रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 660, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय युद्धकाण्ड ५८३ आनन्दरामायण ( राज्यकाण्ड सर्ग २० ) के अनुसार रावण-वध के बहुत काल बाद तक अयोध्या में एक आवाज सुनायी देती थी । उसका रहस्य वसिष्ठ ने बतलाया था । रावण ने जिस शरीर से बार-बार ब्रह्म-हत्या की थी, वह शरीर आज भी जल रहा है । हनुमान् उसमें सौ भार काष्ठ रोज डालते हैं । रावण ने राम से एक वर माँगा था । जिससे लोग उसे सदा स्मरण करते रहें । राम ने कहा तुम्हारे शरीर को जलानेवाली अग्नि की आवाज सप्त द्वीपों के लोगों को सुनायी पड़ेगी । सेरीराम के अनुसार राम द्वारा पराजित तथा आहत रावण रण-भूमि में जीवित ही पड़ा था । अग्नि- परीक्षा के बाद राम अपने भाइयों के साथ मिलने जाते हैं और बात चीत भी करते हैं । यह भी प्रसिद्ध कथा है कि राम ने लक्ष्मण को नीति सीखने के लिए रावण के पास भेजा था । पहले रावण बोला ही नहीं, लक्ष्मण लौट आये । राम ने लक्ष्मण से नम्रता से पूछने के लिए कहा । जब लक्ष्मण ने नम्रता से पूछा तब उसने कहा कि मनुष्य को चाहिये कि वह जो करना चाहता है कर ले, समय न टाले । मैंने सोचा था मृत्यु को नष्ट कर दूँ पर आज-कल करता रह गया । आज मैं मृत्यु का शिकार हो रहा हूँ । मैंने सोचा था स्वर्गधाम के लिए सीढ़ी बना दूँगा जिससे लोग बिना श्रम वहाँ पहुँच जायें पर वह भी संकल्प टलता ही गया, पूरा न हो सका । कहा जाता है कि रामेश्वरलिङ्ग-स्थापना के लिए सीता की अपेक्षा थी । सीता लङ्का में थी । ऋषियों की सम्मति से राम ने रावण को रामेश्वरलिङ्ग-प्रतिष्ठा कराने को बुलाया था । रावण ने सोचा बिना सीता के अकेले राम कैसे प्रतिष्ठा कार्य सम्पन्न करेंगे ? तदर्थ वह त्रिजटा के साथ पुष्पक यान पर सीता को ले गया और राम के दक्षिणाङ्क में बैठा कर प्रतिष्ठा करायी फिर सीता को पुष्पक में बैठाया । राम ने दक्षिणा के लिए प्रार्थना की तो उसने कहा कि आप क्या दे सकते हैं । तुम्हारी अयोध्या मिट्टी की है और मेरी लङ्का सोने की है, तुम्हारे नगर में सरयू नदी है, हमारे यहाँ समुद्र है । तुम्हारे पुत्र पिता दोनों नहीं हैं; मेरे आगे पीछे अनेक पीढ़ियाँ हैं । अतः यही दक्षिणा दो कि मेरा तुम से वैर बढ़ता ही जाय । तुम्हारे स्वरूप, ऐश्वर्य तथा माधुर्य के प्रभाव से घटे नहीं । मुक्ति अध्यात्मरामायण ( ६।११।७८ ) के अनुसार रावण की ज्योति राम के रूप में मिल गयी थी । विष्णुपुराण के अनुसार सनकादि के शाप से जय और विजय को तीन जन्म तक असुर योनि में जन्म लेना पड़ता है । हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु, रावण और कुम्भकर्ण के रूप से मुक्त न होकर वे शिशुपाल और दन्तवक्त्र के रूप में कृष्ण के हाथ मरकर मुक्ति पाते हैं । अग्नि-परीक्षा का विवेचन पीछे हो चुका है। पउमचरियं के अनुसार अग्नि-परीक्षा के लिए तीन सौ हाथ गहरा अग्निकुण्ड बनाकर उसमें अग्नि प्रज्वलित की गयी । सीता ने सतीत्व की शपथ लेकर उसमें प्रवेश किया । सीता के प्रवेश करते ही अग्निकुण्ड अपने आप स्वच्छ जल से भर गया । धीरे-धीरे उमड़ कर वह सर्वत्र फैलने लगा । जनता की प्रार्थना पर सीता उसे सीमित कर देती है । सबने देखा कि बावड़ी के मध्य सहस्रदल कमल पर सीता विराज- मान हैं । राम ने सीता से क्षमा याचना कर अयोध्या चलने को कहा पर सीता सब छोड़ कर विरक्त हो गयीं । यहाँ जैनों की साम्प्रदायिकता की दृष्टि से सीता ने जैन दीक्षा ले ली । जो सर्वथा मिथ्या है । कथासरित्सागर के अनुसार सीता टिट्टिभ सरोवर के तट पर जाकर सतीत्व की शपथ लेकर जल में प्रवेश करती है । पृथ्वी देवी प्रकट होकर उसे गोद में लेकर सरोवर के उस पार पहुँचा देती हैं । कही केवल मायासीता का ही अग्नि में प्रवेश माना गया है । बुल्के इन सब कथाओं को विकास, कल्पना या परिवर्धन नाम देकर अवास्तविक कहते हैं । परन्तु यह भूल है कारण वाल्मीकिरामायण के समान ही पुराणों की परम्पराओं का भी प्रामाण्य मान्य है । अतः वाल्मीकिरामायण