भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 662

अध्याय युद्धकाण्ड ५८५ बुल्के कहते हैं कि यथार्थवादी वाल्मीकि के अनुसार भरद्वाज आश्रम में पहुँचकर हनुमान् को इसलिए भरत के पास भेज दिया था कि वह राम के प्रति भरत की परीक्षा ले लें, क्योंकि यह सर्वथा सम्भव था कि राज्य करते करते भरत का मन बदल गया हो— “कस्य नावत्तंयेन्मनः” (वा० रा० ६।१२५।१६), यदि वास्तव में भरत राज्य चाहते हैं तो राम उनका विरोध नहीं करना चाहेंगे। “प्रशास्तु वसुधां सर्वाम्” (वा० रा० ६।१२५।१७) पर राम की आशङ्का निर्मूल सिद्ध हुई। राम का आगमन सुनकर भरत आनन्दित हो उठे। मैंने पहले ही लिखा है कि सम्पूर्ण ही वाल्मीकिरामायण का यथार्थवादी दृष्टिकोण है। कौशल्या, दशरथ, सीता, राम, लक्ष्मण आदि सभी के जिस समय अनुकूल या प्रतिकूल जैसे भी भाव उद्भूत हुए हैं, महर्षि वाल्मीकि ने उनका वैसा ही वर्णन किया है। इसी लिए यह आदिकाव्य होता हुआ आर्ष इतिहास भी है। सीताचरित्र की शुद्धि के सम्पादन में यथार्थवादी दृष्टिकोण का अत्यन्त महत्त्व था। अवधवासियों को इस यथार्थवाद से स्थालीपुलाकन्याय से सीताचरित्र की शुद्धि पर उसी दृष्टि से विश्वास करना स्वाभाविक हो गया था। दशरथ द्वारा राज्याभिषेक के पूर्व राम को शिक्षा देते समय भरत के चित्त के सम्बन्ध में शङ्का प्रकट करना तथा ननिहाल से लौटे हुए भरत से कौशल्या का प्रथम कुछ रोषपूर्ण व्यवहार तथा अरण्य में लक्ष्मण के प्रति सीता की कटूक्तियाँ भावुकों के हृदयों को प्रतिकूल लगती हैं। परन्तु सत्य घटना होने के कारण महर्षि वाल्मीकि ने उनका स्पष्ट वर्णन कर दिया। ऐसे ही यदि रावण के प्रति सीता के मन में भी कोई आकर्षण होता या किसी प्रकार की चारित्रिक त्रुटि होती तो महर्षि ने अवश्य ही उसका निःसंकोच वर्णन किया होता। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि राम को भरत की भक्ति एवं सद्भावना में विश्वास नहीं था। अवश्य ही भरत की भक्ति में पूर्ण विश्वास रखते हुए भी राज्य एवं राजनीति की दृष्टि से वैसा व्यवहार अत्यन्त सङ्गत है। “विश्वस्ते नातिविश्वसेत्” के अनुसार विश्वस्त के प्रति देश, काल और परिस्थिति वश भावजिज्ञासा उचित ही है। किन्तु बुल्के तो यथार्थवादी दृष्टिकोण का दुरुपयोग करके रामायण में तात्पर्यविधया वर्णित राम की ब्रह्मरूपता को ही यथार्थ न मानकर काल्पनिक मानने लगते हैं। पर क्या इस यथार्थ- वादी दृष्टि से बाइबिल की चमत्कार की अनेक घटनाएँ अप्रामाणिक नहीं सिद्ध होंगी ? उदात्तराघव आदि अनेक नाटकों में राक्षसों के अनेक छलों का वर्णन है। एक राक्षस वसिष्ठ-शिष्य का रूप धारण कर भरत के पास आकर कहता है कि मैंने सुना है कि लक्ष्मण युद्ध में मारे गये हैं। दूसरा राक्षस नारद के रूप में आकर कहता है कि राम का देहान्त हो गया है। सीता अकेले ही अयोध्या आ गयी। एक राक्षसी सीता का रूप धारण करके पति एवं देवर की मृत्यु का समाचार सुनाती है। यह सुनकर भरत सरयू में शरीर त्यागने को प्रस्तुत होते हैं। किन्तु हनुमान् समय से पहुँचकर भरत को सही समाचार देकर वैसा करने से रोक देते हैं। एक राक्षस सुमन्त्र के रूप में राम को समाचार देता है कि भरत मरणासन्न हैं। जानकीपरिणय में छद्मवेशी शूर्पणखा अयोध्या में राम के देहान्त का मिथ्या समाचार फैलाती है। बुल्के कहते हैं—युद्धकाण्ड के अन्तिम सर्ग में वाल्मीकि ने अपने काव्य का निर्वहण किया। भरत ने राज्य लौटाते हुए कहा कि मैं चोरों आदि के कारण दुःसह राज्यभार सँभालने में असमर्थ हूँ— “किशोरवद् गुरुं भारं न वोढुमहमुत्सहे। वारिवेगेन महता भिन्नः सेतुरिव क्षरन्॥ दुर्बन्धनमिदं मन्ये राज्यच्छिद्रमसंवृतम् ।” (वा० रा० ६।१२८।३,४) ७४