को नीचे खींच लेने के उद्देश्य से भानुराज ने मायावन अपने सिर पर धारण किया था। हनुमान् ने उसकी माया जानकर भूमि में प्रवेश किया तथा उसे मार डाला। हरिवंश (२।५७), विष्णुपुराण (५।३३) तथा कृत्तिवासरामायण (५।४७) के अनुसार भस्मलोचन नामक राक्षस की दृष्टि जिसपर पड़ती थी वह उसी क्षण भस्मीभूत हो जाता था। इस कारण भस्मलोचन प्रायः अपनी आँखों को चमड़े के परदे से ढके रखता था। जब रामसेना समुद्र पारकर लङ्का की ओर बढ़ रही थी तब रावण ने उसके विरुद्ध भस्मलोचन को भेज दिया। विभीषण के परामर्श से राम ने ब्रह्मास्त्र छोड़कर उसके सामने असंख्य दर्पण रख दिये जिनपर दृष्टि डालकर उसने स्वयं को देखकर अपने आपको ही जला लिया। सेरीराम के अनुसार वीलावीस, जो रावण-पुत्र था, से राम की सेना को नष्ट करने के लिए कहा गया। वह दृष्टि से विनाश कर देता था। विभीषण के परामर्श से एक विस्तृत दर्पण पूँछ में बाँधकर हनुमान् ने उसके सामने रखा, जिसमें वह अपना प्रतिबिम्ब निहार कर मर गया। रामकियेन (अध्याय ३१) के अनुसार सहस्रतेज नाम का राक्षस अपनी गदा के अग्रभाग से जिसकी ओर इशारा करता था वह नष्ट हो जाता था। हनुमान् अपने को वाली का दास कहकर उसके विश्वासपात्र बनकर उसकी गदा प्राप्त कर लेते हैं और उसी से सहस्रतेज के सहस्र सिरों को काटकर राम के पास आ जाते हैं। सांग

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