भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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५८४ रामायणमीमांसा अष्टादश में अनुक्त अविरुद्ध अंश का समन्वय और विरुद्ध अंश का कल्पभेद से समाधान करना उचित है। तुलसीदास का भी यही विचार है । अवश्य कई कथाओं में सीता का महत्त्व वर्णन की दृष्टि से विविध परीक्षाएँ वर्णित हैं । भोजपुरी ग्रामगीत के अनुसार सीता ने अग्नि को हाथ में लिया वह ठंडी हो गयी । सूर्य को हाथ में लिया वह भी लुस हो गया । सर्प को हाथ में लिया वह फन फैलाकर बैठ गया । गङ्गा को हाथ में लिया वह सूख गयी । सब का तात्पर्य सीता की परम पवित्रता के प्रतिपादन में ही है । अयोध्या-प्रत्यावर्त्तन वाल्मीकिरामायण में अयोध्या-प्रत्यावर्तन के पहले ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवताओं के द्वारा राम की स्तुति, इन्द्र का वरदान, दशरथ का आगमन, शिवजी द्वारा स्तुति आदि वर्णित है । परन्तु बुल्के उन सब को प्रक्षिप्त मानते हैं, क्योंकि उन सर्गों में राम को परब्रह्म परविष्णु रूप कहा गया है । सीता को भी साक्षात् लक्ष्मी कहा गया है । ६०४ अनु०, वाल्मीकिरामायण के अनुसार विभीषण आतिथ्य ग्रहण की प्रार्थना करते हैं पर राम उनका संमान करते हुए भरत का चिन्तन कर के अयोध्या-यात्रा की अनुमति माँगते हैं। विभीषण द्वारा उपस्थित पुष्पक द्वारा चलते हुए सीता को संबोधित करके तत्तत् स्थानों में घटित वृत्तान्तों का वर्णन करते हैं । भरद्वाज आश्रम पहुँचकर अयोध्या का वृत्तान्त जानकर हनुमान् को गुह एवं भरत के पास भेज देते हैं । जनता भरत के साथ नन्दिग्राम में सबका स्वागत करती है। किन्तु पउमचरियं आदि जैन कथाओं के अनुसार राम और लक्ष्मण लङ्का के राजमहल में ६ वर्ष बिताते हैं । वहाँ राम और लक्ष्मण की बहुत पत्नियां भी होती हैं । नारद के द्वारा वर्णित अपराजिता ( कौशल्या ) की दीन दशा सुनकर राम साकेत की यात्रा करते हैं । किन्तु यह सब वाल्मीकिरामायण का ही विकृत रूप है । रामकियेन की युद्धसम्बन्धी अन्य कथाएँ पूर्व में ही दी गयी हैं । वाल्मीकिरामायण (६।१२३।२३-३८) में सीता के अनुरोध से तारा आदि वानरियां भी पुष्पक पर बैठ- कर अयोध्या जाती हैं। अध्यात्मरामायण (६।१४।८) तथा आनन्दरामायण (१।१२।५६) में भी उक्त वृत्तान्त उल्लिखित है । वाल्मीकिरामायण तथा आनन्दरामायण (१।१२।४४) में कृतज्ञ सीता त्रिजटा और सरमा दोनों को अपने साथ अयोध्या ले जाती हैं । परन्तु बुल्के का यह कहना कि आदिरामायण पुष्पक के सम्बन्ध में मौन है । पूर्व में खण्डित कर दिया गया है । जैसे वानरों को किसी फोड़े की चिकित्सा की छूट देने से घाव भरने की अपेक्षा बढ़ेगा ही उसी तरह दुरभिसन्धिपूर्वक शुष्क निःसार तर्कों के आधार पर पाश्चात्यों को भारतीय ग्रन्थों की छानबीन करने की छूट देने पर कोई भी ग्रन्थ सुरक्षित नहीं रह सकता । वाल्मीकिरामायण के अनेकों सर्गों में पुष्पक की चर्चा होने पर भी वे आसानी से उसे अपनी धारणामात्र के आधार पर प्रक्षेप कह देते हैं । खोतानीरामायण के अनुसार समुद्र पार करते ही सेतु को नष्ट कर दिया गया था, जिससे रामसेना का कोई भी योद्धा युद्ध छोड़कर भाग न जाय । यह वाल्मीकिरामायण आदि के विरुद्ध होने से अग्राह्य ही है। रावण- वध के बाद सेतुभङ्ग की वात अनेक रामायणों से सङ्गत है । स्कन्दपुराण (सेतुमाहात्म्य अ० ३०), आनन्दरामायण (१।१२।४८), पद्मपुराण (सृष्टिखण्ड ३५।१३५) आदि में रावणवध के बहुत काल बाद राम की लङ्का यात्रा के समय सेतुभङ्ग का वर्णन है । लङ्का की सुरक्षा की दृष्टि जिज्ञासादृष्टि से बहुत से लोग लङ्का-यात्रा कर सकते थे और राक्षस उन्हें प्रतिबन्ध होने पर भी खा सकते थे, अतः विभीषण की प्रार्थना से तथा कृत्तिवास के अनुसार समुद्र की प्रार्थना से सेतुभङ्ग किया गया था ।